Monday, July 2, 2007

अविश्‍वसनीय किंतु सच- एक परफ़ेक्‍टली सुखी दिन!..

बंबई की ताज़ा बरसात के भय और डिलिरियम में कल मैंने मानवीय व सम्‍पदा के नुकसानों के संग-संग अपने ब्‍लॉग के बिला जाने का हल्‍ला किया. बड़ी गलती हुई. माफ़ कर दीजिएगा, अगर कर सकें. कल के कुकृत्‍य को याद करके शर्म हो रही है. क्‍योंकि बाकियों को जहां कहीं और जिस-जिस तरह से हानि पहुंची हो, पर्सनली मेरा दो रुपये का नुकसान नहीं हुआ. फिर ब्‍लॉग तो जीवित है ही! सुबह छोटे भाई का फ़ोन सुनकर उठने पर कि मैं सही-सलामत हूं तो?- मुझे भाई के अनर्गल सोच पर गुस्‍सा आने के साथ खुद पर हंसी भी आई. कि ससुर, हाथ में चाय का गिलास लिए हम ज़ि‍न्‍दा हैं, ब्‍लॉग ज़ि‍न्‍दा है मगर इसी मसले पर कुछेक घंटों पहले हम क्‍या नौटंकी ठेले हुए थे! भय में आदमी कितना भावुक हो जाता है सोचकर मन ही मन हम काफी देर तक हंसते रहे.

इतवारी अख़बारों के अलग-अलग पृष्‍ठों की फ़ोटुओं में, खिड़की से बाहर नीचे गली में उड़ते-उलझते छाता संभाले- साड़ी व पैजामा उठाये- सब चेहरे मार्मिकता की तस्‍वीर बने हुए थे मगर झंझावाती रात के गुज़र जाने के बाद मुझे कैसी भी तक़लीफ़ का क़ि‍स्‍सा अब बेमतलब का प्रलाप लग रहा था, और हंसी रूक नहीं रही थी. शायद अवचेतना को किसी तरह का कोडेड मैसेज मिल रहा हो कि आज काफी सुखी दिन गुजरनेवाला है! सचमुच.. हंसी पूरी तरह रुकी भी नहीं थी कि एक के बाद एक सुखी दिन वाला सिलसिला शुरू हो गया!

कमरे के तीन लीकेज प्रोन जगहों से मैं मग और जग हटाते हुए अभी हंस ही रहा था कि साला, फालतू में टेंशन पालते रहते हैं!- कि बाबूजी का फ़ोन आ गया. हमेशा की तरह मुझे डांटने और अपनी दिक़्क़तों का पिटारा खोलकर गिनाने की बजाय, बाबूजी मेरी खैरियत पूछने लगे. अकबकाकर ऐसे हैरत में पड़ा कि हंसी गायब हो गई. दूसरी चाय पीकर अभी मैं इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि मेरे इम्मिडियेट एम्‍प्‍लॉयर, क.स., रोज़ की तरह फ़ोन पर मुझे गालियों से याद करने की जगह, जाने क्‍यों आज मेरी शान में तारीफ़ पढ़ने लगे? चाय छलककर होंठों से बाहर आ गई, फ़ोन हाथ से छूट गया. कफ़ का हुमसकर दौरा पड़ा.. लेकिन दिल का नहीं पड़ा! कहीं कोई छिपा षड्यंत्र तो नहीं?.. घबराहट में मैंने एक पुराने मित्र को फ़ोन किया जो अक्‍सर बाद में मेरा फ़ोन न उठा पाने के स्‍मार्ट बहाने गढ़ते रहते हैं, लेकिन बाद में बहाना गढ़ने की जगह आज फ़ोन स्‍वीकार करके न केवल मुझे कृतार्थ करते रहे, बल्कि मुस्‍कराकर हाल-चाल पूछते हुए मुझे नीच भी साबित कर गए!

सब अविश्‍वसनीय किंतु आश्‍चर्यजनक रूप से सच होता चल रहा था. मदहोशी में मैंने अपने बटुए की जांच की तो उसमें उसी अविश्‍वसनीयता से सौ-सौ के कुछ नोट भी निकल आए. अलबत्‍ता ज्ञानदत्‍त पांड़े की नक़ल में रोज़ सुबह की तरह इस सवाल पर बाल नोंचने की बजाय कि आज ब्‍लॉग पर क्‍या पोस्‍ट चढ़ाऊं, मैं बेफ़ि‍क्री से दोपहर डेढ़ बजे के अंधेरे में घर से बाहर निकल आया, और छपछपाती-हरहराती पानी में बाइक रेलता-पेलता आवारा भटकता पागल बरसात को शहर के इन और उन भरभराते हिस्‍सों में चुनौतियां देने लगा. बारिश हर जगह मेरी चुनौती एक्‍सेप्‍ट करने में नाक़ाम होती रही. पानी के छींटों से चश्‍मे के शीशे के पूरी तरह धुंधला चलने व पूर्ण अंधावस्‍था के बावजूद न मैं किसी बड़ी सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ, और न ही हर डेढ़ सौ मीटर पर बायें-दायें फुदकन की कलाबाजियों से मुदित-चकित रहकर किसी गहरे जलप्‍लावित गड्ढे में घुस पाने में अंतत: सफल ही हो सका! ताजुब्‍ब की बात है, मैं हर तरह से एक निहायत सुखी दिन व्‍यतीत कर रहा था!

पूरी तरह से पानी में नहाया, थका-हारा (मैं ठंड में कांप रहा था लेकिन इसे सामनेवाला ताड़ नहीं पा रहा था!) शाम को एक परिचित के ठिकाने पर पहुंचा जो तक़रीबन वर्ष भर से मुझसे दुखी बैठे थे, लेकिन अचानक मुझे सामने देखकर परिचित ने मेरे मुंह पर दरवाज़ा बंद नहीं कर लिया. खुश व मेरी हालत से चिंतित दिखने का सफल मिक्‍स्‍ड नाटक करते हुए झट अंदर से तौलिया व सूखे कपड़े लिए बाहर आए. उनका चार वर्षीय बेटा जो लंबे अंतराल पर मुझे देख रहा था, न केवल उसने मुझे पहचान लिया, बल्कि बुक्‍का फाड़कर रोने व लात मारने की जगह हंसता हुआ मेरी गीली गोदी में चढ़ने के लिए मचलने भी लगा. परिचित की पत्‍नी भी मचलने लगीं- हालांकि वह गोद में चढ़ने के लिए नहीं, कुछ खिलाने के लिए मचल रही थीं.

ओह, कुछ घंटे बीत गए हैं.. मगर स्‍मरण से अभी भी आंखें बरबस गीली हुई जा रही हैं.. विश्‍वास नहीं होता.. लंबे अर्से बाद मैंने इस तरह का एक परफ़ेक्‍टली सुखी दिन गुजार लिया था!

10 comments:

  1. खुदा से दुआ करते है कि आपका सपना सच हो,और रोज सच हो ,सभी का सच हो ,आमीन

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  2. यह तो इश्वर की बड़ी कृपा कहलाई-है न??

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  3. ख़ुशी की बात है कि आपको कोई नुकसान नही हुआ और आपका सन्डे अच्छा बीता और आपकी हिम्मत की दाद भी देनी पडेगी जो इतनी बारिश मे आप बाहर निकले।

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  4. दुनिया और जिंदगी इतनी खराब नहीं है, जितनी कभी-कभी अपने कमरे में बैठकर लग सकती है।
    सुखी दिनों के लंबे सिलसिले की शुभकामनाओं के साथ
    आलोक पुराणिक

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  5. कभी-कभी गलती से ही सही, कुछ अच्छा हो जाता है. ईश्वर करे ये गलती उससे बार बार हो!!! :-)

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  6. उपरवाला आपको ऐसे दिन बार-बार नसीब करवाता रहे ताकि हमें ऐसी सीधी और सरल पोस्ट बार-बार पढ़ने को मिलती रहे!!

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  7. पता नही क्यों आज आपकी यह पोस्ट पढ़कर कुछ ज्यादा ही अच्छा महसूस हुआ, इसलिए नही कि सीधी और सरल है, शायद इसलिए कि आज आपने जो लिखा है वह मैं बहुत अंदर तक महसूस कर पाया!!

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  8. ये तो हुई कल की बात.. आज के क्या हाल हैं?

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  9. हद है! आज परफ़ेक्‍टली सुखी दिन नहीं है.. आज मैं किसी के गोद में चढ़ने के लिए मचल रहा हूं.. लेकिन वह किसी तरह संभव होता दिख नहीं रहा.. काफी फ्रस्‍ट्रेटिंग लग रहा है.. लेकिन यह एवरेज़ रोज़ वाली बात है तो शिकायत की वजह नहीं है!

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  10. क्या बात है? सुखी दिन वो भी पूरा दिन। यकीन नहीं होता। बारिश का वरदान। होने दीजिए बारिश। दरअसल हम लोग बारिश में भींगने की आदत भूल गए हैं। आपने याद रखा तो आपको लकी डे से साक्षात्कार हो गया।

    लेख पढ़कर बारिश में न भींगने का अफसोस हुआ है। मेरा आज का दिन बैड डे हो गया है।

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