Tuesday, July 3, 2007

हिंदी और ऑलिवर स्‍टोन..

सुबह छह बजे उठा हूं. लगता है देर रात या भोर में कभी शुरू हुई होगी, बाहर बूंदा-बांदी और झड़ि‍यों का कुहरीलापन तना हुआ है. बरसात की सुरक्षा में भेड़े गए खिड़कियों के शीशों पर धुंध है, और बाहर की दुनिया की जो कोई जैसी भी छाया होगी वह छिपी-अस्‍पष्‍ट बनी हुई है. हिंदी से जुड़ी जिरहों के साथ भी लगभग कुछ ऐसी ही स्थिति बनी रहती है. ढेरों मंत्‍वयों-वक्‍तव्‍यों की बरसात में लगता है शायद कहीं कोई रोशनी का टुकड़ा इकट्ठा हो जाएगा, लेकिन नहीं होता. अंधेरे के एक टुकड़े से आप दूसरे टुकड़े के बीच घूमते रहते हैं, हाथ अंत में अंधेरा ही आता है.. एक के बाद एक पांच हिंदी फ़ि‍ल्‍में देख लीजिए, (हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के प्रति अपनी सारी भावुकता के बाद) देखिएगा, कैसे सिर दुखने लगता है! वही हाल ऐसी बहसों का है, थोड़ी देर तक उनमें बने रहिए, थाह लेना मुश्किल हो जाएगा कि कौन चिरकुटई ज्‍यादा बड़ी है.

साहित्यिक लच्‍छेदार ज़बान वाली इन सारी बहसों के केंद्र में हमेशा कविता-कहानी रहती है. बहुत हद तक हिंदी ब्‍लॉग विश्‍व की ही तरह, पांच सौ से डेढ़ हज़ार लोगों के इस सीक्रेट सोसायटी में सारी मारकाट प्रकाशन, पुरस्‍कार संबंधी गुटबंदियों की है. विवादों के सारे रिफ़रेंसेस इसी बंद दुनिया में लिखे इस या उस रचना-कर्म के हैं. हिंदी की हितचिंता में कविताओं व कहानियों से बाहर ज्ञान का अन्‍य कोई क्षेत्र इनके विमर्श के लिए एक्‍ज़ि‍स्‍ट नहीं ही करता!

कल ऑलिवर स्‍टोन का अमरीका नाम की एक डॉक्‍यूमेंट्री देख रहा था. ऑलिवर स्‍टोन ‘हेवेन एंड अर्थ’, ‘प्‍लैटून’, ‘बॉर्न ऑन द फॉर्थ ऑफ़ जुलाई’, ‘जेएफके’ ‘यू-टर्न’, ‘नैचुरल बॉर्न किलर्स’ जैसी सफल फ़ि‍ल्‍मों के निर्देशक रहे हैं. ज्‍यादातर खुद लिखी है. मूलत: न्‍यूऑर्क सिटी के मिश्रित पेरेंटेज की पैदावार, ऑलिवर ने वियतनाम की लड़ाई में जाने से पहले एक किताब लिखी थी. न्‍यूऑर्क के आत्‍मतुष्‍ट कलाजगत से खिन्‍नता उन्‍हें फ़ि‍ल्‍म जगत में ठेलने का जरिया बनी. डॉक्‍यूमेंट्री उनकी फ़ि‍ल्‍मकारी, फ़ि‍ल्‍म करियर के बहाने अमरीका संबंधी उनके विचारों का एक जगह संचयन है. और मज़ेदार है. झूठ व पैसे के प्रभुत्‍ववाले अमरीकी समाज में अपनी गुंफित भूमिका को ऑलिवर जिस तरह धाराप्रवाह परतों में रेखांकित करते हैं, वह विस्‍मय जगाने से ज्‍यादा आपको बार-बार एक दूसरे तक़लीफ़देह सवाल को कंफ्रट करने पर विवश करता है. कि ऑलिवर या उनके बाद के फ़ि‍ल्‍मकारों की भारतीय पीढ़ी- चिंताओं का यह वैविध्‍यपूर्ण ‘कंसर्न’ अपनी फ़ि‍ल्‍मों में जीने की बात तो दूर- समाज व समय की यह परतदार समझ रखती भी है या नहीं?.. संजू बाबा व सल्‍लू भैया के बाहर की दुनिया को वह जानती कितना है? फ़्रेम में खड़ी की गई कहानियों की उसकी कोई वास्‍तविक ज़मीन है, उस अंतरंग-आंतरिक गुंफित लोक का उसका कोई एक्‍सप्‍लोरेशन है?.. नहीं, सिर्फ़ तामा-झामा है. विरोध व जिरह की अदाओं से अलग उसके पास स्‍थान व काल की कोई किसी तरह की आर्टिकुलेटेड समझ नहीं है. उसके वह बौद्धिक संस्‍कार ही नहीं हैं.

वही हाल साहित्‍य का है. सारा खेल अदाओं की किमियागीरी है. पिछले वर्ष सितम्‍बर में साहित्‍य के लिए नोबेल का पुरस्‍कार तुर्की के जीवटवाले, अनोखी साहित्यिक प्रतिभा के धनी ओरहान पामुक को मिला था. इन भले जिरहकारों से पूछिये, कितने लोगों ने उनकी किताबें पढ़ी हैं? ज्‍यादातर को इस सवाल की प्रासंगिकता नहीं समझ आएगी. जो समझेंगे वे अपनी अंग्रेज़ी न जानने व ग़रीबी व नौकरी के टंटे व जाने किन-किन कारकों का हवाला देंगे, मगर बहुतों के पास तर्क की यह आड़ भी होगी कि हिंदी में इतना पढ़ने को है, फिर बाहर देखने की क्‍या दरकार? इसी तर्क पर आप आजतक दो कौड़ी का हिंदी सिनेमा देख-देखकर धन्‍य होते रहे हैं! नवलेखन की इन अष्‍टछाप व नष्‍टछाप कविताओं की साहित्यिक भंगिमाओं पर मत जाइए, शब्‍द चातुरी से अलग आपका वह विवेक तराशें, इसकी कवि से उम्‍मीद न करें. क्‍योंकि मुक्‍त बाज़ार व भूमंडलीकरण के इस दौर में खुद हिंदी के कवि को अपना विवेक सबसे ज्‍यादा तराशने की ज़रूरत है.

हिंदी का हित आज इसमें ज्‍यादा होगा कि वह हमारे हाथों में ऐसे औज़ार पकड़ाए जिससे अपने समय, वैश्विक समाज को हम बड़े, व्‍यापक, अर्थपूर्ण संदर्भों में पहचानने में मदद पावें. नज़रों के सामने का धुंधला अंधियारा साफ़ हो.. जीवन संक्षिप्‍त है. आज की आपाधापी वाले वक़्त में जब रोज़ खुद से ही खुद को बचाते रहने की होड़ ठनी रहती है, अच्‍छा हो, ऊर्जा इन मुन्‍ना भाई टाइप बहसों से जाया न करें.

8 comments:

  1. संजय कुमार, विजय कुमार, अजय कुमार टाइप साहित्य के रक्षक और योद्धा हैं, सबसे बड़े मुद्दे हैं. उन पर बहस ज़रूरी है. दूसरी ओर निरंजन, सुरंजन, रघुनंदन हैं जो परेशान है एक पत्रिका हरेराम, राधेश्याम और श्रीराम क्या-क्या लिख रहे हैं, क्यों-क्यों लिख रहे हैं. तीसरी तरफ़ प्रभाकर, दिवाकर, सुधाकर टाइप लोग हैं जो इस टकराव से बहुत चिंतित हैं, कोई इधर चिंता प्रकट कर रहा है तो कोई उधर. सब चिंतित हैं, चिंता दूर होगी तो अमुक-अमुक पामुक-शामुक को भी पढ़ लेंगे....

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  2. ekdam sahi nabj par hath rakha hai aapne.

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  3. " बहुत हद तक हिंदी ब्‍लॉग विश्‍व की ही तरह, पांच सौ से डेढ़ हज़ार लोगों के इस सीक्रेट सोसायटी में सारी मारकाट प्रकाशन, पुरस्‍कार संबंधी गुटबंदियों की है."

    ये बकवास स्टेटमेंट है! हिंदी ब्लाग विश्व का साहित्यिक गुटबंदियों की नीचता के स्तर से तुलना करना गलत है - आप हमें अपने स्तर पर ना घसीटें तो बेहतर!

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  4. ओलिवर स्टोन ने एक और फिल्म वाल स्ट्रीट नाम से बनाई है। पूंजी की व्यवस्था के दायरे में निजी नैतिकता के सवाल को फिल्म में बहुत अच्छी तरह उठाया गया है। उसका नाम क्यों भूल गए।
    -संगम पांडेय

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  5. मैं हर तरह से बेनामों के पक्ष में हूँ.. जानते हैं क्यों.. वे नाम से ज़्यादा विचार को महत्व देते हैं.. अब देखिये आप के बेनाम पाठक ने विचार को कितनी प्रबलता के साथ पटका है.. पर नाम को आत्मा की तरह अदृश्य रहने दिया.. वाह वाह बेनाम वाह.. तुम्हारी जय हो..
    माफ़ करें प्रमोद भाई..सोच के आया था कि कुछ हिन्दी जगत और ओलिवर स्टोन पर अपनी कुण्ठाएं यहाँ उड़ेलूंगा.. पर बेनाम के इस क्रांतिकारी विचार से अचानक रू ब रू हो कर सब भूल भाल गया.. मगर नाम से चिपके रहने का मोह अभी भी नहीं छोड़ पा रहा हूँ..काश मैं भी बेनाम होने का साहस कर पाता..

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  6. संगम प्‍यारे,
    निजी तौर पर मैं ऑलिवर स्‍टोन स्‍टाइल ऑफ फ़ि‍ल्‍ममेकिंग का विशेष प्रशंसक नहीं, और न यहां लिखी टिप्‍पणी मिस्‍टर स्‍टोन के करियर के बाबत थी. सन् '73 से अब तक की सक्रियता में अच्‍छी-बुरी उन्‍होंने ढेरों फ़ि‍ल्‍में बनाई हैं. यहां संदर्भ मिस्‍टर स्‍टोन नहीं, सक्रियता के विशेष तौर-तरीके की तरफ इशारा करना था.

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  7. हिंदी का हित आज इसमें ज्‍यादा होगा कि वह हमारे हाथों में ऐसे औज़ार पकड़ाए जिससे अपने समय, वैश्विक समाज को हम बड़े, व्‍यापक, अर्थपूर्ण संदर्भों में पहचानने में मदद पावें. नज़रों के सामने का धुंधला अंधियारा साफ़ हो.. जीवन संक्षिप्‍त है. आज की आपाधापी वाले वक़्त में जब रोज़ खुद से ही खुद को बचाते रहने की होड़ ठनी रहती है, अच्‍छा हो, ऊर्जा इन मुन्‍ना भाई टाइप बहसों से जाया न करें.
    भाइ ये तो आपने ब्लोग के हाईडर पर लगातार चिपका रहने वाला स्लोगन लिख डाला है

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  8. आपकी बात बिल्‍कुल जायज़ है । चाहे हमारी फिल्‍मों हों या हमारे यहां का साहित्‍य, उथलापन बिल्‍कुल बारिश की तरह छा गया है हर तरफ । मैंने पिछली बार भी कहा था और अब भी कह रहा हूं कि वाक़ई हिंदी साहित्‍य जगत अधिकतम डेढ़ हज़ार लोगों के बीच सिमटा है । यही लोग लिखते पढ़ते, खींचमताम करते, विवाद और संवाद करते नज़र आते हैं । अफ़सोस कि लोग इस सत्‍य कथन को नीचे स्‍तर की बात कह रहे हैं । आपसे एक शिकायत है, सिनेमा पर लिखना कम करके आपने ठीक नहीं किया । बहुत हो गया आपका पतनशील टाइप । अब जागिए अज़दक और सिनेमा के रस्‍ते चलिए

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