Wednesday, July 4, 2007

भाषा के बीहड़ में गुमसुम..



एक
भाषा के बीहड़
वन में फिर खड़ा
हु-लू-लू का हल्‍ला उठाये
पटकता पटखनी
और यकबयक
गम्‍म् चुप्‍प पटाये
लात खाये
सिर झुकाये.

दो
बूढ़-पुरनिया कहते दुर्दिन
मित्र अंग्रेज़ी में बुदबुदाता,
वी आर लिविंग इन डार्क टाइम्‍स
मैं तर्ज़ुमाता हिंदी में
क़ागज़ काली करता
लिखता लिखे जाता
काला काला काला.

तीन
चांदनी के अंधेरे में
घूमती कोई आवारा बजरी
या नशे में डोलती रात
सोचता सोया रहता मैं
जगी रहती मेरी बात.

6 comments:

  1. चांदनी के अंधेरे में
    कोई आवारा बजरी है
    या नशे में डोलती रात
    सोचता सोया मैं
    जगी है मेरी बात.
    शान्दार कविता,भाइ आजकल हमारी पसंद कैसे बनते जा रहे हो...?

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  2. इतना भी न गुमसुन हो जायें-अभी बहुत कुछ बचा हुआ है अलख जगाने को. :)

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  3. कविता अपना कर्म करती रहे यूं ही तो शायद कल न कहना पडे काला काला काला! बहुत मर्मस्पर्शी कविता !

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  4. भाई वाह क्या कविता है! अब तो लगता है युवा कविता के दिन अवश्य फिरेंगे. भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के चालीसोपरांत कवियों मे नामांकित होने लिये पूर्व बधाई.

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  5. भाई वाह क्या कविता है! अब तो लगता है युवा कविता के दिन अवश्य फिरेंगे. भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के चालीसोपरांत कवियों मे नामांकित होने लिये पूर्व बधाई.

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  6. अच्छा है ये काला-काला! :)

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