Thursday, July 5, 2007

नाईट ऑफ़ द हंटर..

हाथ को हाथ न सूझे वैसी अंधियारी रात. पैरों के नीचे नम ज़मीन. दो कदम आगे चलते शंकर के हाथ में टंगी लालटेन की डोलती रोशनी का दबा-मुरझाया उजाला. घास पर से फिसलकर रोशनी का टुकड़ा शंकर के पैरों पर आता, फिर ऊपर हवा में उठकर पीछे का सब अंधेरे में डुबोया छोड़ जाता.

पेंड़ों के बीच कोई पंछी डैने फड़फड़ाता उड़ा, फिर शंकर के हवाई चप्‍पल के सट्ट-सर्र से अलग सब कहीं निस्‍सीम ख़ामोशी फैल गई. कोई वजह नहीं थी फिर भी जाने क्‍यों मैं भीतर तक भय में नहा गया. तेजी से लपक कर शंकर की चाल के बराबर रहने की कोशिश करने लगा.

- तब से जंगल में ही चल रहे हैं! कब खतम कब होगा, शंकर?

- बस खतमे समझिए, साहेब.. ज़रा आगे मैदान है, ओकरे बाद एक छोटा बांस का जंगल, ओही से लगी मुरुंग नदी.. और नदी के पार आपकेर मंज़ि‍ल!

मंज़ि‍ल, हंह!.. मैदान, बांस का जंगल, नदी- सियाह अंधेरे के इतने पड़ाव अभी और थे, सोचकर ही थकान होने लगी. कुछ कहा नहीं. ग़लत फ़ैसला करने के बाद अब इतनी दूर आकर शिकायत करने का क्‍या तुक. सर्द आह भरकर लालटेन की रोशनी पर आंखें गड़ाये चुपचाप शंकर के पीछे चलता रहा. ख़ामोशी में चलना थोड़ी देर और हुआ होगा जभी जाने जंगल के पार अचानक टिटिहरी की तेज़ कर्कश ‘टीं-टीं!’ की चीख़ से उपजी भय के असर में, या पैरों के सामने चले आए एक पत्‍थर की अचकचाहट- अंधेरे में लहराकर उछला और झाड़ि‍यों में ढुलकता कुछ दूर घिसटता चला गया.

थोड़ी चोट आई होगी.. मगर चोट से ज्‍यादा घबराहट थी. पैरों पर वापस खड़ा होने के बाद मैंने इधर-उधर सुध लेना चाही तो लालटेन के उजाले का आसपास कहीं निशान बाकी नहीं! खौफ़ इतना गहरा कि अंधेरे में शंकर को पुकारने की हिम्‍मत न हुई. कुछेक कदम यूं ही ताड़-ताड़ कर आगे धरने के बाद जाने किसी खटके या पीछे से कोई किसी भी क्षण आकर दबोच लेगा- के अंदेशे में, सामने की हवा को हाथों से काटता, एकदम-से मैंने भागना शुरू किया. ठीक-ठीक कहना मुश्किल है कितनी दूर और कितनी देर तक भागता रहा होऊंगा. लेकिन जंगल के खत्‍म होते ही खुले के सियाह उजाले में हाथ को हाथ की थाह होने लगी.

खुलेपन की निश्चिंतता के पहले अहसास में थका-हांफता मैं ज़मीन पर ढेर हो गया. आंखें मूंदे थोड़ी देर तक सांसों को व्‍यवस्थित करता रहा, फिर कुछ पल ऊपर आसमान के घनेरे में चांद को खोजने की बेमतलब खेल में खोया रहा. तभी बांसों के जंगल से निकलती वह प्रेत छायाएं दिखीं.

वे कुछ खोज रहे थे. ऊंची, भारी देह वाला दूधिया दाढ़ी में आगे-आगे चल रहा खूंखार गंजा संभवत: प्रेतों का सरगना था. पीछे सहमे-सहमे तीनों चेले-चपाटी उस लिहाज़ से निरे बच्‍चे थे. सरगने के एक हाथ में दारु की बोतल व दूसरे में नोटों की गड्डी थी. मैंने एकदम-से कमल भाई को पहचान लिया!

लपककर दौड़ता हुआ उनतक पहुंचा. मुझे देखते ही वह फैल गए- भों..... के, तेरी तलवार किधर है? साले, प्‍यार-प्‍यार की चिंहु-चिंहु रोते रहते हो! म्‍यान से बाहर करो तलवार! चीर डालो, काट डालो! ख़ून से रंग दो शहर को! तब भों..... के, हाथ में ऑफर लेके आएंगे तुम्‍हारे पीछे-पीछे! पूंछ हिलाके कोई काम नहीं होनेवाला, टेक आऊट यूअर स्‍वोर्ड, किल द बास्‍टर्ड्स! एंड डोंट बादर मी, आईम डुइंग रेकी फॉर माई न्‍यू फ़ि‍ल्‍म!

मैं अपनी मुसीबत का बयान करूं, इसके पहले छायाओं की तरह जैसे कमल भाई एंड गैंग सतह पर उभरा था, उसी तरह धुंध में वापस गायब भी हो गया. हक्‍का-बक्‍का मैं बुझव्‍वल के तार दुरुस्‍त करता रहा कि तभी एक बार फिर टिटिहरी का तीखा स्‍वर गूंजा.

अंधेरे में धीमे-धीमे स्‍वर की दिशा में बढ़ता गया. बांसों के बीच निकलते चले जाने पर कुछ दूर आगे भक्‍क रोशनी का चंदोवा तना हुआ था. किसी हैरी बवेजा-सैली तरनेजा टाइप यूनिट की शूटिंग चल रही थी. प्‍लास्टिक चेयर पर बमन ईरानी एक ओर पैर फैलाये हैरी पौटर का नया पोथा पढ़ रहे थे. मामला समझ में आते ही गुस्‍सा मेरी नाक तक भर आया, बरसता हुआ मैंने बमन से कहा- कुछ तो शरम करो, यार, आप लोग! यहां किसानों की ज़ि‍न्‍दगी हराम हो रही है.. रोज़ बेचारे आत्‍महत्‍या कर रहे हैं! उनकी मदद तो कोई, घंटा, क्‍या करेगा, उनकी रात की नींद खराब करने आप पहुंच गए?

बमन परेशान नहीं हुए. न नज़र घुमाई. रिलैक्‍स्‍ड पोथा पढ़ना जारी रखते हुए मुझे सूचित किया कि दरअसल वह आत्‍महत्‍या करनेवाले एक किसान का ही पार्ट प्‍ले कर रहे हैं जो फ़ि‍ल्‍म के अंत में मरता नहीं, जग जाता है और विलेन इरफ़ान खान के सपने में उतरकर बताता है आगे से कोई किसान आत्‍महत्‍या नहीं करेगा! फ़ि‍ल्‍म में चार एआर रहमान और दो हिमेश के गाने हैं, मोस्‍ट ऑव द शूट हैज़ बीन डन अराउंड लश ग्रीनरी ऑव टोरंटो एंड जोहानेसबर्ग.. इट्स गोइंग टू बी अ डैम गुड फन फ़ि‍ल्‍म! और बात अचानक काटकर- बाय द वे, आर यू कैरिइंग यूअर स्‍वोर्ड?..

उसके बाद याद नहीं. बैकग्राउंड में बजते संगीत का नशीला जादू था, या शरीरी कमज़ोरी- मैं खड़े-खड़े गिर गया. मालूम नहीं कहां, कब तक, कितनी दूर गिरा रहा. दर्द के अहसास से आंख खुली तो देखा एक रोंयेदार चूहा मेरी एड़ी कुतर रहा था! झटककर मैंने लात चलायी और पसीने में नहाया उठकर खड़ा हो गया.

भोर का उजाला हौले-हौले पसर रहा था. मुंहअंधेरे उसी उजियारे में शंकर नदी के उस पार खड़ा दिखा; हाथ की बुझी लालटेन हिलाता मुझे अपने पीछे आने का इशारा कर रहा था.

मगर पता नहीं.. शायद शंकर-टंकर वो कोई नहीं था.. महज़ कल्‍पना थी मेरी.. नदी के उस पार के झीने उजाले में खड़ी वह छाया खुद मैं ही था.. इशारों से अपने को अपने पास बुलाता!..

1 comment:

  1. हंटर हंटेड , टिटिहरी , जंगल ,बमन , चूहा , प्रेत ! सर्रियल पेंटिंग पेंट कर रहे हैं ?
    बढिया है नहीं कहूँगी , वरना मेहराई कुहनी टाईप पोस्ट आप दोबारा लिखने को मज़बूर नहीं हो जायेंगे ?

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