Friday, July 6, 2007

मेलंकॅलिया: सारंगी पर तीन टेक..



एक
जिन चिट्ठि‍यों को हमने अपने ख़ून से ज्‍यादा समझा
आंसुओं की सिहरती आग में जिलाये रखा, भूली किताबों के
पीछे दबी यादों में अब महज़ चोट की खुरची-टेढ़ी लकीरें हैं

कभी भूले से हाथ में खुल जायें तब धीमे-धीमे उतरता है उनका भेद
कांपती उंगलियों की फड़फड़ाहट में दिखता है अंदर सब किस कदर खाली हैं
इतने वर्षों जिनका दाग़ छाती में लिए घुलते रहे, पूरी सिरे से जाली हैं.

दो
पच्‍चीस वर्षों तक छूट-छूटकर जिससे भागते रहे
रौंदा, नष्‍ट किया, तरतीब से सारे पुल जलाकर
हाथ झाड़ लिए, मुक्‍त हुए

चालीसोपरांत रेत में ढूंढ़ने लौटते हैं कच्‍ची दीवारों
का वही उखड़ा भूगोल, उदासियों में घिरा जर्जर
घर जिसे इन्‍हीं हाथों ने कभी रेत किया था.

तीन
क्‍या मतलब है इस अंतहीन खिंचे तार का
नेह का ज़हर, मीठे दुलार, दिलासाओं का
बार-बार दुहराना तुम्‍हारा कि तुम्‍हें आना है

इस तरह किस तरह उम्र भर बैठा रहूंगा इंतज़ार में
आख़ि‍र मुझे भी तो कभी तुम्‍हारी ओर जाना है.

5 comments:

  1. प्यारी अभिव्यक्तियां..

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  2. "इस तरह किस तरह उम्र भर बैठा रहूंगा इंतज़ार में
    आख़ि‍र मुझे भी तो कभी तुम्‍हारी ओर जाना है"

    बस ठीक यही मैं कहना चाहती थी! हमारे चिट्ठे पर पधारिए कमेंटियाइये आखिर आपको भी तो हमारे कमेंट चाहिए होंगे न :)

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  3. चारों तरफ़ उदासी ही उदासी,ये कहां आ गये हम? सब मिथ्या है.जो दिखता है वो होता नही,जो होता है वो दिखता नहीं.लेकिन आपने होते हुए को देखा है. फिर भी "सारंगी" का स्वर बड़ा बोझिल है कुछ और भी रंग हैं जीवन में उसे भी उकेरा जा सकता था.

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  4. रेतने से गला कटता है
    रेतने से सारंगी बजती है
    शायद इसीलिए उसका दर्द
    इतना हलाल होता है
    आपका भी है
    बहुत रेते गए हैं
    इसलिए रीते लगते हैं
    लिखना आपका हलाल है
    हमेशा की तरह कमाल है

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  5. अच्छी और मर्मस्पर्शी।
    इस तरह किस तरह उम्र भर बैठा रहूंगा इंतज़ार में
    आख़ि‍र मुझे भी तो कभी तुम्‍हारी ओर जाना है.

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