Saturday, July 7, 2007

इक्‍कीस पूतोंवाला परिवार..

बीस की गिनती थी. इक्‍कीसवें को अभी आना था. तीन छिन गए थे. मगर सत्रह अभी भी थे. ज़ि‍न्‍दा. बड़े हो रहे थे. रोज़ थोड़ा बढ़ जाते. औरत देखती और ताजुब्‍ब करती कि मेरे ही हैं. ख़ून और मांस देकर इनको दुनिया में लानेवाली मैं! मन में कैसी-कैसी तो सुख की लहर उठने लगती. आत्‍मा फूलकर कुम्‍हड़ा हो जाता. सूखकर मुरझाई छातियों में पनियल दूध उमड़ने लगता. गोद के तीन महीने को लाड़ से चिमटा कर चूम लेती. आदमी नज़दीक उकड़ू बैठता, लड़ि‍याकर बोलता- हमारा मन नहीं भरा लेकिन.. औरत सिर झुकाकर कहती- मैं भी अभी मरी नहीं! मुरादों को मारना क्‍या. साध हों तो पूरे होने चाहिएं.

औरत जब छोटी थी सोचती थी मां बनूंगी. व्‍याह के आई और साल भर में बन गई. मां. तब से हर साल नियम बन गया. ज़ि‍म्‍मेदारी से नियम पूरा करती रही. गांव की औरतें कहतीं बहुत कलेजेवाली है. नसीबन नाईन कहती ऐसी पेटवाली पहले नहीं देखी! आदमी के बारे में गांव के आदमी नहीं कहते कि ऐसा बीजदार जवान पहले नहीं देखा. आदमी की बात निकलती तो चुप पड़ जाते. थोड़ी देर में कोई भुनभनाकर गाली देकर थूक देता- बाद में रोयेगा मादर....

आदमी गांववालों की रंजिश समझता था. उसके दालान में ट्रैक्‍टर नहीं, गऊ-गोरु नहीं, न बारह कमरोंवाला मकान है फिर भी गांव के लोग ईर्ष्‍या करते हैं. इसीलिए करते हैं कि वह बीस बच्‍चों का बाप ठहरा. अपनी जनानाओं को उसके बीज से छिपाकर घर की दीवारों व परदों की ओट में रखते हैं. कमज़ोरी में दीवार का सहारा लेकर बीजदार आदमी बुदबुदाता- सामने आकर कहें, मादर... , एक-एक की हेकड़ी छुड़ा दूंगा! सभी बच्‍चों के हाथ में लाठी थमाकर दरवाज़े पर खड़ा कर दूं, पूरे गांव की साली हवा निकल जाएगी?

सभी बच्‍चों के हाथ में लाठी थमाकर दरवाज़े पर खड़ा करने की बात वैसे बेमतलब थी. तीन घर में रहते तो तेरह बाहर. सबके काम बंटे हुए थे. एक गांव के नाले पर जाकर छोटों के पोतड़े साफ़ करता तो दूसरे के कंधे खेतों से तरकारी चोरी करके लाने का जिम्‍मा होता. ग्‍यारह साल का ज़ुनैद शहर में आढ़तिये की दुकान में बैठता था. नौ साल का जावेद पतंग बेचता और तेरह साल की फ़रहत सबके लिए रोटी सेंकने के बाद रोशन बी के हिंया सिलाई-कढ़ाई सीखने जाती. तौफ़ि‍क और टुन्‍नू और बिलकीस बाप के कंधे पर खेलते या लात खाकर कोने में नाक बहाते, बुलके चुवाते. मदरसे नहीं जाते थे. मदरसे कोई नहीं गया था. ना. मदरसे जाकर क्‍या बनना था. बीजदार आदमी के अब्‍बूजान भी मदरसे नहीं गए थे. कटाई मशीन के आरे से दाहिना हाथ कटवाकर ताउम्र आदाब करने से लाचार हो गए थे. आदमी के बचा था लेकिन वह उसका इस्‍तेमाल ज्‍यादा हाथ छोड़ने के लिए किया करता. जाने किस बात की कुंठा थी कि गुस्‍सा हमेशा नाक पर रहता. जब नहीं रहता तो औरत पेट से रहती.

चालीस साल की झुर्रियोंवाली औरत कभी ग़मज़दा होकर कराहती कहती- अल्‍लाताला ने तीन छीन लिया! दमे से खांसता आदमी टोकता- ज़ाहिल कहींकी, अभी सत्रह हैं कि नहीं? औरत कहती- रफ़्ता-रफ़्ता सब अपनी राह चले जाएंगे! मोहसिन अब घर कहां आता है? तन्‍नी और फ़रहत भी बियाह के अपने-अपने जाएंगी. दुआर-आंगन सूना पड़ जाएगा! गांव में कौन हमारी फ़ि‍क्र करता है, बुढ़ौती में कौन ख़्याल करेगा, इस बियाबान में तू-मैं अकेले हो जायेंगे? आदमी घबराकर सोचने लगता और फिर बेदम जवाब देता- सही बोलती है! इन बड़े होतों का कोई भरोसा नहीं! गांववालों की तरह जाने कब साले हमसे आंख फेर लें? इसीलिए कहता हूं जबतक तेरी सांस को सांस है, पैर पीछे मत खींच, हौसला करके बच्‍चे बिया! औरत दुखी होकर कहती- मैंने कब कहा कि मेरा हौसला कम हुआ है! तुम्‍हीं खांस-खांसकर रात में मुंह चुराये रहते हो?

घबराया हुआ आदमी उस रात भी खांसता रहा.. मगर खांसी से कुछ राहत हुई तो फिर उसने मुंह नहीं चुराया.. मौका लहते ही उस रात औरत-आदमी इक्‍कीसवें बच्‍चे की तैयारी में एक-दूसरे की मदद करने लग गए.

(इस मनगढंत, असत्‍यकथा को किसी स्‍थान या समुदाय-विशेष से जोड़कर कृपया दिल व दिमाग़ न जलायें.
अप्रगतिशीलता के इस कथासार के लिए
नीलिमा का उपकार.
ऊपर की तस्‍वीर रायटर से साभार..)

6 comments:

  1. मैंने तो सिर्फ चित्र ही दिया था आपने तो कथा का महीन ताना बाना बुनकर सारे समाज्शास्त्रिय कारकों को संवेदना का जामा पहना दिया ! वाह बहुत बढिया !

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  2. कहानी तो बन नहीं पाई, पर जो भी बना बुना अच्छा है. बधाई.

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  3. ीलीमा जी अब आगे फ़ोटो के साथ अब कापी राईट भी छापिये कुछ पैसे तो ढीले होते प्रमोद भाइ की जेब से :)

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  4. आज तो सचमुच कहना पड़ेगा ... खूब लीखी :)

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  5. subhash_bhadauriasb@yahoo.comJuly 7, 2007 at 7:25 PM

    आपकी रचना धर्मिता को सलाम.
    एक ही मामले में देश आत्मनिर्भर है बच्चे पैदा करने में हम इसमें कोई विदेशी मदद नहीं लेते.ये भी ग़म ग़लत करने का नायाब तरीका है.हमारी मेहरारु नें हमें मौका ही नहीं दिया रिकार्ड बनाने का. का करें दुकान बंद
    मात्र दो की पढाई लिखायी में तनखा खर्च हो जाती है.खैर हम अन्यत्र अपना योगदान अभी भी दे सकते हैं.मित्र शत्रु के काम आने को हम हमेशा तैयार हैं.
    डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.

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