Sunday, July 8, 2007

भाषा के जादुई पहाड़ पर नीले सपने में..



ढिबरी की अधबुझी- टिमटिमाती-सी रोशनी लिए निकलता हूं. सट्टों, गड्ढों, पांड़े, पंडों के बहुत आगे जाकर खत्‍म होती है कहीं शहर-सीमा. उसके बाद शुरू होता है सफ़र असली अंधेरिया रात का..

एक फीक़ी, ग़र्दखायी, मुरझाई पैरों के निशान से मिटाई-छिपायी पगडंडी हो जैसे. या कभी यहीं-कहीं इसी दुनिया में थी खोज लो तो समझूं की नज़रें चुराती, सहमी चुनौती देती हो वैसे. शर्म और नमन में सिर झुकाये मैं भरे कलेजे याद करने की कोशिश करता वे सारे शब्‍द जो भुले जा रहे..

झाड़ि‍यों के पार कहीं रोते सियार. हवा की सनसनाहट बजती दूर तक साथ-साथ चलती. भूली हुई कोई अधखुली किवाड़ बीच-बीच में बजती बेदम किये रहे सारी रात जैसे. क्‍या तो थे यहीं तो थे कहां थे के सिलसिले रिस-रिसकर खड़खड़ाते दरवाज़े को एक मर्तबा फिर हिलाकर छोड़ जाएं चुपचाप..

कितनी दूर कांपती-सिहरती बही जाती फुसफुसाती बुलाती पगडंडी. यादों में धुल चुका एक गाना पुराना हौले-हौले अचकचाकर आंखें खोल अचानक पेड़ के चमकते पत्‍तों तक फैलकर बहने लगता. गुज़रे ज़माने के किसी मुंहज़ोर यार के शैतान बच्‍चे की तरह हंसने लगता.

और यकबयक आंखों के आगे भक्‍क-से भव्‍य, अनोखा पसरा दिखता. रत्‍न-मणियों से जड़ा रागिनियों में मढ़ा भाषा का वह जादुई पहाड़ होता. ओह, हुमसता-हंफहंफी छोड़ता ढिबरी फेंक जादुई जंगल में मैं किसी सिरफिरे बच्‍चे की मानिंद सुध खो बैठता. कंचों की तरह भरता जेब में बदहवाश शब्‍द बेग़ाने, पुराने. मात करता पहुंचे हुए चोरों को..

जब तक नीले रोशनी के जादू में सपना घबराकर अपनी आंखें न खोल लेता.

1 comment:

  1. टिप्पणी करने ही आया था..लंबी हो गयी और पोस्ट बन गयी .. आप भी देंखें...

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