Monday, July 9, 2007

आपने कभी मापा है?..

व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़! रात के अकेले में यह वाक्‍य सामने देखकर अचानक मन एकदम जाने कैसे विस्‍मय, कौतुक से भर गया है. सचमुच. मानवीय ज्ञान, समझ का नक़्शा.. कितनी उलझी, प्‍याज के छिलकों-सी कहानी होगी. छिलके एक बिंदु पर आकर ख़त्‍म हो जाते हैं, इस सवाल का जवाब कहां ख़त्‍म होगा. कैसे होगा.

टेली‍विज़न व अख़बारी सर्वेक्षकों के तात्‍कालीक सुख व सहूलियत के लिए भले विश्‍वविद्यालयी इतिहासकार-समाजशास्‍त्री रेडीमेड अनसर देकर अपना पिंड छुड़ाएं, मगर ज़ि‍म्‍मेदार सोचनेवाला तो शायद जवाब की जगह काउंटर क्‍वेश्‍चन करे.. सोच-सोचकर थकने लगे..

मानवीयता के किस चरण, किस प्रतीती का मैप.. कहां-किस मानवता का ह्यूमन नॉलेज़? वर्चस्‍व की छतरी के नीचे जीने का संस्‍कार पाए और उसी चश्‍मे से भूखंड पर अपने होने को देखते, ज़ाहिरा तौर पर हमारे लिए ह्यूमन नॉलेज़ के मैप के केंद्र में अमरीका ही होगा. कुछ लोगों के मानने में नहीं होगा. वर्चस्‍व की छतरी उनके स्‍वाभिमान को ठेस पहुंचाएगी तो वे इतमीनान से राष्‍ट्रीयता का छाता तान लेंगे और मानवीय ज्ञान के सेंटर में भारतीयता को आरोपित करने के लिए मचलने लगेंगे. लगेंगे नहीं, स्‍वाभाविक रूप से खुद को ऐसा करता ही पाएंगे. बर्चस्‍व की ताक़त के आगे अपने शक्तिहीन व लघु होने की राष्‍ट्रीयता की आसान, शॉर्टकट काट से आगे हमारी बुद्धि जाती नहीं. उसके आगे हम असमंजस और घबराहट के दायरों में उलझने लगते हैं. ऐसे उलझे सवाल का ईज़ी टीवी-फ्रेंडली अनसर हमारे हाथ कहां चढ़ता है. मैप और ह्यूमैनिटी के बारे में राय बनाने का मुश्किल काम माथे पड़ जाता है. इस मामले में, प्राचीन सभ्‍यता का होने की वजह से, हमारे साथ एक सुविधा यह भी है कि हम उस प्राचीनता का एक समूचा बीहड़ पुरालेखागार पीठ पीछे साथ-साथ लिए चलते हैं. और उलझाव के ऐसे मौक़ों पर अपनी समझ व संवेदना के अनुरूप वेद, पुराण, मिथ, ये श्‍लोक और वह ऋचा से चाहनेवाले सभी तरह के नतीजे निकालते रह सकते हैं.

अमरीका को गोली मारिये. यहीं अपने यहां से ही शुरू करते हैं.. कि ह्यूमन नॉलेज़ का जो मैप है उसके केंद्र में अनोखे, अद्भुत हमीं-हम हैं. सोचकर अच्‍छा लगता है ना? मुझे भी अच्‍छा लग रहा है. मगर मान लीजिए, सवाल यही रहता लेकिन जवाब देने के लिए आप यहां नहीं रहते.. जांबिया की किसी कंपनी की नौकरी में लगे होते, या क्‍वालालमपुर, या दमास्‍कस, या लिमा.. तब भी आपका यही जवाब होता? कि दूसरी राष्‍ट्रीयताओं के मित्रों से घिरे आपके ज़ेहन में कुछ नई स्‍थापनाएं, संसार की समझ का एक नया मानचित्र रजिस्‍टर हुआ होता.. और उससे पहले आप जो भी सोचते रहे हों, अब उस सोच को थोड़ा अपडेट, डेंटिंग-पेंटिंग करने की सोचने लगे हों?..

निर्भर करता है आपके अंदर, मानवीयता के आसान मुहावरों से अलग, सोचने का कितना मसाला है, और ‘सोच’ के बारे में आपकी खुद से कैसी-कितनी अपेक्षाएं हैं. क्‍योंकि थोड़ी गहराई में उतरते ही मानवीय ज्ञान, समझ का कोई एक इकहरा नक़्शा थोड़े तैयार होगा. कश्‍मीर में रहनेवाले के लिए कुछ होगा तो कन्‍याकुमारी के बाशिंदे के लिए कुछ. कोहिमा में रहनेवाले के लिए निश्‍चय ही इन दोनों समझों से अलग कोई और तीसरी ही बात होगी. फिर समाज-विज्ञान व भूगोल से जीवन में कभी साबका न रखनेवाले ऐसा नहीं होगा कि इस मसले पर अपनी कोई राय ही न रखते होंगे. उनके पास भी इस सवाल का कुछ जवाब होगा.. हो सकता है टीवी के खोजकर्ताओं के हासिल सेंसेशनल-शॉर्टहैंडी जवाबों से कहीं ज्‍यादा रोचक भी हो.

व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़? सोचिए, सोचिए, दिलचस्‍प सवाल है..

5 comments:

  1. सवाल दिलचस्प है। अब जबाब का इंतजार है।

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  2. रेडी मेड मुहावरे बहुत हैं.. रेडीमेड मसाला भी है.. क्रासवर्ड और्र लैंडमार्क में मिलता है.. मगर माद्दा कम है.. और फिर जिस तरह का जीवन मिल रहा है उपभोक्तावाद के कटोरे में उस में ज़्यादा सोचने की गुंजाइश कहाँ है.. फिर भी आप इतना ज़ोर दे कर कह रहे हैं.. तो कोशिश करेंगे..

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  3. अभी समीर जी के यहां से मोटापे के गुण पढ कर आपका लेख देखा तो लगा यहां भी वही मापने- वापने का मामला चल रहा है ;)

    आपने काफी दिलचस्प सवाल उठाया है जवाब तो इसका व्यष्टिसापेक्ष ही हो सकता है समिष्टि पर लागू नहीं होगा ! अपना अपना ज्ञान अपने अपने के मानदंड , हाथ से फिसलता जीवन संभाले उपभोक्तावाद के कटोरे में तडफडाता मानव....

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  4. वाकई बहुत दिलचस्प सवाल है-आप सोच रहे हैं कि इस सवाल का जवाब कहाँ खत्म होगा, कैसे होगा? मैं सोच रहा हूँ कि कहाँ से शुरु होगा, कैसे होगा?

    यहाँ तक तो आपने ही कह दिया कि यह सबके लिये अलग होगा. कश्मीर में रहने वाले के लिये और कन्याकुमारी में रहने वाले के लिये अलग. सत्य है मेरी समझ से भी. मगर वो अलग भी स्थिर अलग न होगा. अनेकों वजहों से भिन्न ही होगा. एक ही से दो व्यक्तियों के लिये, एक सा अनुभव प्राप्त करते हुये, एक ही स्थान पर रहते हुये भी वह भिन्न होगा. वजह होगी कि उसने उस अनुभव को कैसे समाहित किया, कैसे देखा और कैसे माना. ठीक वैसे ही कि आधा गिलास भरा या आधा गिलास खत्म.

    पुन:, जैसे जैसे नये नये अनुभव जुड़ते जायेंगे वैसे वैसे इस नक्शे का आकार भी बदलता चलेगा. हर लम्हा एक नया अनुभव देगा ठीक सागर की लहरों की तरह-या तो जमीन को कुछ हिस्सा दे जायेगा या कुछ और काट कर ले जायेगा, मगर बदलेगा जरुर. इसी लिये तो जो आज सबसे ज्ञानी नजर आये, वो कल भी सबसे ज्ञानी (ज्ञानवान भले ही विषय विशेष में) रहे, यह कतई आवश्यक नहीं. कई बार किसी समय विशेष में संकुचितता के दायरे में बंध व्यक्ति अपने आप को सीमित कर देता है. देखने का नजरिया बदल जाता है. ज्ञान की दिशा विपरीत हो जाती है और नक्शा फिर बदल जाता है.

    तब मुझे लगता है कि यह स्केच किये जाने वाले नक्शे नहीं होते और नही इनकी कोई निश्चित परिभाषा होती है. बस, एक अहसास की बात है. किसी की कोई सीमा रेखा नहीं, जहाँ तह चाहे- विस्तारे, जिस दिशा में चाहे –फैले और जहाँ चाहे-सीमाबंदी कर दे. सब समय, स्थान, व्यक्ति, माहौल और अनुभव पर आधारित बदलता हुआ चित्र है.

    मात्र मेरी सोच है. मेरा खींचा चित्र है. आपका और अन्य मित्रों का खींचा चित्र इसी आधार पर लग भी हो सकता है या शायद मिलता-जुलता. मगर एक तो कतई नहीं. अगर एक है तो यह मात्र सहमती है मेरे चित्र की.

    -समीर लाल

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  5. आपका ये सवाल कुछ वैसे ही सवाल खड़ा करता है जैसा अस्तित्व. जैसे अस्तित्व की परिभाषा संभव भी है और नहीं भी. वैसा ही कुछ-कुछ ज्ञान के बारे में भी लगता है. अगर ज्ञान की आध्यात्मिक ब्याख्या को छोड़ दिया जाए तो ज्ञान की राजनीति पर भी नज़र उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. जिस तरह अस्तित्व को जीते हुए उसका आभास कई बार नहीं होता वैसे ही ज्ञान की खोज में जुटे लोगों को उतना ज्ञान संतुष्ट कर सकता है जितना उनकी जिंदगी के तात्कालिक सवालों को हल कर दे. अस्तित्व को लेकर कही गईं बादल सरकार के नाटक एवम् इंद्रजीत की कुछ पंक्तिक्यां याद आ रही हैं. ईस्ट यही, गंत्व्य यही. निरपेक्ष ज्ञान जैसा शायद कुछ होगा नहीं.

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