Wednesday, July 11, 2007

शैतान का नाना और भूखा चूहा दीवाना..

आप चाहें तो अपनी पसंद अनुरूप श्‍वेताभ, व्‍योमकेश, रूद्रांशु जैसा तत्‍सम, आज के वक़्त का कोई फ़ैशनेबल नाम दे लें, मगर बच्‍चे का अपने लिए जो नाम था वह बड़ा सीधा-सादा था.. सुनील था. हालांकि वैसा वह था नहीं. न सीधा-सादा, न सुशील. पक्‍का शैतान था. शैतान का नाना था. शैतान का और-और जो भी हो सकता था वह सभी था. उससे भी कहीं ऊपर था. इसलिए फ़ि‍लहाल नीचे जा रहा था! ऐसा बच्‍चा ऊपर कहां जाएगा, नीचे ही जा सकता है ना?.. अब यह मत पूछिए नीचे कहा? ज़रा उलझी कहानी है.. नीचे गए हुए की नीचता, निचाई की कोई थाह है भला? फिर भी आइए, हम उस थाह में डंडी डालकर हिंड़ोरते हैं.. बाइस्‍कोप के गोल सूराख़ से सुनील-लीला के क़ि‍ले के अंदर का कारोबार देखते हैं..

बाइस्‍कोप के अंदर अंधेरे में क्‍या?.. हाथी.. खूउउउउब बड़ा!.. हाथी के दांत नहीं थे.. दिखाने को भी नहीं थे, और न छुपाने को सूंड़ था. दिख कुछ नहीं रहा था सिर्फ़ सुनाई पड़ रही थी.. समूचे क़ि‍ले को हिला देनेवाली एक चिंघाड़, गर्जना! सुनील न दिखते हाथी पर नहीं, सिर्फ़ सुने-जा-सकते गर्जना पर सवार होकर नीचे उतर रहा था. कह नहीं सकते कितना डरा हुआ था.. कि अंदर तक भरा-भरा हुआ था?.. मगर जो भी था उतर रहा था.. और इस ‘जो’ के साथ-साथ सुनील..

नीचे सिटी गार्डेन था? फुलों की कोई बग़ि‍या थी? क्‍या मालूम क्‍या था.. और वह ‘क्‍या’ इतना नीचे था कि फ़ि‍लहाल दिख नहीं रहा था! अलबत्‍ता महक आ रही थी.. खूब गमकवाली, मदहोश करती महक.. और इतनी ज्‍यादा थी कि तय करना मुश्किल कि उसे ‘सुगंध’ कहें कि ‘कुगंध’! कुगंध कह सकते हैं? आजतक तो कभी किसी को कहते सुना नहीं.. मगर आजतक जो नहीं सुना उसे आगे कभी नहीं सुनेंगे, ऐसा कोई नियम है? नियमवाली किताब में कहीं लिखा है? फिर सच पूछा जाए तो सुनील ने तो कभी किसी के मुंह से ‘सुगंध’ निकलता भी नहीं सुना..

किसी के मुंह से नहीं सुना, हवा में सूंघा बहुत दफ़े है!

उतरता गया नीचे.. नीचे.. नीचे.. बहुअअअत नीचे!.. रास्‍ते में एक कुम्‍हलाया हुआ चूहा दिखा. धीमे-धीमे बेमन महक की पंखुड़ि‍यां कुतरता हुआ भूख मार रहा था. टाईम मारने के टेलीविज़न या वीडियो गेम जैसे इंतज़ाम उसके पास नहीं थे. इसके पहले कि सुनील उसे देखता, चूहे ने ही सुनील को देख लिया, और ऐसी नज़रों से देखा, कि देखो, कैसा बुरा वक़्त आ गया है, कि पंखुड़ि‍यों को कुतर-कुतर कर भूख मार रहा हूं.. ज़ि‍न्‍दगी गुज़ार रहा हूं? मगर सुनील, जैसा पहले ही कहा गया, पाजी था; चूहे को सहानुभूति वाली नज़रों से देखने की जगह उसने उसे घिन्‍न में नाक-भौं सिकोड़ने वाली नज़र से देखा.. फिर भोलेपन से बात निकाली- मुझे सुशील समझने की गलती मत करना, मैं सुनील हूं!..

बदले में चूहे ने भी नथुने व मूंछें सिकोड़ी और जवाब में कहा- तुम जो भी हो, बड़े बद्तमीज़ हो.. इतनी गर्जना के साथ उतर रहे हो कि दिन भर की हवा प्रदूषित हो गई!

सुनील ने मासूम होकर जवाब दिया- गर्जना इतनी न होती तो मैं इतने नीचे न आ पाता और तुमसे मुलाकात न हो पाती..

चूहे ने इस पर गौर किया. फिर कहा- ऐसा? अच्‍छा तब ये बताओ, हमारी मुलाकात से ऐसा कौन कमाल हो गया?..

चूहे की बेवक़ूफी की बात सुनील ने पहले सुनी नहीं थी, मगर अब ताज़ा-ताज़ा अपनी आंखों के आगे देख रहा था. बेवक़ूफी का ऐसा प्रत्‍यक्ष प्रमाण पाकर वह हंसने लगा.. उसकी देखादेखी चूहे ने भी हंसने की कोशिश की.. मगर हंसी की जगह उसके मुंह से कुछ अजीब-सी आवाज़ निकली.. जिसे सुनकर भय में सिर्फ़ चूहा ही नहीं, सुनील भी चुप हो गया.. फिर राज़दारी में सिर से सिर सटाकर सुनील ने चूहे को एक पते की बात बताई- अब तक तुम्‍हारी दुनिया में क्‍या था? थोड़ी हवा थी, महक की पंखुड़ि‍यां थीं और एक अकेले तुम थे! अब देखो, मैं भी चला आया हूं और तुम्‍हारी दुनिया बड़ी हो गई है!..

चूहे ने अपना थूथन सुनील के सिर से अलग किया, और ताजुब्‍ब में भरकर कहा- तुम्‍हारे चले आने से दुनिया बड़ी हो जाती है?..

अबकी मर्तबा सोच-सोचकर बेवक़ूफ बनने की बारी सुनील बाबा की थी.. और चूहेराज जो थे हो-हो करके हंस रहे थे!..

(क़ि‍स्‍सा खत्‍म नहीं हुआ है.. यह तो महज़ टीज़र था..)

3 comments:

  1. टीजर अच्छा है. अब पूरा किस्सा सुनना चाहते हैं. चूहे और सुनील के रिश्तों का मनोविज्ञान जानने की उत्सुकता बनी रहेगी.

    ReplyDelete
  2. सुनील और चूहे की मुठभेड़ के वक़्त आप कहां पर थे?

    ReplyDelete
  3. @भूपेन जासूस,
    सुनील और चूहे की मुठभेड़ पर जो तुम चिंतन कर रहे थे.. मैं तब तुम्‍हारे चिंतन की जासूसी कर रहा था..

    ReplyDelete