Monday, July 23, 2007

दुनिया को कैसे देखें?..

फिर बाइस्‍कोप के अंदर एकदम अंधेरा उतर गया.. जैसे गुलाब जामुन रखने से मुंह में खुशी उतरती है.. या पैरों के नीचे से सांप गुजर जाए तो भय की झुरझुरी उतरती है, ठीक वैसे ही. बाइस्‍कोप ने अपना शीशा मला.. सुनील ने अपनी आंखें.. मगर अंधेरे की छतरी वैसी ही तनी रही. काली. घटाटोप. सब शांत. पिनड्रॉप साइलेंस. घड़ी के बाद घड़ी के बाद घड़ी के बाद कितनी तो घड़ी बीत गई. घड़ि‍यों का समय बीतता चला, घड़ि‍यों का रंग नहीं.. भोले मन को अलबत्‍ता उम्‍मीद बनी रही.. लगा अब बात बदलेगी, अचानक कोई हल्‍ला करता गिरेगा, जोकर हंसता हुआ घुलटी मारकर इस खिड़की से झांककर उस दरवाज़े से बाहर आएगा.. लेकिन नहीं आया.. न कोई न जोकर.. फिर जैसे सिनेमा हाल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक प्रोजेक्‍शन शुरू हो जाए, कुछ उसी तरह दृश्‍यों की बरसात होने लगी.. पुराने ज़माने के युद्ध में तीर बरसते हों वैसे.. सांय-सांय, सुर्र-सपाक्! चीन, जापान, फिनलैंड, उज़बेकिस्‍तान.. सब जैसे दृश्‍यों में आगे रहने का रेस दौड़ रहे हों जैसे! सुनील ने देखा और उसे हंसी छूट गई..

मगर सुनील की हंसी सुनकर दृश्‍य शर्मिंदा होकर ठहरे नहीं, भागते ही रहे.. अच्‍छा मज़ाक है, सुनील ने सोचा. यह मैं हक़ीक़त देख रहा हूं कि टेलीविज़न? सुनील के मुंह में चुईंग गम होता तो वह चुईंग गम चुभलाते हुए इस सवाल पर सोचता. फ़ि‍लहाल चुईंग गम के अभाव में वह यूं ही जबड़े घुमाता सोचता रहा.. तभी वह आवाज़ सुनाई दी.. करकराती.. किसी टेढ़े-मेड़े मशीन से दबकर निकली टेढ़ी-मेड़ी आवाज़ हो जैसे.. करकराती आवाज़ ने कर-कर-कर करते कहा- कोई फ़रक बचा है दोनों में? पहले हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था.. मगर अब हक़ीक़त देखने के लिए लोग हक़ीक़त में कहां देखते हैं? टेलीविज़न पर जो दिखता है उसी को हक़ीक़त मानते हैं.. टेलीविज़न से बाहर जो दिखता है उसे लोग सिनेमा या सपना समझते हैं! फिर तू ऐसे उल्‍टे सवाल क्‍यों कर रहा है? तेरी उमर के बच्‍चे जो करना भूल गए हैं, तू उस रस्‍ते क्‍यों उतर रहा है?..
तब जाकर वह दिखी! करकराती आवाज़ की मालकिन.. चेहरा भी वैसा ही करकराता.. सीधे हैरी पौटर के फ़ि‍ल्‍म से निकलकर आई हो जैसे! यही कहा भी शरारती सुनील ने..

- आप फ़ि‍ल्‍म के सीन से निकलकर आई हो?

करकराती आवाज़ वाली बुढ़ि‍या हंसने लगी.. माने खरखराती-सी कुछ आवाज़ निकली जिसे और कुछ कहने की बजाय हंसी कहना ही बेहतर होगा.. फिर अटकती हुई करकराहट में बोली- मैं समझी तू समझदार है, होशियार है.. लेकिन गलत थी! तू भी मुझे वैसे ही देख रहा है जैसे हॉरर की चार किताबें और तीन फ़ि‍ल्‍म देख लेने वाला कोई भी बच्‍चा देखता! मैं कोई टीवी के परदे पर दिख रही खल-कुटिल शैतान की खाला थोड़े हूं.. रोज़ थोड़ी-थोड़ी बुढ़ा रही बुढ़ि‍या हूं, बस?

सुनील को विश्‍वास करने में दिक़्क़त हो रही थी.. लेकिन खुद को समझदार, होशियार न माने जाने से और दिक़्क़त होती.. गाल पर हाथ धरे वह जिम्‍मेदार बच्‍चे की तरह बु‍ढ़ि‍या के नज़दीक खिंचा चला आया..

बुढ़ि‍या बुदबुदाकर धीमे-धीमे बोलती रही- आसपास की दुनिया को देखने का तरीका होता है, बेटा.. आसपास की दुनिया को तुम टीवी के परदे की हक़ीक़त की तरह देख सकते हो.. और चाहो तो उस हक़ीक़त के बीच खुद को खड़ा करके देखो.. फिर हक़ीक़त टेलीविज़न का दृश्‍य नहीं रहेगा.. उसके मतलब बदल जाएंगे.. और उस मतलब के बीच खड़े तुम भी खुद और दुनिया के लिए बदल जाओगे!

- आपकी बातें बड़ी टेढ़ी हैं.. सुनील ने शिक़ायती लहजे में कहा..

बुढ़ि‍या खों-खों करके हंसने लगी.. सुनील ने देखा उसके मुंह और आंखों से फूल झड़ रहे हों जैसे.. टेलीविज़न के शो वाले तरीके से नहीं.. असली, सच्‍ची के जैसे!

(जारी..)

2 comments:

  1. फिर ? आगे क्या हुआ ?

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  2. वाकई, बुढ़िया की बातें तो टेढ़ी हैं..आगे बताया जाये.

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