Wednesday, July 11, 2007

लंगीवाले का गीत..



घोड़े पे चढ़ गाड़ी में आ
लंगी वाले लंगी लगा
कुछ लूट ले थोड़ी फूंक ले
फिर इसको दे उसको सुना
मां-बहन और क्‍या..
रोतों को और रुला
हारों का दुख कर हरा
लंगी वाले लंगी लगा..

बच्‍चों के बस्‍ते गोल कर
दोस्‍तों का तू मोल कर
खिड़की पर पेशाब कर
मेरी सुबह खराब कर
झूल जा मस्‍त रह
दे झन्‍नाटा एक हाथ घुमा
हंसते-हंसते दस लात जमा
लंगी वाले लंगी लगा..

सूने गर्दी में रंग जमाने आ जा
पिटे हुओं का फिर पीट ले
रंग दे बजा जा थोड़ा बाजा
सब तेरा नाम सुनायेंगे
जाने के बाद भी गाएंगे
पुलिस करेगी घंटा
बस अपना होगा टंटा
गुटका खा धन्‍य रह
कर जीना सबका हराम
धांय कर सबको टांय कर
जो बचते हैं
उनको तलवार पे उठा
लंगी वाले लंगी लगा..

8 comments:

  1. वाह वाह कहने से आप वैसे ही चिढ़ते हैं जैसे मामू नाक का जिकर करने से ..तो वाह वाह तो हम करेंगे नहीं..पर किस पर ये गुस्सा उतारा जा रहा है.. ??

    इतना ना गुस्सायें.

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  2. प्रमोद जी,बहुत बढिया लंगी लगाई है।

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  3. गीत अच्छा है जी

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  4. लंगी वाले को बताया कि नही‍ कि सुबह खराब करने पर क्या सज़ा मिलती है ?

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  5. परमोद भईया ने लंगी लगाई
    कुछ ढंग की कुछ बेढंगी लगाई अज़दक जी की लंगी में हमेशा
    घंटा और टंटा क्‍यों होता है
    लात और घात क्‍यों होता है बहुत हो गयी लंगी टंगी
    चलो अब कुछ और करें
    इस सब को ताक पे धरें
    आओ भईया रस्‍ता बदलें

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  6. आकर्षक शैली में लिक्खा गया कविता नुमा गीत या गीत नुमा काव्य

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  7. आप तो पद्य शिल्प में ही लंगी लगा दिए। बड़े बड़े कवि ढेर हो जाएंगे। लंगी लगाए बिना बात नहीं बनती। अच्छी कविता है।

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  8. धन्‍यवाद दोस्‍तो, प्‍यारे यूनुस..
    बीच-बीच में झल्‍लाया.. छटपटाया तुक, तक़लीफ़ का यह सस्‍ता गाछ मैं गोड़ने-कबारने लगता हूं.. कभी कुछ बिम्‍ब निकल आते हैं, कभी सिर्फ़ हाथ और गोड़ ही चलता रहता है.. तो बातों की लात चलाने से हमें रोकने की आपकी गुज़ारिश हमारी बैसाखी छीनने जैसी मांग लगती है.. कम से कम ये गुस्‍सा तो न छीनें.. वैसे बीच-बीच में गाना भी तो गुनगुनाते ही हैं.. नहीं?

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