Thursday, July 12, 2007

हिरदय से पुरनका परेम का परकास मेटाना असान काम है, जी?..

प्रेम परकास प्रियतमा बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को पत्र..

हमरे मन की मलकिनी, प्‍यारी, दुलारी सकीना, कइसी हो, सखी? न खत, न कवनो खोदा-बंदगी, कवन बात है कि हमसे आंखी मोड़ ली हो?.. कवनो गलती हुआ, कि पिछलका चिट्ठी में हम कवनो ऊंच-नीच लिख लिये थे? गलती होइए गया था त माफ़ नै करोगी? ई कवनो इमली का गाछ का नीचे ढेला फेंक के इमली खाने वाला दिन नै न है, जी.. कि सकाली में हमरे व्‍योहार से तुम रुस जाओगी अउर संझा बेला हम दूनो जने मिट्ठी कै के लभली अउर अनितवा का संगे अंगना में डाक्दर-नरस खेलेंगे! अब त एक हाली कुच्‍छो छोटका टुंग-टांगों हो जाता है त ओकरो फरियाये में बीस दिन गये पोखरी में.. नै? अब मनु मौसिये का केस लो.. हाथ का एचमीटी घड़ी तनकी सा पानी पी के बन्‍न हुआ, अभिये ले बंदे पड़ा है! अपना शादी का बेर से सुन रहे हैं कि रिपेनरिन बास्‍ते सहर जाने का जोजना है, मनु मौसी का घड़ि‍या अब ठीक हुआ त तब ठीक हुआ.. मगर घरे सब जानता है कि ऊ घड़ी अब ई लैफ़ टैम में कब्‍बो ठीक नै होगा. आजकल केकरा काजे फुरसत है, सखी.. छौ साल का लइकियो का लग्‍गे फीता-रिबन का टैम नहीं है.. हाथ-गोड़ फेंकने लगती है! तब्‍ब? हम झुट्ठे थोड़े बोल रहे हैं? सब ओर भागाभागी मचा है.. त ई भागाभागी में तुहू हमको भूल जा त कवन ताजुब्‍ब!..

सच्‍ची बता सकिनिया, कवन बात है, रे? काहे मुंह में जोरन डालके चुपाये बइठी है, मुंहजार? कि मियां जी का नेह-दुराल में तोहरा मोहलते नई भेंटा रहा है! सच्‍ची बोलना, मुंहजार, नै त आके चइली-चइली पीटेंगे अउर सब तोहार मेंहदी वाला केस में आगी जार देंगे, तब बूझेगी, हां?..

कवन बात का एतना लम्‍मा खमोसी है, बोल ना रे! अइसन सारू खां हैं तोहरे नूर मुहम्‍मत कि हमरा खोजो-खबर नै ले रही हो? केतना जोड़ी चानी का पैजेब अउर झुमका बनवा दिये हैं खसम मियां कि जनम-जल्‍मांतर का सहेली को भुलाय गई हो? मगर ऊ भलमानस का कवनो कसूर नै है.. तूहिये हरमेसा की पुरुस-प‍रकिनी है.. जरा-सा नेह भेंटा गया त झट्ट देना फूलके लाल कोंहड़ा हो गई! झोंटा खोलके तेल-सैमू करने लगी.. अलता-लिस्‍टीक का लाली बहरियाने लगी, हम तेरा नस-नस पैचानती हूं, चोट्टी?

सकिनिया रे, मस्‍ती-मजाक एक कोना, अब एगो सीरियस बात है, सखी! मन का राज तोहरा आगे खोल रहे हैं, खोदा कसम केहियो से नै बोलोगी! अपने मियां जीओ से नै, हां, तोके हमरी कसम?..

बात ई है कि सकाली-सकाली टूब बैल पे हम कपड़ा-लत्‍ता धो रहे थे कि जाने कहां से ई चहुंप गए! अरे, हमरे ऊ नै, न बुड़बक.. परेम परकसवा, रे? अब हमको का मालूम कि बम्‍मास गांवे में लुकाया हुआ था अउर अकेले में हमको घेरे का मवका देख रहा था! बड़ नीच इरादा से हमरे काजे आया था, हम अड़ देखे न तड़, नजीके में एगो चइली पड़ा था, खींचके मारे मुंहजार को! तब्‍बो बेसरम बाज नै आया अउर फुरफुस-फुरफुस जाने कौ-कौची बोलते गया.. हम डेरा के मनु मौसी का हल्‍ला किये तब कहीं ले ऊ चोट्टा भागा!

भागे-भागे हम्‍मो घरे आए मगर मम्‍मी जी से का बोलते? बात का कवनो लीकेज होता त मौसी जी अउर मम्‍मीजी हमहीं को लेच्‍चर पिलातीं! रात में खायो का भी मन नै किया.. अकेले में चुप्‍पे चदरी ताने जाने पोराना दिन का यादी का सब सिलेमा देखते रहे.. का मालूम परकास को चइली मारके ठीक किये कि गलत.. ऊ बेचारा का कवन कसूर? हो सकता है अबहीं तलक हमरा से परेम करता हो? हिरदय से पुरनका परेम का परकास मेटाना कवनो असान काम है, जी?..

हम सही किये कि गलत, तू ही फैसला बोल, सखी!

तुमरे जलम-जलम की सहेली,
बेबी कुमारी राय

1 comment:

  1. हिरदय से पुरनका परेम का परकास मेटाना कवनो असान काम है, जी? सही बात है। लेकिन जो किये ठीकै किये।

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