Friday, July 13, 2007

फिर-फिर तिनका जोड़ता..

इतनी सारी बातें कह देने की बेचैनी.. एक के बाद एक.. ताबड़तोड़.. बरसाती फिसलन भरे मैदान में सस्‍ता फुटबॉल लिए कोई लड़का जैसे ज़ि‍द में अकेला खेलने चला आए.. और बेसुध पैरों के बीच घंटों बॉल को ठुमकाता-उड़ाता दौड़ता बझा रहे! इतने सारे शब्‍द निकले चले आते हैं. उनके निकलते चले आने का.. क्रम में सजता चलते देखने का एक अपना सुख है.. शायद एक स्‍तर पर बच्‍चे का रेत में देर तक कलाकारी करके घर बनाने व कुछ दूरी से खड़ा होकर उसके आत्‍ममुग्‍ध अवलोकन से बहुत अलग नहीं.. जिसके बाबत अनूप शुक्‍ल के एक पोस्‍ट पर अभय ने कुछ दिनों पहले एक निहायत क्रूर, निर्मम टिप्‍पणी की थी. निर्मम थी इसीलिए ही गलत नहीं हो गई. शब्‍दों का अन्‍तरंग, विचारवान, उद्दि‍प्‍त लोक हमारे लिए मतलब रखता है तो बीच-बीच में ऐसी टिप्‍पणियों की समझ के ताप के नीचे से गुज़रते रहने की आदत सीखते रहनी चाहिए. आपकी ज्ञानात्‍मक संवेदना का हिस्‍सा होकर निजी समझ में जितनी जल्‍दी.. जितने गहरे यह चेतना घुस जाए, बेहतर. फिर किसी अभय की ज़रूरत ही न रहे.. आप ही अपनी तीसरी आंख हों.. अच्‍छा ख़्याल है, नहीं? पर यह सब क्‍या इतनी आसानी से होता है? हो पाता है?..

अपने रचे छायालोक का मोह! आह, कैसी, क्या-क्‍या तो उनके भीतर ज़ालिम अदायें छिपीं, गुंफित होती हैं.. कैसे-कैसे तो गुप्‍त, छल्‍लेदार आत्‍मालाप चलते हैं! निर्मम समझ के चश्‍मे की ताप के नीचे लाकर धड़ से एक ही मार में उन्‍हें ज़ि‍बह कर दिया जाए? संभव है? उचित होगा?..

ओह, जाने क्‍यों सोचकर सिर चकराने लगता है.. मानो अभी ठीक-ठीक चलना न सीखे ढुलमुलाते बच्‍चे के कमर पर पंजा मारके उससे उसका कौशल साबित करने की ग़ैरवा‍ज़ि‍ब मांग की जा रही हो!..

शायद मैं भावुक हो रहा हूं.. शायद लच्‍छेदार बुनावट के बावज़ूद मेरी सोच वैसी ही पोली हो जैसे अपनी कविता की आलोचना के डिफ़ेंस में निरंजन श्रोत्रिय देर तक अपनी सृजनत्‍माकता की बात करते दिखते हैं, उस सृजनात्‍मकता में उनकी ढेर सारी मेहनत भी दिखती है, लेकिन इतनी सारी मेहनत हमारे पहले से जाने हुए में कुछ, ज़रा-सा भी नया जोड़ नहीं जाती..

संभव है मैं भी बेकली की बहुत सारी मकड़जाल ही बुन रहा होऊं.. जो धुंधलकों में मुझे ढेर सारा यहां से वहां दौड़वा भले रही हो.. उस मेरे घुप्‍प् अंधेरों के भीतर कोई खिड़की तुड़वा नहीं रही हो.. हो सकता है.. मैं जानता नहीं.. अभी तो नहीं ही जानता.. शायद धीमे-धीमे की अनगिन ढेरों कोशिशों के बाद कभी, किसी वक़्त जानने लग जाऊं? मगर उसका भी दावा नहीं करता!..

लेकिन फ़ि‍लहाल.. ये जो यहां और वहां से बहते चले आ रहे इतने सारे सोते हैं.. कभी कुछ फुसफुसाके कानों में कह जाते हैं.. कभी बस यूं ही बहते चले जाते हैं.. निरर्थक, बेमतलब-से दिखते.. ऊबड़-खाबड़, बेतरतीब.. मेरे लिए उनके अंदर कहीं एक अप्रकट, सुप्‍त कलकल-छलछल छिपा-गूंजता पड़ा है.. बाजवक़्त बहुत मार्मिक ध्‍वनियां व अर्थों के कुहरीले मैदानों की एंट्री पॉयंट हो जैसे! अपने ख़ि‍लाफ़ भावुक, आत्‍ममुग्‍ध प्रलाप के आरोपों की क़ीमत पर भी अपनी यह पोटली मैं छाती से लगाये रखना चाहता हूं.. बिम्‍बों व विचारों के इस पेड़ से उस पेड़ फुदकते हुए नित नए उलझे, बेसिर-पैर के शब्‍दजाल गूंथते रहना चाहता हूं..

आपको कौतुक सूझे, छेड़न का आनंद आए तो भले आप गंदगी फैलानेवाला घोंसला मानकर इन्‍हें तहस-नहस करते फिरें.. मैं फिर-फिर तिनका जोड़ता उन्‍हें खड़ा करता दिखूंगा!..

3 comments:

  1. सही है। अपने रचे-लिखे को खारिज कर पाना बड़ा संयम का काम होता है। ब्लाग जगत में यह सुविधा है कि इधर लिख उधर टांग दिया। आदमी जैसा है वैसा दिखने के काफ़ी नजदीक पहुंच जाता है।
    :)

    ReplyDelete
  2. इस तरह की चीज़ें और लिखने के लिए मेरी शुभकामनाएं लिए रहिए..

    ReplyDelete
  3. सही है , सही । लिखते रहिये ।

    ReplyDelete