Saturday, July 14, 2007

तू दूसरा का अमानत है, बेबिया!..

प्रेम परकास प्रेयसी बेबी कुमारी राय को सखी सकीना का पत्र..

हमरी हलुवा, लौंगलता, हमरी तिलकुट.. रंगनाथ हेयर सैलून वाली गली के अख़ि‍र में ठेला की चटख़ घुघनी माफिक हमरी दिलअज़ीज़ बेबी! केतना तो तेरे को मिस करते हैं, रे? रोज़-रोज़ केतना हाली तो तोहरे बहाने घर-दुआरी का काज छोड़के बतकुट्टन का बाती बाले रहते हैं- कल्‍ले डेराइबर साहेब पूछ रहे थे कि अपना बेबी से मिटिन कब्‍बे करवाइएगा?- और तू कहती है तेरे को मन से उतार दिये! तोहरा को मन से उतार देंगे तब ई मन में कौची बचेगा, छौंड़ी? छुच्‍छल, निरजन, सूनसानी को तोहरे सिवा दुनिया में और कोई पूर नहीं सकता, बेबी.. सच्‍चो, तोहरा किरिया खाके बोल रहे हैं!..

हमरा बारे में जाने कहंवा से तुम एतना ख़याली खीर रांधते रहती हो.. अरे, हिंया बइठा कौन है चुनरी के नजीक.. मथवा का गमक लेने को जेकरा बास्‍ते तेल-सैंपू और लिपिस्टि करेंगे? इनको तो घर आए छौ दिन हो रहा है! जब ले भट्टा वाला काम धरे हैं, घर में गोड़ धरे का सुभीते नहीं रहता.. कल डेराइबर साहेब को देखके त हमरा चेहरे उतर गया! खबर किये कि काम का बहुत मारामारी है, ई हफ़्ता घरे आये वाला सूरत नै बनेगा! इंहवा रहते थे तब्‍बो ई नहीं था कि सगरे दिन हमारा गोड़ गोदी में लेके आलता रंग रहे हैं.. हमरे बास्‍ते पाज़ेब और कनफूल बना रहे हैं- जइसा तू मने-मने, बदमाश, बाना बुन रही है!

जब से ऊ पतंगवाला काम छूटा, रोज़ इफ़्तार चचा के हिंया जाके चिलम लेके बइठे रहते थे! दस बेर तो खुद हम्‍म बोले होंगे कि ऊपर खुदा सब देखता है, मातम कै के किसका भला कीजिएगा.. ज़ि‍यादा टेंगसन है, त ठीक है, घरे मत रहिये, जाइए, जाके मज़ि‍द बैठिये.. त मुंह फुलाके दिन-दिन भर गायब रहते.. रतिया को लौटते त मुंह से दारु का अइसा दुर्गन्धि छूटता कि का बोलें! उल्‍टा-सीधा जइसो था एकरा तसल्‍ली तो रहता था कि मरद नज़र का सामने है! दू महीना हुआ ई भट्टा वाला काम भेंटाने के बाद त अब हमरी बुद्धिये काम नहीं करती कि ख़ुदा को शुक्रिया बोलें कि अपना किस्‍मत को रोवें! पांच-पांच, छै-छै दिन निकल जाता है, इनका पते नहीं रहता. पूछो तो गुस्‍साके रंडी-संडी का गाली बोलने लगते हैं. डेराइबर साहेब बता रहे थे सब जड़ कंटेट्टर है.. भट्टा पे काम करेवाला सब मजूरन का जीना हराम कै के रक्खे है!..

लेकिन डेराइबर साहेब बहुत नीमन आदमी हैं.. बीच-बीच में उनका कपड़ा-लत्‍ता का बदली और दूसरा ज़रूरत लेवे बास्‍ते चल आते हैं.. बहुते शरम-लिहाज़ वाला आदमी.. चाय पिलावे खातिर भी चिरौरी करनी पड़ती है.. हम्‍मो का करें.. बेशरमी से निहोरा करते हैं? कि केकरो से ज़रा दिल का बात कै लें!.. गलत करते हैं, सखी, त बोल?.. रोटी सेंक लिये, कपड़ा धो लिये, ओकरे बाद? अकेले दीवाल तकते-तकते जी घबराने लगता है! तोहरी बड़ याद आती है, बेबिया, सच्‍चो में?

डेराइबर जी पहले असम और गुजराती में बड़का साहब लोग का नौकरी में थे.. आठ महीना से इधर हैं.. ज़नाना-बच्‍चा का बारे में एक दिन पूछे तो शरीफ़ आदमी मुंड़ी नीचे कै लिए! एकरा कौची माने होगा, रे बेबी? हमको मगर बहुत अच्‍छा लगते हैं! ऊंचा कद-काठी है, महीन-महीन मूंछ है, ऊ जैसे पाकिज़ा वाले राजकुमार का नै है?

और ई तुम परेम परकास का उल्‍टा-सीधा कौची बोल रही हो? सहेली, एतना ही बोलेंगे कि सावधान रहना, हां! कौन त कह रहा था कि ई डकैती-सकैती में इबाल्‍व है? पुरनका दिन में जो गलती हुआ सो हुआ, अब तू दूसरा का अमानत है, बेबी!

तोहरे ललकी टिकुली वाले दमकते मुखड़ा को मन में बसाये बइठी..

तोहरी ज़ि‍न्‍दगानी की राज़दार,
सकीना

5 comments:

  1. जवाब नहीं इनकी मन की हिलोड़ों का..

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  2. अहा हा...डलेवर साहेब केतना आच्छा आम्दी हैं. भलमानुस.

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  3. सही राज़दार मिली है बेबी को । लेकिन हर जगह लव ट्रायं‍गल ? ये ठीक नहीं ।

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  4. पत्राचार सिरीज़ का अब तक का सबसे बेहतरीन नमूना...लूट लिया, बहुत सुंदर, आनंद आया.
    अनामदास

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  5. अद्भुत, गजनट, वाह। ऐसे गद्य के नमूने दुर्लभ हैं।

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