Sunday, July 15, 2007

जो ब्‍लॉगर्स मीट नहीं था..

इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय वाले दिनों में विमल हमारे रूममेट हुआ करते थे. बाहर समाज की बड़ी हिस्‍सेदारियों में हम साथ-साथ के भागीदार थे, वही भावुकता हमसे रूम भी बंटवा रही थी. जब भी मौका बनता है, विमल उन दिनों की राजनीतिक सक्रियता के ढेरों सांस्‍कृतिक चुटकुले मज़ा लेकर सुनाते हैं.. हो-हो करके हंसी भले आए मगर हर बार मुझे ताजुब्‍ब होता है कि कैसे विमल को सब बातें याद हैं, जबकि मेरे अवचेतन में उस समय की कोई धुंधली स्‍मृति भी नहीं बची! कुछ टेढ़ी-मेड़ी लकीरें हैं.. बाकी सारी घटनाएं व अजीबो-गरीब चरित्रों का वह रंगदार मोंताज़ दिमाग से पुंछ गया हो जैसे! कल फिर ऐसा वाक़या हुआ कि यह मोंताज़ जीवित हो उठा और उनके याद आने की मेरी हैरत पर अभय का जवाब था कि स्‍मृतियां सिस्‍टम से डिलीट कभी नहीं होतीं.. रीसायकल-बिन में पड़ी रहती हैं..

पुराने दिनों के दोस्‍तों से गाहे-बगाहे मिलना होता रहता है लेकिन इकट्ठे चार लोगों का एक जगह बैठने की घटना बहुत दिनों बाद हो रही थी. विमल, अभय, अनिल और मैं सब ब्‍लॉग लिखते हैं, लेकिन विमल के बार-बार छेड़ते रहने के बावज़ूद यह ब्‍लॉगर्स मीट नहीं थी.. अभय के यहां जब वह हुई थी तब अनिल या विमल उसमें शामिल होने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर नहीं आए थे. कल अनिल के नए और खुले घर में हमलोगों का इकट्ठा होना ब्‍लॉगर्स मीट से ज्‍यादा आर्ट ऑव लिविंग की गैदरिंग समझी जानी चाहिए. रोज़मर्रा की अपनी-अपनी बेचैनियों को अलग-अलग जीते, पुरानी संगत की अंतरंग समझ व चमक में, हम अपना-अपना प्राणायाम सीखने की कोशिश कर रहे थे. न जानने की शर्म व जान चुकने के दंभ की सामाजिक धकमपेल से मुक्‍त, बहुत दिनों बाद, घंटों हम एक-दूसरे की सा‍मयिक समझ के अपडेट को शेयर कर रहे थे.. एक-दूसरे के अंधेरों में छोटे-छोटे लालटेन जला रहे थे, पगडंडिया खोल रहे थे..

बातें सुनते हुए उत्‍साह में कई मर्तबा लगा कि मेरी जेब में पैसे होते तो कल ही अभय और अनिल को तीन-चार किताबों के लिए कमीशन करके मैंने साइन कर लिया होता. अभय आज सुबह टीवी की किसी चिरकुट लिखाई के लिए कंप्‍यूटर के सामने बैठने की जगह अपनी किताब का खाक़ा लिखने बैठे होते जिसमें साफ़ किया जाता कि आख़ि‍र क्‍या वजह है कि पंचमेली तत्‍वों के रेसिपी से तैयार श्रीमद्भगवतगीता हिन्‍दुओं के बीच इतना महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखता है.. असंख्‍य हिन्‍दू देवी-देवताओं की समाज में स्‍थापना व शंकर के हीरो होने की पीछे की असल पेंचदार कहानियां क्‍या हैं.. और लगभग प्रभुत्‍व व अपना मतलब खो चुके ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को वापस कैसे जीता..

दिलचस्‍प किताब बनती या नहीं? शायद इतिहास का ऑथेंटिक टेक्‍स्‍ट नहीं होता लेकिन इतिहास संबंधी हमारी बनी-बनायी मान्‍यताओं को क्‍वेश्‍चन करने की एक ले-मेन वाली लोकप्रिय रीडिंग ज़रूर होती.. लेकिन फ़ि‍लहाल अभय उसे लिख नहीं रहे हैं.. टीवी वाली लिखाई करके इस महीने के बिलों का पैसा इकट्ठा कर रहे हैं..

जैसे अनिल भी अभी वह किताब नहीं लिखने बैठे जो इस सवाल के गंभीर अन्‍वेषण में जाए कि आख़ि‍र क्‍या वजह है कि समाज में आमूल-चूल परिवर्तन की बात करनेवाले नक्‍सली दल मोस्‍टली समाज के हाशिए पर ट्राइबल्‍स के बीच ही सेंटर्ड हैं.. किसानों तक से कटे हुए.. समाज की हर मैटर करनेवाली ताक़त से कटे हुए दिल्‍ली जीतने के उनके सपने किस हद तक रूमानी, फूहड़ व फ़रेबी हैं.. आर्थिक इकाईयां काम कैसे कर रही हैं.. ग्रासरूट लेवल पर उनके नियंत्रण व जवाबदेही के लिए.. कल के सुनहले भारत के लिए.. किन-किन स्‍तरों पर सार्थक पह‍लकदमियां ली जा सकती हैं आदि-आदि..

एक किताब का ख़ाक़ा मेरे पास भी है.. लेकिन फिर.. मुसीबत वही है कि मेरे माथे भी दस तरह के बिलों के भुगतान के लिए पैसों के बारे में लगातार सोचने की चिंता है!..

विमलजी अलबत्‍ता हो सकता है कल की मीट से इस कदर रीचार्ज़ होकर लौटे कि घर लौटते ही उन्‍होंने तीन पोस्‍ट दाग़ दिया!

(ऊपर तस्‍वीर में इलाहाबाद के दिनों के पुराने चेहरे: खड़े हुए सबसे बायें विमल, नीचे बैठे हुए बीच में दांत दिखाता मैं, सबसे दायें अनिल. अभय नहीं हैं.. तस्‍वीर से बाहर वह एक लड़की के पीछे घूम रहे थे, तस्‍वीर में खड़े होकर फ़्रेम होने की उन्‍हें तब फ़ुरसत नहीं थी..)

7 comments:

  1. इस तरह की भली भली बातें लिख कर आप हमारे किताबी अरमानों को हवा तो ज़रूर दे रहे हैं.. मगर वो तस्वीर और लड़की वाली बात सब को बता कर आप ने अच्छा नहीं किया.. हाय.. अब हमारी स्वामी छाप इमेज का क्या होगा?

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  2. फैज़ ने कहा था ना-‘मुझसे पहली सी मुहब्‍बत मेरे मेहबूब ना मांग, हैं और भी ग़म ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा, राहतें और भी हैं, वस्‍ल की राहत के सिवा’ । ग़मे-रोज़गार ने अगर कहीं अटका रखा है तो वही एक दिन इस अटकन से बाहर निकालेगा और जो करना चाहते हैं उसका रास्‍ता खोलेगा । आपकी लिखवार पढ़कर अच्‍छा लगा । अपने पुराने दोस्‍त याद आ गये । जो अब अलग अलग शहरों में हैं और कभी कभार फ़ोन पर ही मिलते हैं ।

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  3. आप तो बडी जल्दी मुद्दे पर आ जाते हैं कायदे से आपको लिखना ये चाहिये कि "हम तो पहले ही पहुंच गये थे पता नही वेन्यू यही है कि कही शिफ़्ट कर दिये सब लाल वाले आ गये तो ठीक से बतिया नही पाएंगे और ना जाने क्या क्या और जब मिले आहा आहा वाह वाह गज़ब करते हैं आप ,बतियाते बतियाते सांझ हो गई, फलनवां बहुत लाल लाल लिखता है इसको कहें कि अपने रंग में थोड़ी पियरी मिला के लिखो और ना जाने क्या क्या. वैसे पहले भी हम बहुत बार मिल चुके हैं पर इस "मिलन संध्या" का आंखों देखा हाल पहली बार पढा है.वैसे भी जब भी हमसभी मिलते हैं वो पल सुखद तो होता ही है और ब्लाग की वजह से सुबह सुबह छ्प भी जाये तो पढ कर मज़ा तो आएगा ही लेकिन अभय आप और अनिलजी को मैं धन्यवाद देता हूं कि आपने ब्लाग की दुनियां से मेरा परिचय करवाया जो सुखद है..

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  4. सचमुच कल का मिलना काफी कुछ ऐसा सार्थक दे गया जो कई किताबें पढ़ने से भी संभव नहीं था। जैसे, मेरे लिए ये एकदम आंखें खोल देनेवाली बात थी कि हिंदुओं के मंदिर और मठ बौद्ध धर्म को पराजित करने के लिए उनकी नकल में बनाए गए और फिर कैसे अग्नि, वायु, इंद्र जैसी प्राकृतिक शक्तियों के उपासकों को शिव, गणेश, राम, कृष्ण जैसे चेहरे गढ़ने पड़े। वाकई अभय जी की समझ बड़े काम की है।

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  5. बहुत अच्छा लगा इस मुलाकात के बहाने काफ़ी कुछ जाना। स्‍मृतियां सिस्‍टम से डिलीट कभी नहीं होतीं.. रीसायकल-बिन में पड़ी रहती हैं.. क्या बात है। यह लेख कल से सामने था। सोचते रहे आराम से पढ़ेंगे। अब पढ़कर इसे किनारे कर रहें हैं। :)

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  6. हां दांत निपोरे फोटो बहुत प्यारी लगी। ये अपनी अधलेटी फोटो के बजाये ऐसे ही कोई खिलखिलाती फोटो लगायें अपने ब्लाग में।:)

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  7. अब पढ़ पाये, मजा आया. तस्वीर अच्छी लगी. कितनी यादें न जी जाते होंगे आप इन पुरानी तस्वीरों को देख.

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