Monday, July 16, 2007

हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्‍या है..

मालूम नहीं अंग्रेज़ी में वह क्‍या करता है. हिंदी समाज में लेकिन वह बहुत सक्रिय पाया जाता है. उसकी फ़ोनबुक में सभी महत्‍वपूर्ण लोगों के नम्‍बर और घर का पता-ठिकाना मौज़ूद होता है. मैटर करनेवाले सभी नामी-गिरामियों के साथ उसने पहले ही चाय पी रखी होती है, उनके लतीफ़ों पर हंस चुका व उनके स्‍वास्‍थ्‍य के अंतरंग रहस्‍य अपनी जेब में लिए टहलता होता है. वह हमेशा चहकता, कौतुक व सत्‍ता की अनगिन कहानियों से सबको चकित करता, मूलत: राजधानी के फैलाव और संभावनाओं में डूबता-उतराता दिखता है.. मगर कभी-कभी उसके पंख राजधानी से बाहर दूसरे शहरों में भी पंजा मारने को उड़ते हैं.. लेकिन बहुत दूर निकलकर भी वह राजधानी से बहुत दूर कभी नहीं होता.. और किसी बड़े राजकीय जलसे या ईनाम के मौके पर हंसता, सबको हंसाता.. निर्विवाद तरीके से वापस राजधानी में ही पाया जाता है! राजधानी में उसका न होना, हो पाना उसके जीवन के सबसे शोकपूर्ण दिन होते हैं.

अक्‍सर उसकी पैदाइश, परवरिश छोटे शहर से हुई होती है. छोटे-छोटे सधे कदम भरकर फिर अकस्‍मात वह बड़ी राजधानी में आ धमकता है. विनम्र व छोटा दिखने की उसके पास ढेरों लुभावनी अदाएं होती हैं, मगर छोटा वह कतई नहीं होता. जल्‍दी ही अपने को बड़ा व तोपख़ां समझने वाले ढेरों जोकरों के पंख कुतर, उन्‍हीं के कंधों में पैर धंसाता, तेज़ी से सफलता के मीनार चढ़ रहा व बढ़ रहा होता है. आजू-बाजू घायलों व तक़लीफ़ में कराहती, गालियां बकती एक पूरी पल्‍टन होती है; जिनकी तरफ पलटकर वह एक बार नहीं देखता, न ही उसके चेहरे पर कोई शिकन आती है.

साहित्‍य, समाज व सभ्‍यता हर वक़्त उसकी ज़बान पर रहते हैं. एक जेब में परम्‍परा तो दूसरी में वह आधुनिकता की सबसे पैनी कुंजियां लिए मैदान में मचलता उतरता है. बहुत बार वह आश्‍चर्यजनक रूप से मार्मिक कविताएं लिखता है.. ओजस्‍वी गद्य या वैसे ही वक्‍तव्‍य देता है.. या फिर आलोचना में हुआ तो उभरती कवियत्री या कथाकारा का हाथ अपने हाथ में लेकर रचना को ऐसी ऊंचाइयों तक ठेल देने की सामर्थ्‍य रखता है जहां अभी भी बाकी लोग अंधेरे में दीवार टटोल रहे होते हैं. एक लेख देकर वह किसी मरी हुई लघु पत्रिका को पुनर्जीवन दे देता है.. या अपने मोह में अलसायी, इतराती बड़ी पत्रिका को अचक्‍के में ऐसी लंगी कि आनेवाले कई अंकों तक वह इसकी और उसकी सफ़ाई छापती फिरे!

वह सोते-जागते, उठते-बैठते-हगते हर वक़्त समाज और सिर्फ़ समाज का होने की कसमें खाता है.. मगर साथ ही वह समाज को ठेंगे और अंग विशेष पर रखने का कौशल भी जानता है. वह हंसते-हंसते तीन का तेरह और दो सौ का दो कौड़ी कर देता है. जो उसकी दो कौड़ी करते हैं उन्‍हें वह सारे जीवन भूल नहीं पाता, न माफ़ करता है.

वह अलग-अलग समयों व अलग-अलग मुल्‍कों में हमेशा ही पाया जाता रहा है.. इस तरह से उसका होना अपने में ऐसी कोई अनोखी ऐतिहासिक परिघटना नहीं.. फर्क़ बस इतना ही है कि एक बीमार समाज में उसके भोले चेहरे के धोखे में उसकी पहचान अर्से तक दबी-ढंकी रहती है.. ज़ोर-ज़ोर से और धारदार वक्‍तृता के भय से लोग सीधे उसके विरोध में बोलने से बचते हैं. किसी के मुंह खोलते ही वह सत्‍य और सभ्‍यता का भाषण बीच में स्‍थगित करके मां-बहन की नंगी गालियों पर उतर आता है.. और दूसरी सुबह चौदहवें माले की लिफ़्ट में फिर एकदम निर्दोष सूरत लिए बालसुलभ प्रसन्‍नता में चढ़ता दिखता है..

आप उसे पहचान रहे हैं? हो सकता है इस वक़्त वह आपके बच्‍चे को गोद में लिए, आप ही के घर बैठा, आपकी चाय पीता, आपको जूता मारने की रणनीति तैयार कर रहा हो.. या यह भी हो सकता है कि वह आपको जूता मारने तक के क़ाबिल न समझे.. मगर फिर भी आपके सावधान रहने में हर्ज़ नहीं है..

9 comments:

  1. शानदार!! खालिस अज़दकी पोस्ट!!!!

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  2. बूझो तो कौन है यह :)

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  3. अब ये भी बता दीजिए कि-ये अंदाज-ए-गुफ्तगू क्या है?

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  4. यह हरफनमौला एट्रेक्टिव जीव है पर "हिट" की तरह सुगन्धित जहर है. इससे ज्यादा मिलें तो कुछ देर बाद वैक्यूम की अनुभूति होती है!
    बाकी मैं ब्लॉग पर आया तो यह पढ़ कर था कि आपने नारद की फीड जाम कर देने की खुराफात कर दी थी. अधेड़ उम्र में भी खुराफाती तत्व बाकी हैं! बधाई! :)

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  5. @ज्ञानीजी,
    "आपने नारद की फीड जाम कर देने की खुराफात कर दी थी.." हम तुच्‍छ जीव पर यह कैसी तोहमत? बात समझ में नहीं आई?

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  6. अदम गोंडवी का एक बहुचर्चित शेर...
    हर लुटेरा जिस तरफ को भागता है,
    वह सड़क दिल्ली शहर को जा रही है।

    इसीलिए कहते हैं दिल्ली दलालों का शहर है, जबकि मुंबई मेहनतकश लोगों का शहर है, जहां हम और आप जैसे लोग रहते हैं।

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  7. " नारद की फीड जाम" कर देने वाला मामला आखिर है क्या? पांडेजी को स्पष्ट तो करना चाहिये, कहीं ऐसा तो नही की सारा मामला खुद करके अफ़वाह उडा़ते फिर रहे.वो भी हमे आजकल कुछ ज़्यादा ही सुगंधित नज़र आ रहे हैं.लेकिन आपकी इस पोस्ट को सौ में सौ दे देते हैं. पढ कर मज़ा आ गया.

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  8. delhi ko jis tarah se aap ne kaha hai wo bahut hi kamal hai.

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