Tuesday, July 17, 2007

आम के रेशे पर कुछ फुटकर विचार..

कल्‍पना कीजिए पत्‍नी या प्रेयसी को छह दिन के विरह की कीमत पर मरे मन से आप विदा करने एयरपोर्ट पहुंचे हैं. पत्‍नी- या प्रेयसी (प्रेयसी वाला इमेज़ ज्‍यादा अफ़ेक्टिव है. प्रेयसी ही मानकर चलते हैं!) लड़ि‍या-लड़ि‍याकर हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍मों वाली भावुकता के भर्र-भर्र बुलके चुवा रही है.. हाथ में हाथ लिए, पंजे में नाख़ुन गड़ाकर आपके मन में काम- संबंधी कैसे-कैसे तो भाव पैदा कर रही है.. कंधे पर सिर रखकर आंसुओं से आपका नया शर्ट खराब कर रही है.. आप भी हैं कि बुरा मानने व ठेलकर उसे दूर करने की जगह, भावुकता की बहक में उसके होंठ चूमने के लिए झुकते हैं.. मगर अचानक तबतक नज़र की रेंज में एक पुलिसवाला चला आता है.. और गड़बड़ाये फ़ोक़स में प्रेयसी के ओष्‍ठद्वय की जगह खुद को उसकी नाक का रसपान करता पाते हैं.. और आवारा पुलिसवाले के गुज़रते के साथ प्रेम के इन हाइटेंड क्षणों को दुबारा करेक्‍ट किये जाने की भूमिका बना ही रहे हैं.. कि अचानक चेतना मसूड़े व दांतों के बीच फंसे एक मामूली रेशे से जनित एक ग़ैरमामूली असुविधा का आपको सिगनल देने लगती है.. डेढ़ घंटा पहले खाये दसहरी के सौजन्‍य से आपने यह प्रसाद प्राप्‍त किया था!

आपको ख़बर भी नहीं होती और आप प्रेयसी के होंठ भूलकर अपने ही होंठों के अंदर जीभ घुमाते हुए- रेशे के अनुसंधान में- जाने क्‍या-क्‍या किसका रसपान करने लगते हैं. करते रहते हैं. अचुंबित होंठोंवाली प्रेयसी अचुंबित ही बनी रही क्लियरिंग से होती हुई जहाज ही नहीं, अपने गंतव्‍य तक पहुंच जाती है.. फ़्रेश होकर मोबाइल से आपको मिस करने की ऑलरेडी तीन-तीन कॉल भी दाग़ चुकती है! लेकिन आप जीवन में उपस्थित हो गए उस पीड़ादायी, दुर्निवार खालीपन के बारे में तब भी नहीं सोच रहे होते, सवाल ही नहीं उठता, आपका तो सारा ध्‍यान अब भी दसहरी के उसी शैतानी रेशे पर केंद्रित होता है.. जो घर के छोटे-बड़े सब आईनों को इस्‍तेमाल में बरत लिए जाने, दांतों के भीतरी भूगोल को दस एंगिल से देख चुकने व आलपिन से चार जगह मसूड़ा घायल करने के बावजूद अभी तक भीतर से अपनी कांटी निकालने से इंकार कर रहा.. जड़ा-अड़ा और अभी तक अपनी जगह वैसे ही साबूत खड़ा बना रहता है.

लंबी-लंबी सांसें छोड़कर इस बीच आपने सत्रह दफ़े प्रण किया हो कि यह इस बार वाली आख़ि‍री, फ़ाईनल, फ़ाईनलिस्सिमो कोशिश है.. इसके बाद दो कौड़ी के टिनहे रेशा के बारे में नहीं सोचेंगे, जब निकलना होगा खुदै निकलेगा ससुर.. और ऑलमोस्‍ट दो मिनट के लिए अपनी प्रेरणा व प्रण मान जीभ को जीभ की ही जगह रहने भी दिया होगा.. मगर तीसरे ही मिनट फिर वही शाम, वही ग़म वाली कहानी में उलझ, अझुरा रहे होंगे.. और चिढ़े हुए, झींकते-हांफते नामुराद रेशा समेत दांतों का ही कुछ कर डालने की भयानक कल्‍पनाओं को आग व अनाज देने लगे होंगे कि तभी.. बेचारा मासूम आधे नाख़ुन भर का रेशा भल्‍ल से बाहर आ निकलेगा!.. और तर्ज़नी की नोक पर उस अनूठे रत्‍न को सजाये आपको यकीन करने तक में परेशानी होगी कि इस टिल्‍ली चीज़ ने चार घंटे से आपका जीना हराम कर रखा था?..

शाम प्रेयसी को यह बताते समय कि उसके चले जाने के इन आठ घंटों के दरमियान जीवन कैसे तिल-तिलकर मारता प्रतीत हो रहा है, आपको इस बात की याद भी नहीं रहेगी कि अभी कुछ देर पहले तक एक अदद रेशे ने आपका क्‍या रेशा-रेशा किया हुआ था!

3 comments:

  1. इसीलिये महान लोग कहते हैं कि कुछ भी खाने के बाद कुल्ला ठीक से करना चाहिये। मंजन, दातून ठीक से करते तो दांत में जगह नहीं बनती और दांत यमुना के कछार नहीं बनते जहां किसी भी खोह में कोई रेशा डाकू बना बैठा रहे और आपकी जिंदगी हराम करे। :)

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  2. संजय बेंगाणीJuly 17, 2007 at 3:00 PM

    किस से पहले किसने कहा की आम खाओ.

    दंत-चिकित्सक को दिखायें, खामखां लफड़े होते है.

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  3. ई तो मान गाए कि आप पहंचे हुए लिखवईया हैं छोटी सी चीज़ कहानी का रूप कईसे धरे ई बात आप से सुन्दर कोई कर सकता है भला? बताइये दांत में फंसे रेशे पर भी लिख मारे ये भी खूब रही !!!!

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