Wednesday, July 18, 2007

आदमी जानवर..

मोटर की फुंसी निकल आई थी. बैल के नहीं थी. उसकी गोड़ पर घाव चढ़ा था. रहते-रहते पैर फटकता, हारकर झुक जाता, कांपता घाव चटता. नहीं तो दुर्दिन भूले हुए था. खिजियाया कुत्‍ता देखकर डर रहा था, गों-गों के ऊंचे सुर में रोना किये बदहवाशी में मर रहा था. औरत मरी नहीं थी. कनपटी पर ताज़ा बड़ा काला निशान लिए दोनों नन्‍हीं बेटियों का हाथ थामे गली में तरकारी खरीदने निकल रही थी. बेटियां जनकर अब तक सीखी नहीं है, मौका मिलते ही पति को सिखाने लगती है. आज सुबह वही किया पति की खिंचाई का तिलमिलाकर जवाब दिया. जवाब में जमकर कूटी गई जूते खायी. हालांकि गली में सौम्‍या की मम्‍मी के पूछने पर बात बदल धीमे से बस मुसकरायी.

मर मैं भी नहीं रहा था. बिल्‍ली चौंकन्‍नी फिराक में थी, हंसुए से कटते मछली की आस में कदम आगे दाबे दम साधे डटी थी. मैं उस फोड़े को तक रहा था जो मुझसे ज़रा दूर मेरी क़ि‍स्‍मत पर बैठा मज़े में पक रहा था.

1 comment:

  1. अंतिम पंक्ति हिन्दी को अंतरा‍िष्ट्रय उँचाइयों पर पहुँचाती लगी ।

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