Thursday, July 19, 2007

द गेरेस्‍ट लभ इस्‍टोरी अफ माई लैफ..

रामजीत राय व्‍याहता बेबी को ओल्‍ड लभ प्रेम प्रकाश का पत्र..

बेबी, माई इसवीट सेक्‍सटीन! (मालूम है कि अब नहीं हो.. उमिर सेक्‍सटीन से ऊपराके चल रहा है.. मगर हमरा खातिर तुम हरमेसा सेक्‍सटीने रहोगी.. और इस्‍वीटो भी!). कौनो खबर है तुमरा हाथी से केतना बड़ पाप हुआ है? ना, हम न बतायेंगे! खुदे से केस्‍चन करो, अऊर खुद ही अलसर करो? बुझाया, कौची का बात कर रहे हैं? हंअ, वहिये चइली जो तुम खींचके हमरा ऊपिर फेंकी.. आंखि अऊर नाकी का नेसाना पड़ जाता तब? केतना का नोस्‍कान होता कौनो अंजाद है तुमको? कौनो एल्‍सोरेंसो कंपनी ओतना नोस्‍कान का पेरमेंट करते-करते हग देती! अऊर हमरा कौनो नुस्‍कान से सकलदीप अऊर अनवर बाद में तोहरा संगे कौन सलूक करते, ओकरा बारे में एक्‍को हाली सोची थी? समझती हो जौन हरामी नंबर वन अनवरवा है, ओहसे तुमको तुमरी मनु मौसी बचातीं?.. तहसीलदार, डिस्टिक मजिस्‍टेक अऊर थानादार बाबू चल आते तब्‍बो तुमको कौनो ऊ पाजी से बचावेवाला नै होता! अईसही खचड़ई में अनवरवा का में जिल्‍ला भर में नाम नै है!..

अऊर तुम आगा-पीछा जिन सोचे चइली फेंक रही थी? काहे ला, बेबिया? एही बास्‍ते कि हम पीछे ले आके दन्‍न देना दूनो हाथी से तोरा पेट चांप लिये थे? कौनो पहिलका हाली चांपे थे रे, छौंड़ी? पीर मोहम्‍मत वाला मेला में चांपा-चापी का सब खेला एत्‍ता जल्‍दी भुला गई? तब त हमरा जुल्‍फी में हाथ फेर के सलम-सलम बोल रही थी? अऊर एतने टैम में हम चइली खवैया हो गए?..

सोच के हमरा करेजा फट रहा है.. मन करता है चक्‍कू निकाल के कौनो के पेट में घोंपके साला का लैफ खलास कै दें!.. अरे, लभ-सभ का कौनो कीमते नै है, जी?..

तुम गवना का बाद पहिलका हाली गांव लौटी त दसरथ, सीपरताप सगरे हल्‍ला किये कि बेबिया का डेरवली होवे वाला है.. तुमको मालूम नहीं जहेल का भीतरी हमरा कौन कंडीसन हो रहा था! जेतना हाली सोचते थे कि तुम बेवोफा हो गई, उतना हाली मुंह से भर्र-भर्र उल्‍टी फेंका रहा था! हमरा कनेस्‍सन वाला सीएन जादव जेलर साहेब का कोर्ट में मामला चल रहा था, नै त तबहिंये हम बहरी आके तुमरे डेरवली वाला केस्‍चन किलियर करते? अंदर झगरा में बयंका गोड़ टूट गया था नै त जेहलो से भागके तुमरा ले मुलाकात खातिर बाहिर आते.. मगर बाहिर आने के बाद दसरथवा अऊर सीपरताप को खूब तोड़े.. सीपरतपवा अब्‍ब ले लंगरा-लंगरा के चलता है!

तुमरा बियाह के बाद हमरा मोहब्‍बत का कौन-कौन गजन हुआ, तुमको अब का बतायें, माई लभ? न रामपिरिया का मझिलका छौंड़ी में मन लगता था, न बलेसरा का भौजी से आत्‍मा को सांति भेंटाता था! गोड़ में तकिया चांपके सगरे-सगरे रात तोहरी लभ का याद में कराही छोड़ते रहते थे? लैफ में एतना टुरचर अऊर कब्‍बो नै हुआ है! मोती सलीमा में पप्‍पुआ अऊर उसका गुंडा लोक गंड़ासा, तरवाल लेके जब हमरा पे अटेकिन किया था, तब्‍बो हम एतना टुरचराये नै थे.. जेतना तुमरा पियार हमको लैफ में अवारा-बेचारा बना के छोड़ा है? अऊर हमरी मोहब्‍बत का इलाम तुम चइली फेंक के देती हो?

जिकर में बहुतै चोट लगी है, डारलिन.. डारलिन बोल रहे हैं काहे ला कि हम जनम जल्‍मांतर ले तुमसे मोहब्‍बत करता रहूंगा.. तुम भले चार छौड़ा-छंवरी का डेरवली कै लो! अब त पहिलका जइसन कंगालियो नहीं है, भड़भड़ वाला बुलेट है, थानादार जी अपना फैमिली मेंबर समझते हैं.. गांव से कोर्ट ले तोहरे प्रेम परकासे का रुतपा है.. अऊर तू अइसा मोहब्त का ऊपरी चइली फेंक दी? काहे ला, बेबी?

फर एभर एंड एभर योर वोनली,
गेरेस्‍ट मजनू प्रेम परकास

6 comments:

  1. बहुत दिनों से पढ़ रहे हैं आपका लिखा मित्र. अब थोड़ा सुर बदलिए. लिखने से पहले थोड़ा अब आपको सोचना चाहिए कि लिख क्यों रहे हैं. क्या चाहते हैं, क्यों कहना चाहते हैं. व्यंग्य है, हास्य है या गंभीर टिप्पणी है. देहातियों पर हँसते हैं या उनकी टूटी भाषा पर?

    मुझे मालूम है कि रवीश कुमार की तरह आप भी स्थापित ब्लॉगर हैं. विमल "लाल" जैसे स्ट्रगलर ब्लॉगर नहीं -- इसीलिए चाहें तो इस टिप्पणी पर रवीश कुमार की तरह ही शरद यादवीय दृष्टि डाल कर आगे बढ़ जाइएगा. विमल लाल जब तक स्ट्रगलर हैं तभी तक हम जैसे प्रतिक्रियावादियों की प्रतिक्रियाओं का नोटिस लेते हैं और जवाब देने का उद्यम करते हैं.

    लेकिन जो भी हो. इतना समय लगाकर जो आप लिख रहे हैं उसका अब सुर थोड़ा बदलना चाहिए.

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  2. धांसू च फांसू लभ लैटर है जी।

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  3. अच्छा रहा यह वाला भी.

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  4. सर जी,
    मैं जब तक आपका ब्लॉग नहिं देख लेता हूं कुछ छूटता सा लगता है............ और सबसे तो प्रिय है ये रामजीत की सीरीज़. इसका तो मुझे बेसब्री से इन्तेज़ार रहता है........ आपकी कल्पनाशीलता और रचनाधर्मिता को मैं प्रणाम करता हूं. इतनी ऊर्जा??? सब कुछ कीजीये लेकिन ये रामजीत के किस्से कभी भी बन्द मत कीजियेगा. सारे पत्रों के प्रिन्ट आउट्स ले लिये हैं मैने. और सारे मित्रों को दिखाया है... के देखो एक सज्जन हैं प्रमोद सिंह इनका ब्लॉग देखा करो..........इस पूरी सीरीज़ मे अपने गाँव की याद आती है. गाँव के बाज़ार (चट्टी) पे बैठ के इधर-उधर की बातें....टोलों की गॉसिप............. आप वैसे उन कुछ लोगों मे हैं जिनकी वजह से ब्लॉगिंग लोकप्रिय होगी.


    [इसे किसी भी तरह झूठी श्लाघा न समझा जाये.]

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  5. आह रे बेबिया, जो रे. तोरा असलैन पिरेम के पहचान तनको नइखे. दुरभाग तोर...


    बाकी परमोत बाबू, ई लभ लेटर ओताना माजावाला नहीं राहा. कुछ जादे लभिया गया है. एसे बन्हिया त सकीनिया लिखती है. परेम पर्कास के लेटर लिखने नहीं आता है शायद...

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  6. प्रमोदजी अब हमें पता चल गया है इ सरवा जनसेवक कौन है..जानते हैं कौन है ये ये फ़िल्मी विलेन शक्ति कपूर है स्टिंग आपरेशन में पकड़ा गया था, अब इसको मुंह छुपाने की जगह मिली नहीं है.एक बार पकड मे आया भी था तो बडी कुटम्म्स हुई थी तब से इ चिरकुटई से बाज नही आ रहा यहां से वहाई कूद फांद रहा है. पर अजब ये है इसका आई.पी एड्ड्रेस का पता चल गया है और तो और इनका नाम भी पता चल गया है आपको बताउंगा नही. अगर बता दिया तो आपको ब्लाग का एक विषय मिल जायेगा और मै नही चाहता कि आप उनको महत्व दें.. साथी को लग रहा है कि उनका सस्पेन्स कोई नहीं जानता तो वो मुगालते में हैं..... आपकी ये सीरीज़ लल्लनटाप है

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