Friday, July 20, 2007

आपने कभी नाक सटाया है?..

गमक, महक, बास, गंध.. उभरता है कुछ दिमाग़ में.. या कहें नाक की परिधि में? अपने में क्‍या विविधताओं भरा एक पूरा परतदार संसार होता है.. नहीं? कुत्‍ते को नाक ऊपर उठाकर एक दिशा में ध्‍यानमग्‍न आपने ज़रूर देखा होगा. बिल्‍ली भी खिड़की के चौखटे पर, रसोई के दरवाज़े की ओट में चौकन्‍नी ताड़ती अड़ी रहती है.. दरअसल तब आपको सूंघ रही होती है. आदमी सूंघने के लिए इस तरह नाक ऊपर नहीं करता, न पीछे पुलिस आ रही है वाले अंदाज़ में चौकन्‍ना होता है.. पल भर को ठिठककर राज़दारी वाले स्‍वर में मुस्‍कराकर कहता है- रामलखना के हिंया बेसन का हलुवा बन रहा है! जवाहरलाल अपने जाकिट में पता नहीं सूंघकर गुलाब सजाते थे या नहीं, हमारे बाबूजी अभी भी, जब तक मौसम रहता है, गोद में आम धरे, बीच-बीच में उसे नाक तक ले जाकर सूंघते रहते हैं. अब अम्‍मा नहीं है, जब थी तो उसके घूर के देखे जाने पर बाबूजी का मासूम जवाब हुआ करता- बहुतै गमकौवा दसहरी है!

कितने सारे तो महक हैं, नहीं? जितनी बड़ी व गहरी आपकी अनुभूत दुनिया, वैसा ही फैला आपका गमकदार संसार! फल, फूल, तरकारी.. पत्‍ते.. जंगली, बागान के.. मुरझाये, सूखे पीपल के.. हरे-ताज़ा पान के पत्‍ते! देखकर आंख हरी हो जाए.. जैसे लहलहाता हरा-भरा खेत! बरसात के बाद जैसे किसी जंगल से गुजरते ताज़ा हवा की महक.. या सीली, बसाइन हवा.. अस्‍पताल की स्पिरिट की तीखी गंध में नहायी.. गराज की पेट्रोल व मोबिल की बदबू.. उसके बारे में आपकी क्‍या राय है? सबको वह बदबू नहीं लगती है.. बहुतों को हमने गराज के बाजू नाक उठाकर रस लेते देखा है.. ऐसे गुनीजन भी देखे हैं जो पेशाब के लिए गराज का पिछवाड़ा ही मुफ़ीद मानते हैं. इसके पीछे मानसिकता क्‍या काम करती है? कि वहां अपने रासायनिक दुर्गंध से आदमी गराज की बदबू मार देगा?.. वैसे असली बदबू तो कॉलेज के लैब में उठती है.. याद आया? एक से एक रसायनों वाली फिज़ा बनी रहती है.. कोई लड़की नाक पे चुन्‍नी डाले काम कर रही है, तो कोई नाक साटे..

आप गांव में रहे हैं तो आइडिया होगा बस अड्डे की, कचहरी, थाना की जैसी होती है, गांव की भी एक अपनी महक होती है.. गांव से बाहर रहने में और, तो गांव के अंदर पैर धरते कुछ और!.. गांव के भीतर भी अलग-अलग दिशाओं की.. नदी के तरफ की एक तो खेत के तरफ की और.. ओसारा, आंगन, रसोई की कुछ और तो भीतर अंधेरे में भंडारघर की कुछ और! जानवरों की सानी-पानी और बांधनेवाली जगह पर गोबर-पेशाब का एक दूसरा ही महकलोक होता है.. जैसे खस्‍सी व मछली बाज़ार में.. जहां खानेवाले इतरा के चलते हैं और न खानेवाले बचके-बचाके, नाक दबाके चलते हैं!

आप मुंह के रसिया हैं.. नहीं हैं तब भी.. महकों से मुंह बनाने.. या दिल लगाने की एक पूरी दुनिया सजती-बनती रहती है.. ख़बर हो जाती है पड़ोस में मेथी का छौंक पड़ा है, या अदरक और प्‍याज़ वाला आलूदम तैयार हो रहा है! दूध औंटा रहा है.. या बेकरी में फ़्रेश-फ़्रेश ब्रेड गिना रहा है!

कागज़, किताब, अख़बारों की महक.. नए और पुराने.. कोई मोटा-सा पोथा खोलकर मध्‍य भाग में मुंह डालके देखिए क्‍या सुगंधि छूटती है.. पोथा ज्‍यादा पुराना हुआ और आपका अदबी इश्‍क कमज़ोर.. तो हो सकता है सुगंध उड़ता न मिले, हाथ में किताब थामे आपका मन गंधाइन-गंधाइन होने लगे.. जैसे ताज़ा-ताज़ा बच्‍चा जने घर की हर चीज़ जॉनसन बेबी पावडर, दूध, हल्‍दी के उबटन व बच्‍चे के उत्‍सर्जन की महक में नहायी रहती है.. ओह, कितने सारे तो कहां-कहां के गंध हैं.. ज्‍यादा गहरे उतरूंगा तो आप नाक सिकोड़ने लगेंगे कि देखो, कितना पतनशील हो रहा है!..

फ़ि‍लहाल पीसी से नाक सटाकर पतनशील हो रहा हूं.. महक ले रहा हूं.. लेकिन सिर्फ़ प्‍लास्टिक की आ रही है.. ब्‍लॉग की नहीं..

इसका रास्‍ता अभी खोजना है कि ब्‍लॉग की कैसे लें.. गमक!

5 comments:

  1. कभी आप चीनी मिल गये हैं या आपकी ट्रेन किसी ऐसे जगह से गुज़रे कि बिना बाहर देखे सिर्फ़ गंध से लोग बता दें कि फ़लां स्टेशन आ गया, या किसी खाद के कारखाने से आती अमोनियां की गंध,या घर के अंदर बरसात की वजह से चित्ती मारे कपड़ों से गंध..अरे बचपन में हमे ट्युशन पढाने जो मास्टर आते थे वो सर में लगाते थे भ्रंगराज का तेल, उनके आने से पहले तेल की गंध हम तक पहले पहुंच जाती थी,और आगे स्कूल की अपनी गंध तो आज तक नाक में समाई हुई है जहां तक नाक सटाने की बात है तो फलों और फूलों पर नाक सटाया है और किसी चीज़ के बारे में तो याद करके अपने ब्लॉग पर चढाउंगा तब पढ़ लीजियेगा.....

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  2. भाइ आप दोनो ही सूघ लो,हम तो बहु दूर दिल्ली मे बैठे है,

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  3. सही है, लिखाड़ लोग किसी भी शब्द को पकड़ कर लिख सकते है. अगली बारी किसकी है. स्वाद पर लिख मारिये.

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  4. पढ़ते गये,
    साथ बहते गये..
    डूबते उबरते
    कहाँ खो गये..
    महक आती रही,
    दिल दुखाती रही...
    गाँव की याद भी
    जैसे बन के गमक
    मेरी आँखों के अश्रू
    बहाती रही...
    महक आती रही,
    दिल दुखाती रही...


    -- महक की मनमोहनी छटा कितनी दूर दूर तक ले गई. इन सब महकों के बीच एक और मोहक गंध उठी-फिनायल की. घर में जब भी पौंछा लगता था. पानी में फिनायल मिलवाया जाता था.

    बहुत खूब लिख डाला आपने महक का अफसाना.

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