Saturday, July 21, 2007

भोर में अकेले...

मुंह पर साड़ी ढांपे उन्‍नीस वर्ष की मां माधवी है सोयी. सात गांव की पुरोहिताई की थकान में थके सोये बाबू सीताकांत, नया-नया पिता बने पिताबोध की जिम्‍मेदारी की बोझ से दबे. रेंगनी पर खोंसे कपड़े, दीवार पर शंकरजी का कलेंडर और आईने पर साटी टिकुली सोयी. फूलदार टिन के बक्‍से पर धरा सिंगारदान सोया चुपचाप और सिंदूरदान सोया. तीन पैर वाली कुरसी का पंचांग, और कांटी पे टांगा अंगौछा और बरामदे का खड़ाऊं व हवाई चप्‍पल सब सोये. चूल्‍हे से टिका के धरा चिमटा और धुले-चकमक बरतन सोये कैसी नींद में खोये. आंगन का अमरूद और पीपल के डुलडुल डोलते पत्‍ते ऊपर ओढ़े चांदनी की चुनरी, किस कदर शांत एकदम निष्‍प्राण.

छै महीने का ढुनमुन चिंहुक कर आंख खोलता है. और फिर जगा, दूध की साफ़-सफ़ेद आंखों तकता-निरखता रहता भोर का नीलापन, निश्चिंत-आत्‍मनिर्भर अपने अकेलेपन में.

6 comments:

  1. अहह्हा.. क्या बात है.. शानदार.. क्या क्षण पकड़ा है.. आनन्द आ गया..

    ReplyDelete
  2. अहा ! भोर की भैरवी !

    ReplyDelete
  3. बारिश की ठंडी फुहारों जैसा असर है इन छवियों का। पेड़ की ताजा कोंपलों जैसा निष्छल, मासूम भाव है।

    ReplyDelete
  4. रात का एक गीत है
    सुर, छन्द, लय और ताल है.

    रात पलकें चूमती है
    थके हारे डोम की,
    घूमती है व्योम में
    व्यामोह की चुनरी उड़ाती
    वीतरागी को रुलाती

    खपरैल पर खामोश चलती
    मुक्तिबोधी बिल्लियों की
    साज़िशों पर डाल पर्दा
    रात हौले से उतरती
    उस चिता पर जो अभी भी
    जल रही है घाट पर.
    छोड़कर जिसको चले
    अपने पराए, गाँव वाले
    आँसुओं के नमक को वो
    जीभ पर महसूस करते

    सो चुके जो थके हारे
    और जो बेचैन जागे
    उन सभी पर मुस्कुराती
    चाँदनी के पंख फैलाए चली है रात.

    रात का एक गीत है
    सुर, छन्द, लय और ताल है !!

    ReplyDelete
  5. ओ एँ एँ के हाँ के हाँ...
    कुछ ही सेकेंड बाद.
    सुंदर है बबुआ.

    ReplyDelete
  6. पावन अनुभुति.

    ReplyDelete