Saturday, July 28, 2007

दोपहर में फ़ंतासी

खुद से आंख बचाकर चुपके रोज़ निकल जाता हूं पहाड़ि‍यों के पार किसी छोटे गांव. या रियु द सविन्‍यॉं से निकलती है जो पगडंडी पकड़े हुए उसे आगे दूर किसी ग़ुमनाम ठांव. धीमी दुलकी चाल चलते गदहे पर धंधे का माल ढोये जाता किसान. वेर्गा की कहानियों से बाहर चली आयी काली-सफ़ेद सीपिया किसी छूटी तस्‍वीर-सी धुंधली. प्‍यात्‍ज़ा सांता मारिया के सूने चौक के आख़ि‍र में उतरते कुम्‍हलाये मैदान और दूर-दूर तक ऑलिव के खेत. आंखों पर हाथ धर तकता आगे समुंदर के पार वहीं कहीं होगा त्रिपोली-दामासकस-माराकेस. हहराती पानियों में डोलती पुरानी नाव, जाने तीन दिन कि तेरह दिन के सफ़र के बाद. किसी ऊबे अधेड़ अरब को समझाता होगा मलाबारी मलयाली छोकरा अपने गांव की कोई बेमतलब-बेतरतीब कहानी. मैं डेक पर पैर पसारे सुलगाता होऊंगा हुक्‍का गुड़गुड़ गुड़गुड़. या पत्‍थरों पर दौड़ता, रेत पर भागता बच्‍चे की शक्‍ल में देखता होऊंगा खुद को हुक्‍का गुड़गुड़ाते. सुनकर ताजुब्‍ब करते बांसुरी बजाते.

4 comments:

  1. फ़ंतासी काश सच हो जाये , नहीं ?

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  2. कौन समझेगा?

    पियात्ज़ा दे सांता मारिया. माराकेश. समंदर की झिलमिल. धूप.

    कौन समझेगा?

    अतीत कितना व्यतीत होता है?
    कभी प्रतीत होता है?

    मैडिटरेनियन अभी वैसे ही हिलोरें लेता है -- चिंकुआ त्तेर्रा को भिगोता हुआ.

    करार्रा के सफेद संगमरमरी पहाड़ अब भी वहीं खड़े हैं. बिलकुल वैसे ही.

    कुछ सपने उड़ गए हैं -- रूई के फ़ाहे पर रखी कपूर की कनी की तरह.

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