Monday, July 23, 2007

एक मासूम-सी निर्मम याद..

स्‍मृतियों में खोजती है लड़की किताब. किसने लिखा था छपी थी कहां कभी बहुत पहले पढ़ा था, मुखपृष्‍ठ पर था चारकोल का रेखांकन है बस इतने की धुंधली-सी याद. बस की जगर-मगर में रास्‍ता बनाती, इस शोहदे से बचती उस बुज़ूर्ग को बचाती, एक सीट के ज़रा-से लोहे का टेक लेती ज़ोर देकर याद करने की कोशिश करती लड़की, याद क्‍यों नहीं पड़ रहा आख़ि‍र कब की बात है. तब हज़ारीबाग़ में ही थी कि जमशेदपुर में बीमारी के दिन थे वे लम्‍बे. मन रखने के लिए अम्‍मां रहने लगी थी साथ, सुशांत ने फ़ैसला सुना दिया था क्‍या फ़ायदा अब हमारे मिलने का. मगर तब कहां कुछ पढ़ रही थी, पेपर देखने तक से मन उखड़ जाता था. घबरायी आंखें मूंदे बार-बार उन्‍हीं मचलन-हुमस भरे रंगीन फ़ीतों को देखती मन के परदे पर तब सब कितना सुहाना था बीत गया था जो अब. आंखों के खोलने पर कुछ नहीं दिखता, कमज़ोरी लगती प्‍यास से हलक सूखता बदन टूटता-सा रहता.

कैसा मुश्किल समय था और कितना तो लम्‍बा समय था. भैया गुस्‍से में कांपते बरसते देखो इस नालायक़ को और मैं इसे समझदार लड़की कहता था! अम्‍मां कहती ठीक है, तुमने किया जो भूल गए, तुम्‍हारी समझ के रास्‍ते चलकर ही यहां आयी. कितने वर्षों बाद सुशांत दिखा था फिर किसी किताब की ही दुकान में. कैसा तो अचकचा गया था साथ की पत्‍नी लिहाज में सकुचा रही थी. शायद तभी उठायी थी किताब जाने तो क्‍या नाम था कि उफ़्फ़, इतनी कोशिशों पर भी याद नहीं पड़ता!

2 comments:

  1. लडकी को कहिये याद करने की कोशिश न करे । एक दिन खुद ब खुद याद आ जायेगा । तब याद की मासूमियत और निर्ममता दोनों खत्म हो जायेगी ।

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  2. घर्मवीर भारती जी। क्यों प्रेम में बिछोह कराते रहते हैं। टूटे हुए प्रेम का हिस्सा बचा कर रखना या फिर कभी जेब के किसी कोने से उसका निकल आना, दर्द है न। रिश्ते टूटने और जुड़े रहने के खतरों में ही क्यों फंसे रहते हैं। सुबह सुबह पढ़ कर भावुक हो गया

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