Tuesday, July 24, 2007

क्रांति के एक परम-चरम शिखर का अवसान..

एक पतनशील श्रद्धांजलि..


गहरे शोक का विषय है क्रांतिकारी कवि ब्रह्मशंकर गोस्‍वामी अब हमारे बीच नहीं रहे. उनकी कविताएं रहेंगी. माने जिन प्रकाशकों को कवि ने मां-बहन की गालियां नहीं दीं वे निश्चित ही उनकी कविताओं को जीवित रखेंगे. ढेरों वैसी कविताएं भी हैं जो सिर्फ़ मां-बहन की गालियां हैं, वे तो वैसे भी पाठकों की ज़बान पर चढ़ी रहेंगी. प्रकृति व पौराणिक कविताओं के बारे में अलबत्‍ता शंका बनी हुई है. इनके बारे में फ़ि‍लहाल यही कहा जा सकता है कि समाज में प्रकृति व पुराण बच गए तो संभवत: कविताएं भी बच जायें. मेरी धारणा में पुराण अब भी समाज से गहरे आबद्ध हैं, और आनेवाले पचास वर्षों तक ‘सुमिरन सभा’, ‘यज्ञवर्ण शुद्धि समाज’ जैसी संस्‍थाएं भारी डोनेशन पर जबतक ज़ि‍न्‍दा हैं, पुराणों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जेन्‍युइन खतरा प्रकृति को है. कवि की कल्‍पनालोक से बाहर उनका अस्तित्‍व शायद ही बचे. ऐसे में गोस्‍वामीजी की प्रकृति संबंधी कविताएं निश्‍चय ही आश्‍वस्‍त नहीं कर पातीं!

लेकिन जो ऐसी धारणा के प्रचार में लगे हैं वे भूल रहे हैं कि गोस्‍वामीजी ने आश्‍वस्ति-श्रावस्‍ती गान कभी नहीं किया. मृत्‍युपर्यंत वे क्रातिगान ही करते रहे और वही उनका मूल स्‍वर था. यह गोस्‍वामीजी की विलक्षण प्रतिभा ही थी कि वे क्रांति के पारंपरिक खांचों में फिट होने से बचते रहे. या प्रतिभा की विलक्षणता उन्‍हें फिट होने से बचाती रही. क्रांतिकारी दल राजनीतिक मुखपत्रों में इस और उस बहाने से गो‍स्‍वामीजी की कविताएं छापकर उन्‍हें अपनी नकेल से बांधने की कोशिश में जुटे रहे, जबकि क्रांतिचेता कवि बार-बार इस नकेल को तुड़वाकर अराजनीतिक विमुखपत्रों में छपता व अपनी जगह सुरक्षित किए रहा. ये दो ऐसे मूल्‍य थे जिनकी रक्षा में कवि ने आजीवन लोमहर्षक संघर्ष किया. जैसे वे समाज में क्रांति लाने के मर्मांतक पक्षधर थे उसी तरह अपने छपने व जगह की रक्षा में उन्‍होंने कोई कसर उठा न छोड़ी. जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि की तर्ज़ पर निहायत मारामारी वाली जगहों में भी गोस्‍वामीजी अपने लिए जगह बनाने में सक्षम होते रहे थे. यही वजह है ढेरों कवि व प्रकाशक उन्‍हें अपनी कविता, सविता, संध्‍या, रात्रिगंधाओं से मिलवाने में हिचकते थे (कविता एक वरिष्‍ठ कवि की बड़ी बेटी का नाम था, जबकि संध्‍या उनके यहां काम करनेवाली बाई थी). क्रांतिकारी कवि के बारे में किंवदन्‍ती थी कि वे आम तो आम गुठली के दाम भी नहीं छोड़ते. गुठली से आशय संभवत: घर की नौकरानियों से था. यथास्थितिवादी ताक़तों के भ्रांत प्रचार से अलग इसे समाज के पददलित-शोषित समुदाय के प्रति कवि के अतिशय, कोमल जुड़ाव के बतौर देखा जाना चाहिए. ‘सात शहरों में सात बार’, ‘मैं था मैं नहीं था’ जैसी मर्मस्‍पर्शी रचनाएं इसका सजीव प्रमाण हैं. सुधी पाठक याद करें इन उद्दि‍प्‍त रचनाओं में सेक्‍स संबंधी सारे विहंगम दृश्‍य निम्‍नवर्ग के चरित्रों के इर्दगिर्द ही बुने गए हैं, जबकि किंवदन्‍ती नहीं अकाट्य यथार्थ था कि कवि उन दिनों शिमला में किसी निम्‍नवर्ग की स्‍त्री नहीं, एक धनाढ्य बिधवा में फंसे हुए थे, और वापस गोरखपुर अपनी देहातन स्‍वकीया के पास लौटने की बजाय फ्रांस या अमरीका निकल उड़ने के मंसूबे बांध रहे थे.

उनके बाकी समकालीन जबकि दिल्‍ली में रहते हुए पहाड़गंज व पड़पड़गंज की ही बातें करते रहे, गोस्‍वामीजी ने गोरखपुर के सुदूर देहात में भी अपने लिए फ्रांस व अमरीका को संभाव्‍य बनाया. बाकी कवि बिहारी, अष्‍टछाप व गोरखपंथी लीक पर रचनाएं उगलते रहे जबकि क्रांतिचेता कवि ने रिवियेरा, पॉल वेलरी व मोंतेन की बातें ही नहीं कीं, उनके हिज्‍जे तक सही-सही लिखकर अंतर्राष्‍ट्रीयता की पहचान की एक नयी लीक स्‍थापित की.

भयानक शोक का विषय है कि ऐसा उदीयमान युवा कवि इतनी अल्‍पायु में चल बसा. माने नेपाल की ओर बसने के लिए चला था लेकिन जाने क्‍यूं रास्‍ते में बस से उतरकर अपनी मौत की ओर चला गया. दिल्‍ली के कतिपय गैरक्रांतिकारी हलकों में यह बात उड़ायी जा रही है कि कवि के बीच रास्‍ते बस से उतरने की वजह एक कमनीय स्‍त्री का वहीं उस स्‍टॉप पर उतरना था. गोस्‍वामीजी ने स्‍त्री को तो ठीक-ठीक पहचान लिया, लेकिन स्‍त्री के संगी पुरुष को पहचानने से वे रह गए. कविता पर विमर्श करते हुए जिसे अंत तक वह नेपाली कवि माने रहे, वह वर्गशत्रु माने गोरखपुर का मशहूर गुंडा दिवाकर तिवारी निकला. पहचान की यही मामूली चूक जाजल्‍व्‍यमान क्रांतिकारी संभावनाओं के मर्मांतक मार्मिक मर्डर में परिणत हो गई.

क्रांति के अग्रिम दस्‍ते के ऐसे सुलगते अग्निशिखर को हमारा अंतिम नमन.

गोस्‍वामी तुम जाओ. हम तुम्‍हारी कविता को बचाकर रखेंगे?

2 comments:

  1. वाकई आपकी श्रद्धांजली दिल को छूने वाली बडी मार्मिक,और भाव भीनी लगी,सच अब तो दिल यही चाहता है,की आप दिल्ली मे बिराजे यहा हर दो चार दिन मे कॊई ना कॊई महान आत्मा स्वर्गवासी होती ही रहता है ,आपसे अच्छा ये कार्य और कौन कर सकेगा,बस इन कविराज जी की दो चार कविताये भी सुनवा/पढवा देते,तो अतिसुंदर.

    ReplyDelete