Wednesday, July 25, 2007

देशकाल के परे..

दौलतपुर, नीमतरा, हरहरा क्‍या जगहें थीं जहां रुक जाता बेमतलब. साइकिल अड़ाकर तकता उजबकों की तरह टहलता कौन लोग हैं कैसे बात करते हैं. झबरे मूंछ व पोपले मुंह वाला एक बूढ़ा हंसता बुदबुदाता कातिक-अगहन. कोई औरत दौरी उतारकर रखती ज़मीन पर, साड़ी के किनारे से पोंछती श्‍याम चेहरा, देखती ललियांही राह, थकित-चकित बूझती मन ही मन अभी और कितना आगे जाना होगा पत्‍ते में जामुन और नून सजाकर खोजने गाहक चार कौड़ी कर कमाई बास्‍ते. नंग-धड़ंग एक बच्‍चा घिसटता-दौड़ता चला जाता, कोई मुर्गी फुदकती झाड़ि‍यों से बाहर चेहरा करती जैसे बीच काम देखने आयी हो बाहर के हाल.

अभाव व दुरव्‍यवस्‍था की बड़ी-काली मक्खियां ताड़ व बांस के पत्‍तों पर गोल बांधे भिनभिनातीं, घूमतीं करियाई पुरानी मटकी पर. लगता सदियों पहले का कोई दृश्‍य हो लगता देश-काल से परे में जाने कहां घुसी चली आयी साइकिल.

3 comments:

  1. गज़ब संगीत है !

    ReplyDelete
  2. भाई क्या द्र्श्य खीचा है लाजवाब.. मरहबा.मरहबा... जामुन के ज़िक्र और उसपर नमक की छिड़्कन से मुंह र्में रस भर आया, जैसे किसी फ़िल्म की पटकथा हो...

    ReplyDelete
  3. लगती तो कल की ही यादें हैं-एकदम ताजा.

    ReplyDelete