Thursday, July 26, 2007

शहर में शहर से बाहर..

पटना रहा हूं मोना टॉकीज़ से निकलकर गांधी मैदान में मूंगफली खायी, डाकबंगला सड़क पर बेमक़सद टहलते रहे, कभी ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी नहीं गया. कहते हैं इस्‍लाम पर हस्‍तलिखित पांडुलिपियों की यह दुनिया का सबसे अमीर किताबख़ाना है! इमारत से लगी सड़क की तंगहाली के दृश्‍य देखे, किताबों की अमीरी खने से रह गयी. जैसे इलाहाबाद में श्‍याम बीड़ी के होर्डिंग देखे, ब्रिज के बाद विश्‍वम्‍भर सिनेमा व दारागंज की तंग गलियां व टूटे छतों से रिसता काई का जल देखा, संगम की नाव से, ओह, डोलता इलाहाबाद न देख सके.

दो दोस्‍त और चार किताबों से बाहर दुनिया फैलती है लेकिन मन व संस्‍कारों की गरीबी से पार पाना बड़ा उलझा, पेचीदा काम है. इच्‍छाओं के गुलगुले फूलते भी हैं तो उसका नक़्शा जाने क्‍यों दो कौड़ी की छपाई वाला होता है.

पान-तंबाकू की गुमटी में जैसे सजी हो फॉर स्‍क्‍वॉयर की खाली डिब्बियां एक पर एक और दुकानदार भूल गया हो वैसे ही भूले रहते हैं अपने होने में हम. जीते हैं शहर में, अपनी समूची संभावनाओं में मगर शहर हममें नहीं जीता. चंद सड़कें, कोई पुलिया, अस्‍पताल, डिपो, रिक्‍शे से दिखा कलक्‍टर का बंगला, एक पार्क यादों में उकेरता है शहर इतिहास से बाहर.

लोग कहते हैं तो याद पड़ता है अरे, हम भी तो रहे शहर में..

3 comments:

  1. एक दबे छिपे सच को उघाड़ दिया आप ने..

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  2. शहर शहर में नहीं होता। शहर अंदर होता है।

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  3. आदमी अपने शहर से मजबूरियों में बाहर हो भी जाये तो उसके भीतर से अपना शहर बाहर नहीं होता.

    यही सत्य है कि आप आदमी को भारत के बाहर मान सकते हैं मगर उसके भीतर बस रहे भारत को बाहर नहीं मान सकते.

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