Sunday, July 22, 2007

सीखो, सीखो, जल्‍दी और ज्‍यादा सीखो!

‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’.. आपने पहले कभी सुना था? मैंने भी नहीं सुना.. या सुना था तो पहले गौर नहीं किया. काफी दिनों बाद मिले आज एक मित्र के मुंह से सुन रहा था. बच्‍चो के बारे में बातें हो रही थीं. मित्र बता रहे थे बड़े शहरों में आजकल बच्‍चों के जीवन का बहुलांश समय जिन दो जगहों में व्‍यतीत होता है, वह घर और स्‍कूल है. घर अब स्‍कूल का विलोम नहीं, स्‍कूल की ही दुनिया का विस्‍तार है. मां बच्‍चे की तरक़्क़ी को लेकर सांस रोके हर वक़्त चौकन्‍नी बनी रहती है. कड़ाही में छनौटा घुमाते हुए भी अधूरे होमवर्क की चिंता में टेंस. बच्‍चे तक बार-बार रिमाइंडर का सिगनल भेजती रहती है. इस कहानी के बीच में ही दूसरी अन्‍य कहानियों के ताने-बाने जुड़ते चलते हैं. होमवर्क के निपटते ही बच्‍चे को कराटे का क्‍लास अटैंड करना होता है, फिर टेनिस.. बच्‍ची हुई तो कत्‍थक सीख रही है, संगीत का ट्यूशन लगा हुआ है. उससे फारिग हुई तो पापा उंगली पकड़कर बरजते हुए जिमनास्टिक सिखलाने लिए जा रहे हैं. माने एक के बाद एक शिक्षण की एक अनवरत की कड़ी बनी-तनी रहती है! बच्‍चे को वह सब कुछ सिखाते रहने की बाध्‍यता रहती है, जिसके न जानने पर बच्‍चे के अन्‍य बच्‍चों से पिछड़ जाने का ख़तरा तना रहेगा. मालूम नहीं यह पेरेंट्स के अंदर घर की असुरक्षा है, या अजाने उनकी अपनी उम्‍मीदों का बच्‍चों में निवेश की रोज़-बरोज़ की हिंसा!

घर और स्‍कूल पर बिताया हुआ शिक्षा का यह समूचा समय बच्‍चे का ‘अपना’, सहज-स्‍वत:स्‍फूर्त समय नहीं होता.. न बच्‍चा अपने आचरण, व्‍यवहार में ‘सामान्‍य’ रहता है.. इसी दरमियान के उसके आचरण के बारे में मित्र ‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’ की संज्ञा का इस्‍तेमाल कर रहे थे. स्‍कूल व स्‍कूल रूपी घर से बाहर आसपास की दुनिया व अन्‍य बच्‍चों के बीच जब बच्‍चा अपने को इस अपेक्षाकृत ‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’ के बरक्‍स, ‘नैचुरल’ तरीके से अभिव्‍यक्‍त करे, उसकी अवधि इस ‘शैक्षिक’ समय के दबाव में और-और कम हुई जा रही है..

बड़े शहरों में जीवन के नित नए बढ़ते उलझाव की बात करते हुए मित्र ने फिर पिछले दिनों घटी एक छोटी-सी कहानी याद की.. जिस बिल्डिंग में वह रहते हैं, उसके बाहर की थोड़ी खुली जगह, जहां गा‍ड़ि‍यां पार्क होती हैं, वहीं बिल्डिंग के बच्‍चों के कुछ खेलने-कूदने का जुगाड़ था. पिछले दिनों पता चला बिल्डिंग-सोसायटी के सेक्रेट्री ने उसे बंद करवा दिया है. वजह ये थी कि बच्‍चों की गेंद से एक कार का शीशा चटक गया था, तो भविष्‍य में कारों की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए बच्‍चों को यह सबक देना ज़रूरी समझा गया कि निर्देशित जगहों से बाहर उनके खेलने के क्‍या नुकसान हैं!

तो फिर क्‍या करेंगे बच्‍चे? खेलेंगे नहीं? या उन्‍हीं तयशुदा जगहों व तरीकों से खेलेंगे जो बड़ों की सुविधा, सहूलियत में सही समझा जाएगा?.. स्‍वस्‍थ्‍य है ये? हेल्‍दी पेरेंटिंग है?..

मालूम नहीं इस तरह की शिक्षा से हम कैसे बच्‍चे तैयार कर रहे हैं.. कैसा समाज बना रहे हैं..!

4 comments:

  1. साथी घर में बच्चों को पढाते पढाते मां से बच्चे का अलगाव होता जा रहा है और एक मां कही बच्चा पिछड़ ना जाय... धीरे धीरे मां का चरित्र बदलता जा रहा है और मां घर में स्कूल टिचर हुई जा रही है बच्चा स्कूल तो स्कूल घर में भी अपनी बात मां से कह नही सकता क्योकि घर में मां के रूप मे टीचर दिखती है, और बच्चे मां को अपनी प्राइवेट बात बताते हैं टीचर को नहीं...मां की ममता इस प्रतियोगिता में पीछे छूटती जा रही है.

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  2. प्रतियोगिता युगीन संस्कृति से आपको और क्या अपेक्षा है?

    ऐसा ही वातावरण है और यही होगा, बस...आप लाख सोचें.

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  3. pramod, include the "email post" option from your preferences so i can fwd some posts to specific people.

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  4. यहीं चूक कर गए न आप. अरे सर जी, ये बच्चे नहीं हैं, ये भविष्य के सी.ई.ओ., मैनेजर, मालिकान और डिसिशन मेकर्स तैयार किए जा रहे हैं.

    समझे नहीं. ये ही लोग हैं जो अब से पंद्रह बीस साल बाद दूसरों का गला रेत कर, टाँग खींच कर या अपने बॉस के तलवे चाटकर आगे बढ़ने की कला में पारंगत होंगे. इन बच्चों के माँ-बाप को समझ में आ गया है कि प्रॉडक्ट ऐसा हो जिसमें कोई नुक्स न निकाल पाए.

    इस भावी मैनेजर को कराटे भी आएगा, कम्प्यूटर भी आएगा और कलाकारी भी.

    भाई, ये प्रॉडक्ट तैयार किए जा रहे हैं जो आर्टिक्युलेट होंगे, कॉनफ़िडेंट होंगे, अँगरेज़ी भाषा में ही सोचेंगे और जो नहीं सोचते होंगे उन पर त्च..त्च..त्च... करेंगे और बग़ैर कमेंट किए आगे बढ़ जाएँगे.

    मित्र, आप बचपन के बरबाद होने का रोना रो रहे हैं, ये समझ ही नहीं रहे हैं कि बचपन को बरबाद करके ही भविष्य का मैनेजर तैयार किया जाता है जो अपने आसपास वालों को कुहनियाँ मारे, अपने दिमाग में भरे गोबर को इन्टलेक्ट कह कर बेचे और सफलता से बेचे.

    समझे नहीं !!!!

    आपने सुर बदला, अच्छा लगा.

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