Friday, July 27, 2007

रात में बाघ

अख़बार की छपाई, पैकेजिंग कैसी है रोज़ दिखता. ख़बरों के बीच की ख़बर देखें इसकी कहां रहती फुरसत. हेडलाइनों तक की नहीं रहती. दिखता पीकर रखा हुआ अधूरा चाय का गिलास, बैंक का स्‍टेटमेंट, शैम्‍पू की नयी बोतल व उंगलियों पर इकट्ठा देह का मैल. एक काम में फंसे रह जाने की झल्‍लाहट दिखती. धीरे-धीरे चढ़ रहा गुस्‍से का पारा और हदसकर निकल भागने की धुंधली कामनायें दिखती, रास्‍ता नहीं दिखता. फांदते-गिरते उतर चलता दिन उसका आततायी अंत दिखता, अपने सोगहग संभावनाओं में समूचे का समूचा दिन नहीं दिखता. सीढ़ि‍यों पर बच्‍चों का शोर चढ़ता-उतरता, कानों में बजती बिजली वाली करकराती आरी. पड़ोस में मजूर धम्-धम् चलाता हथौड़ा तैरती बेचैनियां ज़ेहन में, तनी रहतीं, अचक्‍के दिख गयी बाघ की फ़ोटो में उसके देह की लकीरें दिखतीं, जलती-चमकती आंख का आग नहीं दिखता. लम्‍बी रातों का पसरा बेतरतीब विस्‍तार दिखता, इमारतों की छायाओं पर टंगा अंधेरे में लिपटा आसमानी सूनसान दिखता, सुलगती बाघ की आंखों-सा चकमक कोई उद्दंड सितारा प्रचंड प्रज्‍जवलित नहीं दीखता.

2 comments:

  1. हमें दिख रहा है.. यहाँ से .. यह पढ़ते हुए..

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  2. जलती-चमकती आंख का आग नहीं दीखता अरे दिखाई कैसे देगा मेरी आंख मे आंख डाल के देखियेगा तो दिखेगा. कैसे कैसे ब्लॉग मैने पढे हैं शरीर अन्दर तक तप रहा है और भीतर की आग नंगी आंख से बिरले ही देख सकते हैं. वैसे शव आसन में लेट कर ध्यान किया जाय तो आस-पास ऐसा ही दिखता है जैसा आप दिखा रहे हैं

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