Saturday, July 28, 2007

एक क्रांतिचेता पत्रकार का आत्‍मकथ्‍य..

हां, हां, मैं क्रांतिकारी हूं, मेरी फैमिली में है, और इसे स्‍वीकार करने में मुझे शर्म नहीं है! मैं और मेरी वाइफ दोनों पत्रकारिता में हैं. वह प्रिंट में है, मैं इले‍क्‍ट्रोनिक में हूं. वह घर पंद्रह ला रही है, मैं चालीस पा रहा हूं. तीन बसों की बदली और डेढ़ घंटा लगाकर ऑफ़ि‍स पहुंचती उसे शायद ख़बर नहीं, लेकिन ऑफ़ि‍स की एसी वैन में आराम से फैलकर और समूचे रास्‍ते ज्‍योतिका को जोक सुनाते व फैलकर फ़्लर्ट करते हुए मुझे इसकी चेतना ज्‍यादा है कि कैसे और क्‍यूं हम एक क्रांतिकारी जीवन जी रहे हैं! गणेशशंकर विद्यार्थी और पराड़कर को याद करते हुए जो चिरकुट अतीत का मर्सिया गा-गाकर माहौल खराब कर रहे हैं, मैं इन पुरातन-पोंगापंथियों से सिर्फ़ एक ही बात कहना चाहता हूं- कि अबे, तब तुम जाओ न फिर, रहो वहीं बनारस-कानपुर में? निकालते रहो खराब छपाई का आठपेजी और पौने सात हज़ार की कमाई में पाओ अस्‍थमा और तपेदिक, अबे, हमारी महफ़ि‍ल क्‍यों खराब कर रहे हो? साले, रिविज़निस्‍ट, भैण..., बात करते हैं? हमको सिखाओ नहीं, मैंने देखी है पराड़कर टाइप पत्रकारिता!

सहारनपुर में हमारे एक चचेरे चाचा किया करते थे, अपने को बहुत लगाते थे, एक दिन घर के दरवाज़े पर ट्रैक्‍टर की ट्रॉली में लादकर छोड़ गया कोई. ऐसी कुटाई हुई थी कि घर का कुत्‍ता तक पास आने से बच रहा था! अस्‍पताल के इलाज तक के लिए घर में पैसे नहीं थे? चाहते हो हम उसी चाचाराह पे जाकर अपना क्रियाकर्म करवा लें? उससे मन शीतल हो जाएगा, क्रांति हो जाएगी तुम्‍हारी? अबे, किस दुनिया में रहते हो तुमलोग? घर में बाप नहीं है? आपस में डिस्‍कशन नहीं होता? मैं जब बाईस हज़ार पर ट्रेनी नियुक्‍त हुआ था तब पापा कितना डिप्रैस हुए थे कि किस लाइन में जॉब लिये हो जहां ऊपर की कमाई नहीं है! और तुम, साले, हमें पराड़कर, विद्यार्थी समझा रहे हो? अबे, अपने बाप से जाके पहले एक बार बात करो न?

आख़ि‍र लोग इतना भोले और बेवकूफ़ कैसे हो सकते हैं! वो भी आज के टाईम में? इन्‍हें मालूम नहीं है दुनिया चलती कैसी है? इस देश को मनमोहन सिंह चलाते हैं या सोनिया गांधी ये देख नहीं रहे? तीन दिन पहले किरण बेदी को सुपरसीड करके उनके जूनियर को ऊपर के पद पर आसीन किया गया, अब उखाड़ ले जो जिसे उखाड़ना है! कोई कुछ नहीं उखाड़ेगा, सब चार दिन में भूलकर हिमेश का नया गाना सुन रहे होंगे! क्‍योंकि आज किरण नहीं, हिमेश हीरो है! कितने लोग किरण को सुनना चाह रहे हैं? जबकि हिमेश को हर कोई क्‍या मैं और मेरी वाइफ भी सुन रहे हैं! और ये रो रहे हैं कि गिरेबान में झांको?

अबे, तुम झांकों अपने गिरेबान, गर्दन और जहां-जहां झांकना है! सबसे पहले अपने बैंक अकाउंट में झांकों, सारी सच्‍चाई वहीं भर्र-भर्र बाहर आ जाएगी? हो सकता है बच्‍चा तीन महीने से रो रहा हो और तुम उसका जूता खरीदने से भाग रहे हो! क्‍यों भाग रहे हो ज़रा अपने पराड़कर टाइप पॉकेट में झांककर पूछना! जबकि मैंने लास्‍ट वीक ही ज्‍योतिका को एक स्‍वॉच वॉच गिफ़्ट किया है. सैंट्रो की बुकिंग करवायी है. बॉस की वाइफ के लिए एक चायनीज़ डॉगी चूज़ किया है और ऑफ़ि‍स में मेरा क्‍लोज़ेस्‍ट योगेश पाल है जिसके पामटॉप में दिल्‍ली के सारे इम्‍पोर्टेंट नंबर्स हैं! मेरे चचेरे चाचा तीन जेनरेशन रगड़वाते तो भी उन्‍हें वैसी लाइफ़ नसीब नहीं होती जो मैं और मेरी वाइफ जी रहे हैं! सोनी का लैपटॉप लेना है लेकिन साल के आख़ि‍र-आख़ि‍र तक उसका भी जुगाड़ सोच रखा है मैंने!

मेरा पीसी तब असीमा यूज़ कर सकेगी, बहुत ही क्रांतिकारी वाइफ है. मुझे ख़बर भी नहीं लगने दी और पब्लिशर सेट करके अगले साल के शुरू में अपने मेमॉयर ‘चोट खायी लड़की के दुर्दिन’ छपवा रही है! मेरे पीसी में मेरे भी काफी सारे पोयम्‍स हैं जो मैंने स्‍ट्रगल के टाईम में लिखे थे (आठ हज़ार की एक सड़ी हुई स्ट्रिंगर की नौकरी थी, और ऐसी मरवाई वाली नौकरी थी कि याद करूं तो रोंयें खड़े हो जाते हैं!), असीमा का पब्लिशर पट गया तो मैं भी जल्‍दी ही ‘भागलपुर से भागे हुए लड़के’ छपवाऊंगा.

आसपास कितनी तेजी से चेंज हो रहा है. कंटिन्‍युअस हैक्टिक एक्टिविटी है. अगले महीने हो सकता है बॉस के साथ मैं भी यूके के टुअर पर जाऊं (पर्सनल असिस्‍टेंस और कंटिन्‍युअस प्रेज़ के बिना बॉस की सांस अटकी रहती है. आयम डैम कंविस्‍ड दैट द बास्‍टर्ड उड टेक मी अलोंग!). मैंने पहले से सोच रखा है यूके पहुंचते ही क्‍या स्‍टोरी करूंगा. स्‍टोरी होगी- क्‍या यूरोप सुखी है? और फिर यूरोप की ऐसी-तैसी करने वाली इमेज़ेस अरेंज करके और इंडिया के धांसू होने की एक झकास स्‍टोरी तैयार करके सारे चिरकुटों को चकित कर दूंगा. हो सकता है एचआरडी या आईएंडडी मिनिस्‍ट्री से कोई अवॉर्ड-सवार्ड भी मिल जाए?

सो, डोंट टीच युअर पराड़कर शिट टू मी. बिकॉज़ आई हैव टू गो टू प्‍लेसेस, कैरी आऊट सो मेनी वर्क. नॉट सिट एंड क्रिब लाइक यू एसहोल्‍स आर डुईंग ऑल द टाईम! चैटरिंग क्रांति, क्रांति.. यू आर नॉट.. इट्स मी हू इज़ रियल क्रांतिकारी! टेक इट!

9 comments:

  1. धांसू लिखा है। आज के 'क्रांतिचेता पत्रकार' का यही आत्मकथ्य हो सकता है। लेकिन आज पत्रकार की अलग कोई स्वतंत्र हैसियत रह नहीं गई है। उसी तरह जैसे बैंक में कोई कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव होता है, कोई कैश काउंटर पर बैठता है और कोई लोन बांटता है। मीडिया में पत्रकार की भी यही हालत है।

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  2. बहुत सारे ज्वलंत प्रश्नों और व्यक्तियों पर एक साथ घड़ों पानी डाल दिया आप ने.. हैं? क्या ये ठीक है? हैं?

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  3. ठीक है जी आज कल आप सत्यवादी होते जा रहे है कही एसा ना हो ये असीमा जी भी पढ ले घडी वाला मसला अकले खंड मे घडो आसू रुला दे..:)

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  4. वाकई, हक़ीक़त कुछ यही है। जुबां पर बॉस के लिए चापलूसी, दिमाग में कॅरियर ग्रोथका जुगाड़ और दिल में सहकर्मियों को पछाड़ने का कमीनापन -- यह पूरे कारपोरेट इंडिया का मिजाज़ है. मीडिया में यह हक़ीक़त कुछ अधिक परेशान इसलिए करती है क्योंकि विद्यार्थी जी और पराड़कर जी की छवि का कंट्रास्ट उसकी पृष्ठभूमि में हमारी सोच में हमेशा चुभता रहता है।

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  5. भाई प्रमोद जी, बधाई....आप मुझे नहीं जानते होंगे लेकिन मैं आपको जानता हूं। दस्ता और आइसा (पहले का पीएसओ) के जरिए मैं आइएएस बनने की बजाय गांव और गलियों का सफर तय करते हुए पत्रकारिता की राह पर चल पड़ा और दर्जन भर शहरों से अच्छे-बुरे अनुभवों को समेटकर अब नोएडा में सेटल हो गया हूं। उदय जी और पंकज के मुंह से काफी कुछ सुन रखा है। मैंने आपके ब्लाग का लिंक अपने भड़ास (http://www.bhadas.blogspot.com)पर दे रखा है। जितने ब्लागों को देखा, उसमें सबसे शानदार रचना आपकी लगी, बिलकुल बेलौस, बेलाग, निडर और रीयलिस्टिक....एक बार फिर बधाई...)

    यशवंत सिंह

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  6. तीक्ष्ण व्यंग्य के मारक कटाक्षों युक्त आपका यह लेख सीधे जेहन में गहरे तक उतर गया.

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  7. सही-सटीक-सच-सच है। अच्‍छा लगा पढ़कर। दिन की समझदार शुरुआत।
    - मनीषा

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  8. इती मस्त जिन्दगी है आपकी, और फिर भी कहते हैं - पटखनी खाये पड़े हैं! :)

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  9. क्या क्रातिकारी जिंदगी है! क्या अन्दाज है!

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