Monday, July 30, 2007

टाइम ससुर जाता कहां है?..

मेरी तक़लीफ़ सुनने का ज़रा-सा टाइम है आपके पास? सीरियसली पूछ रहा हूं, सोच के जवाब दीजिएगा? थोड़ा?.. क्‍या? नहीं ना? जाने दीजिये. घबराइए नहीं. न शराफ़त में शर्माइए. दरअसल आपका जवाब मैं पहले से ही जान रहा था. आप टाइम होने की बात कहते तो मेरे लिए ज्‍यादा सरप्राइज़िंग होता! अपने साथ भी तो साली वही दिक़्क़त चल रही है (सभी के साथ चल रही है.. किस चिरकुट के पास टाइम है?).. और ऐसा नहीं है कि रोज़ विरार से चर्चगेट जाने के पीछू दो घंटा और सेठ का नौकरी में आठ घंटा मगजमारी करके टाइम नहीं बच रहा है. नहीं, वोई तो मज़ा है.. अक्‍खा बेरोज़गारी में भी नई बच रहा है! फिर जा किदर रहा है टाइम? सच्‍ची में मालूम नईं, बाप!

शाम को कहीं बीच ट्रै‍फ़ि‍क में फंसे किसी दोस्‍त ने अड़बड़-तड़बड़ सवाल किया कि क्रिकेट की पोज़ि‍शन क्‍या है? जल्‍दी स्‍कोर बता! मैंने चीख़कर जवाब दिया- कुत्‍ते, मैं यहां फालतू नहीं हूं कि टीवी के सामने बैठकर तेरा क्रिकेट स्‍कोर चेक करता रहूं! दोस्‍त सन्‍न रह गया. सन्‍न न भी रहा हो तो मैंने उसके सन्‍न होने की कल्‍पना की और फ़ोन पटककर सोचने लगा कि टाइम साला जा कहां रहा है? कोई उमराव या चमेली जान है नहीं जिसके लिए गजरा खरीदने और उसके मुजरों के पीछे मैं अपने दिन की टोंटी (और रात) खोलकर बहा रहा हूं! तो फिर बहा कहां रहा हूं?

न मैं इन दिनों आलोक पुराणिक या ज्ञानदत्‍त पांड़े का ब्‍लॉग पढ़ रहा हूं. अनूप शुक्‍ला और समीर लाल का तो नहीं ही पढ़ रहा. मोहल्‍ले में सब प्रगतिशील चीज़ें ही चढ़ती हैं तो उसमें मेरी वैसे भी दिलचस्‍पी नहीं. रवीश कुमार की दिल्‍ली वाली लड़कियों में बची है, मगर उनको देखते हुए ध्‍यान आता है कि देखने के लिए अभी मुंबई में भी इतनी लड़कियां बची हुई हैं, और फिर दिल्‍ली वालियों तक को देखने का सारा क्रम गड़बड़ा जाता है! चंदू ने त्रिलोचन की तारीफ़ में उन्‍हें याद करते हुए उनके कवित्‍व पर कुछ बड़ी सटीक पंक्तियां लिखीं, जवाब में हमारे अंदर भी कुछ काव्‍य-साव्‍य वाला प्रेम उमड़ आया, दो घंटे खराब कर के उनकी प्रतिनिधि कविताओं का टिनहा संकलन खरीदकर लिये आए, मगर हाथ-गोड़ पटकने के बावजूद उन्‍हें पढ़ने का समय नहीं मिल पा रहा है?

सचमुच हद है. पता नहीं कहां किस चीज़ की मारामारी है कि टाइम एकदम भर्र-भर्र भागा चला जाता है! पता ही नहीं चलता भागकर गया कहां! किताब, फ़ि‍ल्‍म, लड़कियां सबका देखना एकदम्‍मे अटका पड़ा है (फ़ोन मत कीजिएगा, उठाऊंगा नहीं?). दाढ़ी बनवाना मुश्किल है, तीन दिन से शैंपू नहीं की है, अंडरवीयर बदलना रह ही जा रहा है! इस तरह ये सब कब तक चलेगा? चल पायेगा? दुनिया आख़ि‍र जा कहां रही है? मैं कहां जा रहा हूं? कहीं जा रहा हूं? इट्स सो फ़किन फ़्रस्‍ट्रेटिंग! पहले ऐसा नहीं था! हाथ में बारहसौ पेजी पोथा लेकर सपरकर पैर फैलाये लेट जाते थे, और पोथे के निपटान के साथ ही उठते थे, अब तो ऐसा भारी पोथा देखकर ही सांस छूटने लगती है! खड़े-खड़े माथा घूमने लगता है. लिखनेवाले बारहसौ पेज लिख कैसे पा रहे हैं? डेरलिंपल ‘द लास्‍ट मुग़ल’, सुकेतु मेहता ‘द मैक्सिमम सिटी’ आख़ि‍र लिखे ही? उसके बाद मार्केंटिंग भी करते रहे! यार, इन लोगों को कहां से ये सब करने का टाइम निकल जाता है?.. अपन राम एक ब्‍लॉग को ही संभालने में टें-पें हुए जा रहे हैं!

आसपास की हर चीज़ इतना डिमांडिंग क्‍यों हुई जा रही है? डिस्‍ट्रैक्‍शन के इस लगातार के आक्रमण से बचने के लिए क्‍या बद्रीनाथ-ऋषिकेश जाये बिना छुटकारा नहीं? कि हो सकता है छुटकारा? यही सोचकर दो दिन पहले पढ़ने योग्‍य सारी किताबें बिछौने के नीचे छिपा और मोबाइल की बैटरी को सुला, मैं माथे को हाथों में बांधे बंद टीवी को तकता सोच-सोचकर बोर हो रहा था कि बीच मुंबई में भी रहते हुए डिस्‍ट्रैक्‍शन से छुटकारा है!

बोरियत से बचने के लिए सोचा पांच मिनट टीवी खोलकर हनीफ़ मियां का ज़रा अपडेट देख लें. टीवी खोल तो लिया.. मगर उसके बाद बंद करना बड़ा मुश्किल!.. सीएनएन पर ऑस्‍ट्रलियन पुलिस की बेवकूफ़ी की ख़बर थी, बीबीसी बैंगलोर से बाइट दे रही थी, आजतक वाले कुछ बता रहे थे तो साजतक वालों का भी कुछ कहना था. कोई पत्रकार हनीफ़ के घर घुसा था तो कोई उसके मामा का दुख समझा रहा था! सब केंकें-पेंपें करके दुनिया को अपडेट कर रहे थे, और मैं जाने किस अव्‍यक्‍त अपराध-बोध में ढाई घंटे तक अपडेट होता रहा. टीवी बंद करते-करते शाम ढल चुकी थी, और मैं पिचके हुए खाली बिसलेरी की बोतल-सा महसूस कर रहा था..

अलबत्‍ता रहस्‍य अभी भी रहस्‍य था कि टाइम ससुर जाता कहां है?

6 comments:

  1. प्रमोद भाई

    अब क्या बतायें कि यह समय कहाँ जाता है मगर झेले हुए हैं. यह अलग बात है कि आजकल आप हमारा ब्लॉग तो पढ़ नहीं रहे फिर भी समय का टंटा है तो हम जिम्मेदार नहीं कहलाये वरना अभी अपराध बोध के तले दबे कंठ तृप्त कर रहे होते.

    इस समय की व्यथा को एक बार सझने की कोशिश की थी. थोडा समय निकालिये और पहचानिये कि कहीं यही लफड़ा तो नहीं है click
    here


    या इस लिंक को कट पेस्ट कर लें:

    http://udantashtari.blogspot.com/2006/08/blog-post_28.html

    बताईयेगा जरुर. :)

    ReplyDelete
  2. टाइम को ससुर मानेगें तो यह गड़बड़ होगा ही. ससुर तो अपनी कन्या टिकाते हैं और फ्री हो जाते हैं :)

    ReplyDelete
  3. हमरा टाईम तो ससुरा आधा अजदक पढने के और बाकी समझने मे जात था,ाब जल्दी स्मझ मे आ जाता है तो कभी कभी हम भी लिख मारते है या कुछ लोगो को पढ कर टिपियाने मे जात है,का करे बुरी बिमारी है ससुरी पीछा नही छोडती है..:)

    ReplyDelete
  4. आपको नही पता ये सब लिखने में ही टाइम ससुर चला जाता है

    ReplyDelete
  5. टाइम ससुरे इधरे रहता है. बस पकड़ में नहीं आता है.

    पर आप इतना तो बता देते कि आप हमारा लिखा कूड़ा करकट पढ़ रहे हैं इसीलिए टाइम का टोटा है!

    ReplyDelete
  6. इस पर हम भी कहना तो बहुत कुछ चाहते है,पर क्या करें ससुरा टाईमे नही है!कुछ अईसा ही (आप की तरह)महसूस किये होंगे हरिवंस राय बच्चन साहब जब उन्हें "जीवन की आपाधापी..."सूझी
    आप का लेख पढ्ना समय का सदुपयोग है!!!!

    ReplyDelete