Tuesday, July 31, 2007

जहां खत्‍म होती थी वहीं दुनिया शुरू होती..

ऊपर से देखने पर लगता घर छोड़कर भाग रहे हैं जबकि बच्‍चे जाग रहे थे. कुछ सांझ की उदासी में जग जाते तो कोई भरी दुपहरी अचानक बेचैन होकर बस्‍ता सजाने लगता. जूते, बेल्‍ट, राहुल द्रविड़ की फ़ोटो, पिंटु की चिट्ठी एडिदास के सस्‍ते झोला में डाल रोबिन और तृप्ति से मिलने जाता आख़ि‍री बार. फटी रहती घबराहट होती मगर शर्म का भूगोल उससे बड़ा बीहड़ और गहरा होता. सिर झुकाये बुदबुदाकर बोलता अब बहुत हो गया, यार. दोस्‍त से ज्‍यादा खुद को समझाना होता. माणिक बोलता पिंटु सब किछुइ मित्‍था लिखेछे, आमि जानिं ओर सोत्‍तो. तापस आंटी रोने लगतीं, गु‍ड़ि‍या को ताजुब्‍ब होता जा रहे हो सच्‍ची?

बस की खिड़की से छूटता शहर दीखता जैसे पहले कभी नहीं दिखा होता. पहचानी सड़कें, इमारत, लाल्‍टु की गुमटी और दुर्गापूजा का उजड़ा पंडाल. हमीद की टेलरिंग दूकान और मारवाड़ी मैरिज हॉल. हाई स्‍कूल के दास सर दिखते और स्‍कूटी पर चश्‍मा चढ़ाये संध्‍या. अर्से से बंद सिनेमा हॉल नैना हाथ हिलाके विदा करती दिखती.

गोकि दुनिया लाल मैदान और साल के जंगल पर जाकर खत्‍म हो जाती, पहली मर्तबा धड़धड़ाती रेल के उतरने में खत्‍म हुई दुनिया का फ़रेब खुलता. ठोंगे में मुंगफली खाते हुए नए पेड़ नए उजाड़ दिखते. नए पहाड़ दिखते. रेल के समानांतर भागती किसी पुराने मोटर के दूर पीछे छूट जाने पर सपनों के शहर का एक उत्‍तेजक बाइस्‍कोप जीवित हो उठता. और भूख, बेचैनी व घबराहट के बीच बार-बार दीखता.

3 comments:

  1. जीवन की छोटी छोटी कतरने? यहां पढ्कर यही लगा कि शब्द बोलते हैं... खूब लिखा है आपने, मन कर रहा है "ठोंगे मे मंगफली "क्या कुछ याद दिला दिया आपने!!!!!

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  2. कितनी बार शुरु होती है और कितनी बार खत्म होती है ? कुछ हिसाब रखा आपने ?

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  3. वाह! थोड़ी देर के लिए नोस्टालजिक होना अच्छा लगा.

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