Thursday, July 12, 2007

दिन न रात उलझी-सी बात..

चूहेराजजी को होश नहीं था कि हो-हो करके जो हंस रहे थे, अपने ही किये में फंस रहे थे! क्‍योंकि इधर उन्‍होंने हंसना किया और उधर गर्जना की निकल गई हवा! महक की पंखुड़ि‍यां टूंगते चूहेराज का फिर पता ही न चला कि गए किधर! कहीं तो गए ही होंगे मगर सुनील बाबा की आंखों से ओझल हो गए. गर्जना की हवा निकलने के साथ शैतान सुनील की गति भी गोते खाने लगी. बच्‍चू को बूझ नहीं रहा था कि आ रहे थे या जा रहे थे.. सारा जोड़-गुणा गड़बड़ा गया. सुनील के साथ-साथ बाइस्‍कोप भी सकपका गया था. बाइस्‍कोप के हिलने के साथ सूराख़ से सटी आंखें भी एकबारगी हिल गईं. नहीं हिलीं? ठीक है फिर.. एक बार ज़रा ढंग से देह-बदन हिला लीजिए, तब नए सिरे से सटाइए छेद में आंख और खोजिए अपने लल्‍लन-लुभावन हवालीन असुशील सुलीन लाल को! हां, हां, मालूम है हमने सुनील नहीं, सुलीन लिखा है.. मगर जान-बूझकर नहीं लिखा .. ऐसे ही ‘लिखा’ गया.. जैसे आपसे जाने कौन-कौन से काम ‘ऐसे ही’ हो जाते हैं.. होते रहते हैं.. जिसके बारे में सोच-समझकर पहले से आपने तय किया हुआ नहीं होता है.. नहीं? याद नहीं आया? याद कीजिए, याद कीजिए.. क्‍योंकि हम बताना शुरू करेंगे तो जाने कितनी बड़ी लिस्‍ट तैयार हो जाएगी.. जिसे देखकर आप ही नहीं आपका कुत्‍ता और कुत्‍ते के सड़कछाप दोस्‍त सब आपके लिए शर्मिंदा होंगे. छोड़ि‍ए, जाने दीजिए, आइए, सुनील बाबा की ख़बर लेते हैं..

वो रहे महाराज! मगर हैं कहां? ज़मीन में कि आसमान में? कि अंतरिक्ष के सुनसान में? कहना मुश्किल है.. कहने से ज्‍यादा समझना.. खुद सुनील की समझ में सबसे कम आ रहा है कि वह कौन-सी बला है जो उसकी ओर आ रहा है चला! चौकोर, भारी-भारी, भई भला यह चीज़ है क्‍या?.. किसी के पास दूरबीन है? ठीक है, ठीक है, चश्‍मा चढ़ाकर ही देखिए!..

अरे, यह तो किताब है, भाई! इत्‍ती-सी बात समझ में नहीं आ रही थी? मगर धरती-पाताल, जादुई टकसाल जो-जैसी भी ये जगह है यहां किताब कहां से आ गई? और आ ही गई है तो ऐसे पाजी की तरफ क्‍यों जा रही है जो हमेशा किताबों से दूर भागता रहा है? ज़रूर भेद की कोई बात है..

छोटे-छोटे भारी डेग भरती किताब कुमारी घबराये, सकुचाये सुनील कुमार के पास पहुंची तो जल्‍दी ही भेद खुला.. किताब रानी उदास थीं.. इसलिए कि अकेली थीं, कोई उनका पढ़वैया न था.. और सुनील बाबू भी उन्‍हें हाथ में लेने के ख़्याल से बहुत उत्‍साहित नहीं ही लग रहे थे. किताब मोटी जितनी भी हो, बुद्धू नहीं थी.. लुकाते-छिपाते भी सुनील का संकोच खुल ही गया.. और पहले से ही उतरा (कवर नहीं!) किताब का चेहरा और भी उतर गया!

किताब भागी-भागी गई और एक कोने कवर के भीतर अपना मुंह छिपाकर बैठ गई. धीमे-धीमे उदासी व दुख में घुले आंसू ढुलकाने लगी कि अच्‍छा ज़माना है! एक वक़्त था लोग मेरी एक नक़ल पर कितना दीनार लुटाते थे, मुझे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के पहले वज़ीर और सुलतान का दस्तख़त हासिल करना होता था!.. क्‍या ओहदा, कैसा रुतबा था मेरा?.. और आज.. आज तुम्‍हारे जैसा मामूली छोकरा तक मुझसे आंखें चुराता है! ऊपरवाला ऐसे बुरे दिन किसी को न दिखाए! सुबुक-सुबुक.. सुबुक-सुबुक..

अपने को मामूली छोकरा पुकारे जाने से हालांकि सुनील के दिल को ठेस पहुंची.. मगर मोटी किताब के आंसू बहता देख वह भावुक भी होने लगा.. टेलीविज़न पर जैसा उसने देखा था, उसी अंदाज़ में सुनील आगे बढ़कर किताब के आंसू पोंछ देना चाहता था.. लेकिन इसके पहले कि वह ऐसा कुछ करता, एक और ही अनहोनी हो गई..

(जारी..)

4 comments:

  1. आपने लिखा तो नहीं लेकिन लगता है इस बार सुनील चूहे को खा गया या चूहे ने सुनील को पूरी तरह अपना बना लिया. अब क्या करवाएंगे? आप क़िताब भी ले आए बीच में, अब कोई रोमांटिक सीन बनाइये ना, कि सुनील क़िताब के आंसू पोंछ ही ले और किताब और सुनील के बीच ईलू-ईलू जैसा कुछ होने लगे. हां अब जब चूहे जी कि एंट्री करवाएं तो उनके बिल को पूरा ब्रह्मांड ना सही लेकिन धरती से छोटा बताने की ग़लती मत कीजिए.

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  2. किताब रानी का अकेला पन दूर करे भगवान।

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  3. अनजाना प्रभावJuly 12, 2007 at 8:32 AM

    एलिस इन वंडरलैंड?

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  4. देखते हैं कि टीवी पर दिखाए अंदाज में सुनील बाबू किताब रानी के आंसू पोंछते हैं या नहीं ...वैसे आज किताब रानी के दुख के हरवैये कम ही हैं

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