Thursday, July 12, 2007

दौड़ती बारिश में एक टुकड़ा..



फिर जग गया दिन भर गई सड़क
निकल आए जगर-मगर लोग
भों-पें-घों का हल्‍ला उठातीं बेसुरा गातीं
बमबम हुईं बेदम करती गा‍ड़ि‍यां
कूदकर लांघ गया कोई गली सफल हुआ
एक औरत अचक्‍के चपेटे में आ गई
जाने सोच रही थी क्‍या गुमसुम
भाव तरकारी का मन का या भूल गई थी
बंद करना छाता खोयी हुई थी किसमें
एक कबूतर साइनबोर्ड की आड़ में भीगे पंख
झाड़ रहा था अपनी भटकन ताड़ रहा था
मन से कि तन से ज़रा भीगे हुए
नयी नौकरी के कुछ नए लड़के
पांयचे उठाकर हंस रहे थे, एक अदद
कटिंग चाय पीके बहक रहे थे

एक टुकड़ा दिन का फिर कटकर निकल
आया था. दौड़ती बारिश अभी-अभी
कुछ पल सांस लेने को थमी थी.

6 comments:

  1. प्रमोद जी,बरसात और ्जीवन का सत्य दर्शन कराती ,सुन्दर रचना है।

    एक औरत अचक्‍के चपेटे में आ गई
    जाने सोच रही थी क्‍या गुमसुम
    भाव तरकारी का मन का या भूल गई थी

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  2. टुकड़े-टुकड़े में अच्छी इमेजेज हैं। शानदार कोलाज है।

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  3. कविवर साधुवाद स्वीकार करें.
    सुर, ताल, लय, छवि, बिंब, प्रतिबिंब सब कुछ है. बेहतरीन कविता.

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  4. बहुत सार्थक और सुंदर...

    एक टुकड़ा दिन का फिर कटकर निकल
    आया था. दौड़ती बारिश अभी-अभी
    कुछ पल सांस लेने को थमी थी.

    ऐसा लगा सब आंख के सामने है..

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