Thursday, July 19, 2007

आंख की किरकिरी नीली छतरी..

प्रत्‍यक्षा

ब्‍लॉग की पहाड़ी पर अपनी ब‍करियां खुद ही चरानी चाहिए. मेरा ऐसा ही विश्‍वास है. आपको ख़बर रहती है टुन-टुन बजती ढेरों काठ की घंटियों में कौन वाली घंटी किस बकरी की है.. किसके पीछे डंडी का ठोंहका लगाना है.. और किससे निश्चिंत होकर पेड़ की छांह में गोड़ पसारे बांसुरी बजाने की घटिया प्रैक्टिस करनी है.. मगर हमारा यह सुख आज हमसे छिना जाता है! डंडी से हमें एक ओर ठेल, पहा‍ड़ि‍यों पर फुदकती हुई आज प्रत्‍यक्षाजी चढ़ गई हैं.. टूटी देह में हमारे एक ओर गिरे रहने का फ़ायदा उठाते हुए आज छोकरे की छतरी के नीचे बकरियों को चराने का सुख आज हम नहीं, वह प्राप्‍त कर रही हैं.. छतरी का आनंद आज आप उन्‍हीं के साथ प्राप्‍त कीजिए:

जोकर का चेहरा लाल भभूका हो गया. बच्‍चू को ख़बर हुई हवा में वाकई तीन घुलटियाँ मुश्किल काम था. डाह में सुनील लाल लालमलाल. एक कोशिश की पर आधी घुलटी पलट कर गिरा गई. फिर गिरा देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी. बेशर्म बदतमीज़ घुलटी. रुँआसे चेहरे को कहाँ छिपायें. इधर-उधर तलाश कर ही रहा था कि नीली छतरी दिखी. अहा, कित्‍ती तो सुंदर. कोनों पर फुदने बँधे हुये थे.. फुदनों पे सजी नीली-पीली-लाल नन्ही-मुन्नी बत्तखें.

नीली छतरी की बत्तखों को देखकर रुँआसपना फुर्र हो गया. सुनील मियां छूटके हँसने लगे. हाथ ऊपर बढाया और एक बत्तख को हल्के से घुमा दिया. बत्तखें टल्‍ल-टर्र चलने लगीं! एक के पीछे एक! तेज़ तेज़ और तेज़.. पहले हौले-हौले वाली बयार बही.. फिर सां-बां की तेज़ हवा.. और पीछे, ये ल्‍लो, एकदम्‍म भूचाल आ गया! आसपास की सब-सारी चीज़ें गोल-गोल घूमने लगीं.. कागज़ के चिन्दे, ईरानी गलीचे, आबनूसी मूर्तियाँ, नक्काशीदार सुराहियाँ, रंगबिरंगे अफ़रीकी मुखौटे, हंगरी की तुरही और नाईजीरियन तंबूरा. हवा में गोल-गोल.. ऊपर और ऊपर. बवंडर हो जैसे!.. और इस ऊपर उड़ते पिरामिड के सबसे ऊपर फुनगी पर टिका था हँसता हुआ जोकर! वाह, बेट्टा.. जिसकी हँसी की आवाज़ को पकड़ कर सुनील अब भी टिका हुआ था जमीन पर! ज़ोर लगाए, जी से, जान से.. छाती से सटाये उस आवाज़ को. सर के ऊपर छतरी अब भी घूम रही थी चकरघिन्नी..

और ऐन वक्त पर जोकर की हँसी बन्द हो गई एकदम अचानक! सुन्‍न सन्नाटा, घुप्प अँधेरा.. भँवर के ठीक बीच का हिस्सा.. ज्वालामुखी फूटने के पल भर पहले!.. सुनील की छाती से आवाज़ जो छूटी उखड़ गये पैर, बन्द हो गई आँखें. अब जो आँख खुली तो कोई पीला सफ़ेद बर्फ़ीला फिसलन भरा ये चौड़ा मैदान! खडा जो हुआ तो अजीब सी हुँकार भरी टुनटुनाहट. चुप दमसाधे तो साँय-साँय आवाज़.. आँधी जैसी. कहीं दूर कोई चमकता काला भूरा सितारा. और एक चिल्लिबिल्‍ली जंतु तक आसपास नहीं.. जोकर न महक की पँखुड़ी कुतरके ज़ि‍न्‍दा रहनेवाला चूहा.. एकदम निपट-निपट अकेला.. हां!

मेले में भोलू बुढिया के बाल खा चुका था, गोलगप्पे फुचके चाट खा चुका था. आलू के चाट का दोना नीचे गिरा कर रुपये बरबाद कर दिये की गाली सुन चुका था. चकरी पर बैठकर उलटी कर चुका था और अंत में दो रुपये की नीली छतरी खरीदवा कर परम आनंद में लोहमलोट हो चुका था.. कि आँधी आई, छतरी की नीली बत्तखें हिलीं और छपाके से कोई चीज़ आँख में पड़ी.. जानलेवा किरकिरी.. भोलू लोरोझोरो हुआ. आँखें लाल हुईं. पानी डाला, गरम फूँक मार के गमछे के कोने से आँख की सिंकाई हुई, लेकिन किरकिरी निकली कहाँ.. जोकर पिरामिड पर बैठा पीले दांत दिखाता हँसता रहा. बदतमीज़ कहीं का. सिर्फ किताब कुमारी सुनील की बेहाली पर डिक्‍शनरी से ये शब्‍द निकाल और वो शब्‍द ढूढ़ चुप्‍पे-चुप्‍पे आँसू बहाती रही. शब्द तरतीबी से बाहर आते-से लगते.. फिर बेतरतीब होकर यहां-वहां गिरते पडते रहे. पर सिर्फ रोने से सुनील आँख से निकल जाता तो निकल जाता अब तक. रोना तो भोलू को था. किताब कुमारी माथे पर हाथ दिये सोचने लगी. अब तक आँधी थम चुकी थी. नीली छतरी टूटी-फूटी कमानी की खपच्चियों की चोट खायी बदहाली के बीच बेचारी धूल-ग़र्द में सनी लावारिस पड़ी रही.

(जारी..)

2 comments:

  1. अब आगे वाला पढ़ लें तब कुछ कहें ।

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  2. आनंद में लोहमलोट हुए जा रहे हैं....और शब्दों का चयन बहुत उम्दा है, हमारे पास टाइम नहीं है पढ्ने का ज़ारी लिख के सब गुलगुपाड़ा कर दिया आपने.. अच्छा लग रहा है......!!!!!

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