Friday, July 13, 2007

बिना रंगोंवाला जोकर..

किताब गुमसुम, खोयी-खोयी, ‘आह, कितना तो मैं दुखी हूं!’ वाली अदाओं में अपने आंसुओं के पुंछने की राह तक ही रही थी कि.. जाने क्‍या हवा चली, उड़ी.. कि कुछ का कुछ हो गया.. सब बदल गया! जो सामने था पीछे हो गया.. और जो कहीं नहीं था जाने कहां से आ गया, सब कहीं छा गया! मेले की-सी हवा बन गई.. रेले में कोई इधर रोने तो उधर गाने लगा.. किताब प्‍यारी छूटकर कहां तो पहुंच गई.. और सुनील ने आंख खोली तो अपने को घुप्‍प् अंधेरे में पाया! फिर सोचके चकराते रहे अरे, ये अंधेरा कहां से आया?

दरअसल आए तो वह थे.. अंधेरा तो पहले से ही जमा था.. वहीं, उस बाबा आदम के ज़माने की संदूक में.. अटरम-बटरम, टटरम-सटरम के कबाड़ी कंजास में! सुनील लाल को संदूकी सच्‍चाई की ख़बर मिलती तो शायद वहीं अंधेरे को अपने कै में नहला देते.. मगर चूंकि पहले से ही इतनी सारी महक में नहाए हुए थे, उनपर बक़्से के गंधाते भभके का वह जादुई असर न पड़ा जिसके चपेटे में अक्‍सर बड़े-बड़े खड़े-खड़े गिर जाते हैं! सुनील पहले से ही गिरे हुए थे.. फ़ि‍लहाल किताब के अकेलेपन का दुखड़ा-टुकड़ा सब भूलकर अपनी फजीहत सुलझाने में जुटे. यहां से पैर निकाला.. वहां हाथ डाले.. टोया-टटोला.. अभी ख़बर होनी ही थी कि कहां ढुके हैं.. तबतक खुद संदूक का ढकना उठ गया!

भक्‍क् से चमकती रोशनी भीतर आई.. और उस रोशनी में चिंहुककर सुनील के मुंह से निकला- आआआ! कुछ वैसी ही आवाज़ उस सुशील के मुंह से भी निकली जिसने संदूक का मुंह खोला था, और अब अपना खोले सन्‍न खड़ा था!

- हमारे बक़्से में क्‍या कर रहे हो?, सुनील की-सी ही ऊंचाई, मगर उम्र में उससे तक़रीबन पचास वर्ष बड़े भले बौने ने सवाल किया.

गुज़रे ज़माने की एक गोटेदार पगड़ी, मखमल का एक पुराना चिथड़ा रूमाल, चीन और ईरान के सिक्‍के, आबनूसी लड़की की काठ की एक मूरत, एक खराब पड़ी बंदूक, सुनहले काजवाला जूता, पशमिने का शॉल, हंगरी की एक तुरही, नाइजीरिया का तंबूरा.. क्‍या-क्‍या तो बक़्से में कंजास दबा पड़ा था. तबीयत दुरुस्‍त होती तो सुनील तसल्‍ली से एक-एक अनामत का मुआयना करता.. आंख बचाकर शायद दो-एक चीज़ गायब करके अपनी जेब के हवाले भी कर लेता.. मगर फ़ि‍लहाल अपनी जान की गरज थी. बौने की मदद से कूदकर बक़्से से बाहर आ गया! और बाहर आने के बाद, पहली बार, गौर से सामने खड़े नमूने का नुमायना किया.. नहीं, मुआयना किया.

बक़्से से बाहर आते ही सुनील बक़्से के अंदर पहुंचने की रामकहानी एकदम-से भूल गया.. हैरान आंखें फाड़े सामनेवाले को देखता आंखें न फाड़ने की कमज़ोर करतब करता रहा.. इसका पूरा यकीन था ऐसी बनावट और बुनावट वाले प्राणी को उसने पहले भी देखा है.. कहां देखा है इसका ध्‍यान नहीं आ रहा था.. मगर साथ ही यह भी ध्‍यान आ रहा था कि जब देखा था तो इनके मुंह पे रंग और नाक पर सफ़ेद टेबल टेनिस वाला बॉल हुआ करता था. हां, उसीके न होने से तो पहचानने में मुश्किल हो रही थी.. न पहचानकर चक्‍कर आ रहा था. अब पहचान लेने के बाद सवाल करने की बारी सुनील की थी.

किया सवाल- आपको मैं जानता हूं.. आप जोकर हो!

बौना था नहीं.. लेकिन एक मंजे जोकर की तरह हंसने हो-हो हंसने लगा. सुनील को लगा ये मिंया अभी हवा में तीन घुलटी खाकर फिर एक नया करतब दिखाएंगे..

(जारी..)

3 comments:

  1. ये छोकरा बडा शैतान है । बक्से में कैसे पहुँच गया ?

    ReplyDelete
  2. ज़ारी लिख कर आप पूरे दिन की ऐसी तैसी कर देते हैं....चालू रखें कहानी मज़ा दे रही है.

    ReplyDelete