Tuesday, July 24, 2007

कितनी मुद्दत बाद मिले हो किन सोचों में ग़ुम रहते हो..

पत्‍नी क्‍या करती, उसे प्रेम हो गया था. पति से नहीं, न. उनसे तो चौदह साल पहले हुआ था.. अब तो उसका ख़्याल और ओवर कंज़प्‍शन दोनों एक-सा भय जगाते थे. जो लगी वह नयी आग थी. और इसलिए नहीं लगी थी कि पत्‍नी ने कहीं किसी दीवार या इश्तिहार में ‘प्रेम बिना जग सूना’ या ‘प्रेम सकारथ करि जइंहैं’ जैसी लाइन पढ़ ली थी, और चौकन्‍नी हो गयी थी. प्रेम के बारे में तो कितने वर्ष निकल गए थे पत्‍नी ने सोचा तक नहीं था. आगे भी कहां सोचती अगर उस दुष्‍ट रंजना ने मन में तोड़-फोड़ पैदा न कर दी होती! कितना अजीब था मन में रंजना के हुआ और तोड़-मरोड़ पत्‍नी के जीवन में चला आया! शायद इसीलिए पति पत्‍नी के रंजना से हमेशा लहे रहने के ख़ि‍लाफ थे. भला आदमी समझता रहा होगा (और परिस्थितियों ने साबित किया भी कि सही ही समझ रहा था!) कि औरतें इतना कान और मुंह सटा रही हैं ज़रूर गड़बड़ करेंगी. वही हुआ. गड़बड़.

आपस में नहीं, न. रंजना लेस्बियन नहीं थी, और पत्‍नी क्‍या थी इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण पाने वाली स्थिति आजतक उत्‍पन्‍न नहीं हुई? असल मामला यह हुआ कि बात कहीं की कहीं निकल गयी.. कहां निकली? अरे, अच्‍छे आदमी (या बुरे?), सुनिए तो, वही तो बता रहा हूं!..

हुआ यह कि पत्‍नी दोपहर के हेवी भोजनोपरांत दो डकार लेने और एक लघुवाली हवा छोड़ने के बाद अलसायी, देह तोड़ती सोफे पर उठंगी टीवी देखने की जगह फ़ोन पर मुज़फ्फरपुर वाली मौसी का नंबर लगाने लगी, मगर उधर लाइन में गड़बड़ी थी या क्‍या था, नंबर न लगने पर पत्‍नी ने हारकर या कंफ़्यूज़न में रंजना का नंबर ट्राई किया और छठवीं घंटी बजते ही बदमाश ने फ़ोन उठा लिया और गड़बड़ी हो गई! पत्‍नी बचपन की सखी वाले अंदाज़ में ठुनकते हुए बोली- इतनी देर से घंटी बज रहा था, उठायी क्‍यों नहीं? मुझे मालूम है क्‍यों नहीं उठायी!

पत्‍नी अपनी समझ से मज़ाक कर रही थी मगर रंजना के घड़ी भर चुप रहने से उसे लगा शायद उसका अनुमान, महज़ हवाई अनुमान नहीं था.. तबतक दूसरी ओर से रंजना का ठुनकता स्‍वर आया- काश कि तेरा शक़ सच होता! इतनी मेंहदी-नेल पॉलिश करती हूं मगर कोई देखनेवाला नहीं. छेड़नेवाला नहीं? इसके पहले कि बाल सफ़ेद होने लगें मैं तो सच्‍ची चाहती हूं इधर-उधर कोई चक्‍कर चल जाए! रियली, यार, विदाउट लव लाइफ़ इज़ सो डल एंड बोरिंग?

पत्‍नी लिप्सटिक, मेंहदी, नेल-पॉलिश वाली नहीं थी.. मगर उसका दिमाग उड़ गया! बाल अभी उड़ना शुरू नहीं हुए थे लेकिन उनके रंगों के उड़ने में ज्‍यादा समय नहीं बचा था. पत्‍नी घबराने लगी कि कहीं ऐसा न हो कि जीवन में फिर प्रेम न हो और उसकी रेल निकल जाए? कहीं इधर-उधर चक्‍कर चलाने और दिल लड़ाने जैसे फेटल एक्‍सी‍डेंट के लिए पत्‍नी मचलने लगी. पति पूछते क्‍या बात है, आजकल तुम्‍हें हुआ क्‍या है तो पत्‍नी के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगती.. घबराहट में पैर चटाई में उलझ जाता या कड़ाही में छौंक के लिए तेल की जगह दूध डाल देती. पति को सूझ नहीं रहा था बेचैनी क्‍या है इसलिए उन्‍होंने बेचैन होकर अलीगढ़ से अपने पुराने मित्र अब्‍बास को बुलवा लिया. अब्‍बास को देखते ही पत्‍नी उनके प्रेम में पड़ गई.. और दिन-रात ज्‍यादा बेचैन रहने लगी. नतीजतन अब्‍बास भी बेचैन होने लगे और जवाब में पांचवे दिन अलीगढ़ में उनकी बेग़म बीमार पड़ गईं. मामला जब हद से गुजरने लगा तो एक दिन किसी को बिना बताये अब्‍बास भोर की बस से अलीगढ़ भाग गए. पत्‍नी को सुबह पौने नौ बजे ख़बर हुई तो उसके होश उड़ गए.. वह घर के एक कोने से दूसरे कोने भागती रही लेकिन अब्‍बास मियां का कहीं पता नहीं चला.. आखिर में हारकर बेचारी सोफे की उस गहराई को खड़ी तकती रही जिस पर अब्‍बास के नितम्‍बों के निशान की गहराई की अब भी कल्‍पना की जा सकती थी.. कल्‍पना में उस पर हाथ फेरा जा सकता था..

पत्‍नी वही कर रही थी.. हाथ फेर रही थी जब जांघ खुजाते व कान मलते पति ने इसे नोटिस किया और चिढ़ी आवाज़ में बोले- जो है नहीं उसे क्‍या सहलाना.. सामने है उसी में सुखी रहो.

पत्‍नी नहीं हो सकी. सुखी. भागकर किचन गई.. दरवाज़ा ढांपकर रोती रही.. साथ ही गैस पर दूध का गरम होना देखती रही.. दूध जब खौलने-खौलने को हुआ तो पत्‍नी ने नाक सुड़ककर गैस व रोना दोनों बंद कर दिया.. दरवाज़े से चेहरा निकाल कर पति से पूछी- चाय पीजिएगा कि कॉफ़ी?..

2 comments:

  1. पर्मोद भाई मैं पूछ रहा हूँ कि चाय पिएंगे कि ......

    ReplyDelete
  2. जो है नहीं उसे क्‍या सहलाना.. सामने है उसी में सुखी रहो. सही है। जो लिखा उसी में सुख लूट रहे हैं।कल वाला लेख अभी पढ़ना है। :)

    ReplyDelete