Thursday, July 12, 2007

महानता की मार..

शाम की जवानी पीछे छूट चुकी है.. और मैं जो है अभी तक महानता को प्राप्‍त नहीं हुआ हूं. चंदू के कहेअनुसार शुरू में सकुचाते हुए, और थोड़ा रंग में आते ही- बेहद बेशर्मी से मैंने रम और व्हि‍स्‍की ढरकाया.. व्हि‍स्‍की बही है मगर महानता हाथ नहीं आई है. अलबत्‍ता हाथ से गई हैं. चीज़ें! मैं इधर महानता में उलझा रहा और पीठ पीछे किसी ने बाइक का शीशा और पुराना हवाई चप्‍पल मार दिया! किस हरामी का काम हो सकता है? सामने पड़ जाए तो महानता से नहीं, चप्‍पल-चप्‍पल मारूंगा! (हवाई से नहीं, वह तो खो गई.. वैसे भी पुरानी पड़ गई थी.. मगर पुरानी पड़ गई थी इसी से किसी को हक़ नहीं मिल जाता कि ले उड़े? हद है).. ऐसी कुटाई करूंगा कि बच्‍चू के अक़ल ठिकाने आ जाएगी!..

बहुत डाऊन-डाऊन लग रहा है. अरे, ये कोई बात हुई? हम यहां महानता का सोचके गुलगुला हुए जा रहे थे और कोई चिरकुट गोड़ का टुटही चप्‍पल गायब कर दे! आदमी इस देश में शांति से महान होने के बारे में भी नहीं सोच सकता? सो‍चते रहिए, पता चलेगा बैंक वाली लाईन में आपके पीछेवाले साहब आपको सोचता छोड़ आपसे आगे हो गए! या तरकारी वाला आपके चेहरे का खोया-खोयापन ताड़के झोला में तरकारी गिराते हुए दो सड़ा बैंगन गिरा दे? ऐसे में महानता का क्‍या तकाज़ा बनता है? घूमके उसके एक तमाचा जड़ि‍एगा, कि गांधीजी के माफिक मुस्कियाते हुए दूसरा खाली झोला आगे बढ़ाके कहिएगा- इसमें भी सड़ा डाल दो, भइया?..

भर गए ऐसी महानता से. कल महान नहीं थे लेकिन दिन इतना खराब नहीं था.. शाम को जलेबी भी खाए थे, जबकि आज चप्‍पल और शीशे का पता चलते ही मन ही एकदम-से उतर गया! जलेबी की तरफ देखने की भी इच्‍छा नहीं हुई. जलेबी की दुकान पर एक मैडम थीं उनको भी देखने की इच्‍छा नहीं हुई. फिर नोटपैड एक्‍साइटेडली कहती हैं कि मुंह बंद रखूं तो तुरन्‍त महान हो जाऊंगा? हद करती हैं, नोटपैडल जी, सबसे ज्‍यादा मुंह इस मुलुक का आदिवासी लोग बंद रखा है, कितना महान हुआ ऊ लोग, देख नहीं रही हैं? नहीं, नहीं, मुंह बंद रखनेवाले महानता में हमारा विश्‍वास नहीं है. आजकल सारी महानता तो टीवी पर बकर-बकर बोलके पाई जाती है.. जो टीवी पर नहीं पहुंचा उसका जैसे एक्‍ज़ि‍स्‍टेंसे नहीं है! तो जब टीवी पे जाके मुंहे न खोल सकेंगे तो ऐसी महनतई का करेंगे का? सर्टिफिकेट बनाके दीवाल पे टागेंगे, बात करती हैं!

सबसे ज्‍यादा गुस्‍सा रवीश पे आ रहा है! जवान तीन दिन बाद पत्रकारिता का बड़का अवार्ड पाने वाला है.. बदमाश से इतना तक कहते नहीं बना कि परमोद भइया, अपने बड़के के साथ आपो बास्‍ते महानता का एगो छोटका अवार्डी इंतज़ाम कै देंगे, मुंह मत गिराइए? ना, एक्‍को मर्तबा नै कहा.. हम यहां सुबह से छै पोस्‍ट चढ़ाके औ’ घरेलू प्रॉपर्टी चुरवा के बैठे हैं, और जवान का कहीं कोई पते नहीं है!

8 comments:

  1. एक दिन में छ पोस्ट ! आप सचमुच महान हैं ।

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  2. कुछ समझ नही आ रहा कि ये "महानता" आप से क्या- क्या करवाएगी? लेकिन जो आप कर रहे हैं लगता है महानता आप से कुछै दूरी पर है अज़दक बाबू ज़िन्दाबाद !!!!!!

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  3. आप सच्ची में महानता के इलाके में पहुंच गये। ये रवीश बाबू के इनाम की बात जरा खोल के बतायी जाये और उन तक हमारी बधाई पहुंचाई जाये।

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  4. @शुक्‍ला जी,
    सही कह रहे हैं.. मैं महानता की उसी ऊंचे टीले पे खड़ा आप क्षुद्रजनों को देख पा रहा हूं.. अलबत्‍ता ईनाम रवीश मियां पा रहे हैं. 16 को उन्‍हें अपने क्षेत्र में योगदान के लिए (और हमें?) रामनाथ गोयनका पुरस्‍कार से नवाज़ा जा रहा है. आप ही नहीं, उन्‍हें चाहनेवाले हम सभी लोगों की ओर से उन्‍हें बधाई.
    @बबुनी नोटपैड,
    उम्‍मीद है हमारी टांग खिंचाई का आपने बुरा न माना होगा. बुरा मानेंगी तो मैं फिर एक और पोस्‍ट लिख डालूंगा, हां!

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  5. तो आप बोर करने से बाज़ नही आने वाले ?!ठीक है ।एक और तरीका ।मुह सिए आदिवासियो के लिए कुछ बोलिए ।उनके अपने नेता तो उन्हे दगा दे गये ।आप ही उनकी ओर से बोल कर महान हो लीजिए !
    वैसे इतना टेन्सनियाने की जरूरत तो है नही ।आप महान तो है ही पहले से ।एक दिन मे ६ पोस्ट !!महान लोग ही डाल सकता है ।

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  6. मुँह उठाईये और टिप्पणी पढ़ीये आप बाय नेचर महान है ही, अवार्ड-सवार्ड तो अननेचुरल महानता के प्रतिक है. गाँधी को भारत रत्न नहीं मिला, कोई जरूरी भी नहीं था. राजीव गाँधी के लिए जरूरी था. :)

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  7. रवीशजी को बधाई और शुभकामनाएं।

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  8. पहली कोशिश मे ही चप्पल और शीशा पार हो जाए, ऐसी महानता से तो न महानता ही भली!

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