Wednesday, July 4, 2007

बीहड़ में इरफ़ु मियां की मेहराई कुहनिया..

देर रात भाषा से अपनी उलझनभरी फंसान-खींचतान की एक तस्‍वीर बुनने की कोशिश कर रहा था. आधा दिन बीत चलने पर, दुबारा उसे देखते हुए लगता है, तस्‍वीर क्‍या, ठीक से स्‍केच तक खड़ा नहीं कर सका. थोड़े शब्‍दों को सजाकर एक इंप्रेशनिस्टिक मुकाम पा लेना मुश्किल काम है. बहुत बार कहीं से कहीं आप पहुंच जाते हैं, बाज मर्तबा कहीं नहीं पहुंचते. ‘लात खाये, सिर झुकाये’ में तस्‍वीर का एक छोटा कोना उकरता है, बाकी व्‍यर्थ है.

‘फॉल्‍टी’ हेडिंग से ही सिलसिला बन गया. गुत्‍थमगुत्‍था का अग्रेशन ‘गुमसुम’ के पैसिव भाव में अनुदित होकर शुरूआत में ही टोन गड़बड़ा देता है. फिर तीनों टुकड़ों की कोई ‘थीमेटिक’ संगति भी नहीं. बेमेलपने के साथ-साथ, अपनी बुनावट में दोनों ही अति साधारण हैं.

ब्‍लॉग के दूसरे ढेरों फ़ायदे के साथ एक नुकसान यह ज़रूर नत्‍थी है कि कुछ लिख डालने के बाद आप हड़बड़-तड़बड़ में उसे चढ़ा डालना चाहते हैं. हमारी तरह वर्षों का ‘बैकलॉग’ लिए उत्‍साही भावुक सिपाहियों की यह मुसीबत थोड़ी ज्‍यादा है. कभी-कभी कुछेक घंटों के उपरांत बुद्धि खुल भी जाती है, तब अपने लिखे को देखकर शर्म महसूस होती है, और एक मासूम-सी हसरत में समय काटते हैं कि इस दो कौड़ी की चीज़ पर भद्रजनों का ज्‍यादा ध्‍यान न जाए, व जल्‍दी-जल्‍दी नए पोस्‍टों को चढ़ाकर हम उम्‍मीद पालते हैं कि उपरोक्‍त नामुराद पीछे कहीं दब जाए, छिप जाए. लब्‍बोलुवाब यह कि चिरकुटई के उपरांत अंदाज़ा तो रहता ही है कि चिरकुटई हुई है. इसीलिए ऐसे मामलों में भोलेपन की भलमनसी में कोई कंधा थपथपा दे सो बात समझ में आती है, मगर किसी कोने ज्‍यादा लड़ि‍याहट होने लगे तो ज़ाहिर है, कान खड़े हो जाते हैं. इरफ़ान मियां, सुन रहे हैं ना.. हां, आप ही के लिए कह रहा हूं?

टिप्‍पणी में अपनी वाह के साथ दरअसल आप ज़ाहिर क्‍या कर रहे हैं? मामला है क्‍या? भावुकता की भर्र-भर्र अदाएं छोड़ हमारी पीठ पर धौल मारते हुए व्‍यंग्‍य लेखन पर हाथ आजमा रहे हैं? कर क्‍या रहे हैं? कि आलोकधन्‍वा और ज्ञानेन्‍द्रों सरीखे कवियों को अपनी मुस्‍की पर नत्‍थी किये रहने के बाद अब आपके मानदण्‍ड ऐसे गिर गए हैं कि हमारी पिचकी कविता में आपको निर्मल सरिता दिखने लगी? हम आपको चालीसोपरांत पुरस्‍कार लायक लगने लगे? आपको कुछ लगे उससे पहले, मियां, कुछ हमें भी तो लगने दीजिए! या हमारी चिरकुटइयों पर ऐसे ही कुर्बान हो रहे हों तो ज़रा तफ़सील से हमें ख़बर कीजिएगा, हम आपकी मांग पूरी करने का कोई क़ायदे का सिलसिला खोज निकालेंगे! हद है.

7 comments:

  1. Baai je manaa हम पूरे चिरकुट है,पर इतने नही थे जितने प्रमोद भाइ के प्रगतीशील माफ़ करना अ पहले लगा लेना के पढने से पहले नही थे,अब ज्यादा है अब हमे खुद समझ मे नही आ रहा है हमने क्या लिखा ना आये तो ४ पैग लगाकर पढना ,आ जायेगा,

    ReplyDelete
  2. अब देख लीजिये कि आपने वार किया और वो भी ऐसा बेमसरफ़ कि लगा वार भी अब राजघाट से ख़रीदे जाते हैं. ग़ौर कीजिये कि इतने बेअसर और लगभग फछीटे हुए आपके विचार कुछ दर-दर फिरते लोगों के असर में तो नहीं हो रहे हैं जो यहां-वहां टांग उठाकर कर जै-हो का जयकारा लगाते रहते हैं.

    उदाहरण के लिये मैं निम्नलिखित कविता पोस्ट करूं तो इसकी चार पंक्तियों को कॉपी करके "भई वाह क्या भाव व्यक्त किये हैं" कहने वाले ज़रूर घूम रहे हैं--

    जीवन की यह बहार तुमसे है
    हर दिन हर त्योहार तुमसे है
    कोई माने या ना माने मेरी सांसों की धार तुमसे है
    तुम जब पास हो तो सवेरा है
    तुम जब दूर हो तो अंधेरा है
    जीवन का यह जो घेरा है
    इस पर सिर्फ़ तुम्हारा डेरा है.
    आज मैं कहता हूं कि यह दिल जो हमारा है
    यह अब हमारा कहां ये तो सिर्फ़ तुम्हारा है
    उम्र भर चाहे हम रहे कांटों में,
    पर रब्बा करे आपका दामन फूलों से भरा रहे.
    ---------------------------------

    मुझे नहीं मालूम है कि कौन-कौन, कहां-कहां क्या-क्या टिप्पणियां भेजता रहता है, लेकिन इतना आपने ज़रूर बताया कि आपको तारीफ़ पसंद नहीं आई. आपने नाराज़गी दिखाई अच्छा लगा लेकिन दुख है कि आप इतने उदार हुए जा रहे हैं.

    (एफ़एम गोल्ड के एक श्रोता हैप्पी हार्ट हरभगवंत सिंह, विष्णु गार्डेन द्वारा गत सप्ताह प्राप्त कविता)

    ReplyDelete
  3. इरफ़ान जी.. ये जो आप आलोक धन्वा की कविता यहाँ वहाँ टपकाते चलते हैं.. उसके प्रति आपकी इतनी श्रद्धा का स्रोत क्या सचमुच उस कविता के भाव और शिल्प में ही है या कहीं और? उसे तो निश्चित ही फ़छीटी हुई और बेअसर नहीं मानते होंगे.. यदि मैं मानता होऊँ तो..?मेरी नज़र में आलोक धन्वा भी आप ही की तरह कुछ ज़्यादा गूढ़ बुनने के चक्कर में.. कुछ ज़्यादा ही कलात्मक बनने के प्रयास में इतने असहज हो जाते हैं कि उन्हे पढ़ कर कोई आनन्द नहीं लिया जा सकता.. भले ही वे सचमुच कोई भयानक क्रांतिकारी बात कह रहे हों.. किसी के भी कृतित्व को ऐसे तौल लेना ठीक नहीं.. और ये मत कहियेगा कि संघर्ष से ही सच्ची एकता आएगी.. अगर ऐसा है तो आपकी सच्ची एकता बजरंगियों से हो चुकी होगी..क्या ऐसा ही है?

    ReplyDelete
  4. मित्र अभय!
    अगर आपको आलोकधंवा की कविताएं पसंद नहीं हैं तो यह आपका नितांत निजी आस्वादात्मक मसला है. मुझे अगर कुरोसावा के बजाय डीसीका की फ़िल्में अच्छी लगती हैं तो मैं कुरोसावा प्रेमियों से दोस्ती खत्म नहीं कर सकता. अगर आपको इस बीच डेविड धवन की फ़िल्में "समझ" में आने लगीं हों तो शायद संघर्ष से भी सच्ची एकता न हो पायेगी.

    ReplyDelete
  5. पुनश्च: अभय जी आपकी आनंदेच्छा को मैं संबोधित नहीं कर सका लीजिये करता हूं इस शेर से--

    तेरे दर पर हम बार बार आयेंगे,
    घंटी बजायेंगे और भाग जायेंगे .

    ये शेर उन सभी कविताप्रेमियों के लिये है जिन्हे आलोकधंवा, शमशेर, मुक्तिबोध या विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में 'आनंद' और ख़ासकर निर्मलआनंद नहीं मिलता.

    ReplyDelete
  6. इरफ़ु मियां, आप धन्‍य हैं.. हमारे लिए किसी भी तरह से गम्‍य नहीं ही हैं. सत्रह लालटेनों से छूटती-सुलगती तुम्‍हारे ज्ञानालोकों की जाने कौन-सी तो रोशनी बात समझने की हमारी कैसी भी सामर्थ्‍य का अंधेरा धुल नहीं पाती. भर्र-भर्र शब्‍द चुवाते रहते हो, हम बार-बार समझने से चूकते रहते हैं घंटा, घंटी बजाकर कक्षा चार के लौंडे की तरह भाग जाने से अलग हासिल क्‍या करते हो!

    ReplyDelete
  7. हां आपने इस बार तो ग़लत ही समझा. घंटी का संदर्भ कक्षा की या स्कूल की घंटी नहीं है. हम जो बचपन में कॉलबेल वाले घरों की घंटी बजाकर मज़ा (आनंद नहीं)लिया करते थे, जिसमें आपकी गति नहीं रही शायद. समझ का संबंध कुछ अनुभव सापेक्ष भी होता है, यही तो आप कहा करते हैं. आपसे निवेदन है कि ब्लॉगपाठकों की खातिर इतने ही नेचुरेलिस्ट बनें जिससे आपके भीतर जम रही बर्फ़ याद रखे कि वो कभी आग थी.

    ReplyDelete