Thursday, July 12, 2007

लंचब्रेक में प्रेमीद्वय के बीच कहासुनी..

मलयाली सुधा कुट्टी और बंगाली ओनिर्बन पालित दोनों एक ही दफ़्तर में काम करते थे.. इन दिनों एक-दूसरे पर भी कर रहे थे.. घर और अपनी पहचानी दुनियाओं से दूर अपरिचित-बेगाने शहर में इस नए काम के बनने.. और न बन पाने से अक्‍सरहा इन दिनों चिढ़े-चिढ़े से रहते थे.. ऐसे ही किन्‍हीं चिड़चिड़ाहटी क्षणों के बीच का एक कट..
ओनि- मेरा मोन नेंई क्‍या? खूब गुलो इच्‍छा.. मा खाली इच्‍छा निये किछु हॉय की? पाकिट में टाका-नोट का दोरकार!.. आमारो मोन हॉय छोबी-पिच्‍चेर जाने का.. तोमाय सोंगे निये जाबार मा कोरबो की बलो ना?..

सुधा- मेरे को कुच नई सुनने का.. तुमारा जो मेरजी केरो.. में कंप्‍लेन किया क्‍या?.. लेट मी हैभ माई लंच, प्‍लीज़?

ओनि- ऐई रोकोम कोथा बॉला जाय की? हामारा गोलती क्‍या, बोलो ने? हामको बी बड़ो गुलो इच्‍छा.. लेकिन हाम क्‍या पाइसा पैदा करेगा? सुदा, तुमि जानो ना? कतो टाका पाई आमि? कोथाय खरचो-टोरचो हॉय? आइसा कोथा-गुलो कोरके हामारा बीच आंढरस्‍टांडिंग की रोकोमे आशबे, बलो तो?

सुधा- ऐन्‍नोड बेंगालील समसारीकेंडा, चेत्ते (बंगाली में बात मत कर, हरामी!)!..

ओनि- की बलछो की?

सुधा- मेरे को मालूम नई! डेली वोई ट्राबल.. एक बी काम तुमसे टीक से होने का नईं.. आई एम स्‍सो मच्‍च टायर्ड!

ओनि- आमियो सुदो टायर्ड, सुदा? हामलोक को कोई सोलूशन खोजने का होगा किंतु?..

सुधा- तुम कोजो.. में कल से तेरा सात लांच नईं करने आती!..

7 comments:

  1. बहुत खूबसूरत बातचीत!

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  2. मिश्ठी गल्पो... की भालो !!!!

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  3. हल्के-फुल्के अंदाज़ में ही सही लेकिन आपने मध्यवर्ग के अभाव का अच्छा चित्रण किया है। मध्यवर्गीय प्रेमी प्रेम कम हिसाब लगाने में ज्यादा वक्त खर्च करते हैं।

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  4. अरे ऐसे कैसे चलेगा ? पालित बाबू को किसी बैं‍क वैंक का डाका डलवाईये । इतना तो प्रेमीद्वय की मदद कर ही सकते हैं । बेचारी सुधा कुट्टी के दिल का हाल कुछ तो समझिये ।

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  5. ऐई बोंगाली छेले तो ओनेक कांजूस...शाला बहाना मारता है. खाली पूजो के बारे में सोचता है, टाका बाचाके बोउदी के साथ दीघा जाने के फेराक में है..समझाइए न...

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