Thursday, July 12, 2007

महानता की चाह में..

शाहरुख़ महान नहीं लोकप्रिय है. पॉपुलर. पॉपुलर और महान में फ़र्क होता है. पॉपुलर पॉपुलर ही बने रहते हैं और महानता कहां से कहां उड़ जाती है. ग़लत.. बने भी नहीं रहते. पॉपुलर चार दिन की चांदनी है जबकि महान पूरी लाइफ़ का इंश्‍युरेंस है. उसके बाद का भी है. बाद वाले फेज़ में ही समाज महानता के गुण ज्‍यादा गाता है. जीते-जी महानता स्‍वीकारने में आनाकानी चलती रहती है. भाई लोग लंगी लगाते रहते हैं. एक ग्रुप कहता है महान हैं तो इम्मिडियेटली दूसरा ग्रुप विरोध में खड़ा होके हल्‍ला करने लगता है- परंपरा से पॉलिटिक्‍स खेलना बंद करो? महान आदमी के मर जाने के बाद ये सारे हल्‍लाख़ोर चुप हो जाते हैं. मन ही मन चुप न होते हों तो भी सार्वजनिक तौर पर शांत हो जाते हैं. कुछ नहीं भी होते हैं. मगर तब ये हल्‍लाख़ोर नहीं, लतख़ोर कहलाते हैं, और हर समाज में पाए जाते हैं, और इनका कुछ नहीं किया जा सकता. माने विमर्श की भाषा में नहीं, सिर्फ़ लात लगाकर ही इन्‍हें शांत किया जा सकता है.

लतख़ोरों की बात आते ही जाने क्‍यों मैं हमेशा एक्‍साइट होने लगता हूं. जबकि आज मैं एक्‍साइट किन्‍हीं अन्‍य वजहों से होना चाह रहा हूं.. सामने महानत्‍व का विषय है.. और विषय से एकदम सटा-खड़ा मैं हूं.. महान हो जाने के संबंध में विचार कर रहा हूं. अभी विचार कर रहा हूं, हो सकता है शाम तक हो भी जाऊं. फिर आपके पास कहने को रहेगा कि आपने महानता को निकट से देखा है. नहीं देखा है तो महसूस किया है. एक ही बात है!

महान होना पाप नहीं है. अपराध नहीं है. मुझे नहीं लगता मार्शेल प्रूस्‍त, योआन सेबास्तियन बाख़, नोबोकोव या कालिदास ने महान होकर कोई पाप किया. पाप किया होता तो पापी कहलाते, महान नहीं. पापी मेरे मामा हैं. महानता की चाह में गांव में स्‍कूल खोलना चाहते थे. मगर गांववालों से पहले मामी ने ही उनकी सारी योजना तेल कर दी, गांव भर में घर फूंकनेवाला, जल्‍लाद और पापी-पापी का हल्‍ला फैला दिया. मामा की महानता धरी रह गई, उनका ज़ि‍क्र उठते ही पापी-पापी की फुसफुसाहट शुरू हो जाती. मैं ऐसा टंटा नहीं चाहता. कि महानता की गड़ही में चाहना लेके उतरे और अंत हो गया पाप के पोखरे में. ना ना. मैं नीट और क्‍लीन महानता चाहता हूं. एटीएम के चमकते शीशे के दरवाज़े और गूगल के होम पेज जैसा साफ़. गांववालों को चाहता ही नहीं हूं. ऐसे चिरकुटों के नज़दीक रहने से कुछ का कुछ हो ही जाता है. गांव के गंदो दूर रहो! हरियाणा के निकट दिल्‍ली वाली महानता भी नहीं.. सीधे पैरिस और न्‍यूऑर्क वाली ही चाही जाए.. धड़ से न्‍यूऑर्क टाइम्‍स में हेडलाईन बनके छा जाऊं कि इनसे मिलिए, हमारे समय के एक और संशयात्‍मा- महात्‍मा! मैं भीड़ की तरफ हाथ हिलाता डायस पर पहुंचूंगा.. नीची नज़रों से गला खखारकर उपस्थित जनसमुद्र के बीच अपनी महानता के प्रभाव ताड़ूंगा.. और फिर धीमे-धीमे महीन व सधी हुई आवाज़ में अपनी महानता का रंग जमाना शुरू करुंगा.. जनसमुद्र मुझे सुनेगी और सुनती रह जाएगी. माने दंग रह जाएगी. मैं भी रह जाऊंगा. कि बैठे-बिठाये अंतत: मैं महान हो ही गया!..

आपको बात पच नहीं रही? क्‍यों नहीं पच रही.. कुछ गड़बड़ी है? वही होगी.. सीधे, फ़ीके और सामान्‍य होंगे इसीलिए घोंटने में दिक्‍कत हो रही है. ऐसे मूढ़जन महानता तो क्‍या, महानता के सपने देखने के औकात को भी प्राप्‍त नहीं होते. तेल-नून-तरकारी में ही फंसे रह जाते हैं.. महानता बगल में खड़ी थक-ऊबकर कहीं और किसी सच्‍चे गुणग्राही की खोज में निकल जाती है! आपको इतनी-सी बात समझ नहीं आ रही कि महानता प्राप्‍त होते ही कैसे आप तेल-नून-तरकारी के चक्र से बाहर निकल आएंगे? इतना सीधा फ़ायदा नहीं समझ में आ रहा?.. संभवत: नारद-टारद ओर रोज़-रोज़ के गारद से भी बाहर निकल आएं! आपको ऐसे मुक्‍त जीवन की चाह नहीं? कैसे आदमी हैं आप? या औरत? या जो कोई भी और?..

फालतू में दिमाग चाट गए. सुबह-सुबह. जबकि शाम तक मैं महानता प्राप्‍त कर लेने के फ़ि‍राक में था. अब लगता है एक दिन और इंतज़ार करना होगा! फ़ि‍लहाल सोच रहा हूं इस नामुराद महानता को प्राप्‍त करने के लिए सेटिंग कौन वाली खेली जाए! आपके दिमाग में कोई एक्‍साइटिंग आइडिया हो तो बताइएगा. जल्‍दी!

5 comments:

  1. महानता का अनुभव करके ही आपने लिखा है। बड़ा गहरा अनुभव है आपको इसका। आप एक न एक दिन महान ज़रूर बनेंगे आखिर महान बने बिना महानता पर लिखना आसान है क्या? कोई कह नहीं सकता कि वो महान बनेगा क्या गांधी जी को पता था?

    ReplyDelete
  2. पहले वाला गलत पोस्ट पर पोस्ट हो गया है कप्या ना छापे..ये आपके लिये है...
    मै अकिंचन आप जैसे महान आत्माओ के चरम महानता के इस अनुभव से सुवासित होते हुये सानिध्य मे अपने को पा अत्यन्त प्रफ़ुल्लता का अनुभव कर रहा हू....
    बस इतना सा दुख है कि जिन महान आत्माओ की महानता से मै रुबरु हुआ.वो हमारे बीच नही रही..जैसे राजीव गांधी जी,इंदिरा गांधी जी,और चंद्र्शेखर जी ..और अब आपकी महानता से रुबरु होने की कोशिश मे हू...:)

    ReplyDelete
  3. मेरे ख्याल से अगर शाम सात बजे से साढ़े आठ बजे के बीच बारी-बारी से रम और व्हिस्की के तीन-तीन पैग ले लें तो नौ बजते-बजते श्योर शॉट महानता को प्राप्त हो जाएंगे। आमीन!

    ReplyDelete
  4. एक एक्साइटिन्ग आइडिया आया तो है ।आप अपना मुह बन्द रख सकें तो तुरन्त महान हो जाएन्गे :)वैसे आपकी रवीश वाली कहानियां भी आपको एक महान बोर साबित करती है!आशा है आप बुरा नही मानेन्गे ।

    ReplyDelete
  5. इतने बडे़ महानात्मा का लेख पढ कर एक्साइटिन्ग आइडिया कैसे आएगा ? प्रभू आप की मनोकामना पूरी करे।

    ReplyDelete