Tuesday, July 17, 2007

विषयाभाव का झूठ व अज़दक द्वारा प्रस्‍तावित कतिपय उपचार..

अपने पुराने मित्र विमल लाल को हम ब्‍लॉग लिखाई के लिए कुहनियाते रहते हैं. इस इतवार से उनका ख़ून कुछ ऊपर चढ़ना शुरू भी हुआ है, मगर हमारे कुहनियइनों पर लाचारी में चेहरा लटकाये उनका हमेशा का एक बंधा-बंधाया जवाब रहा है.. कि ससुर, तुम ‘पढ़वैया’ टाइप हो, बाथरूम में पेशाब के लिए भी जाते हो तो दो हाथ दूर से भी दिख जाता है कि ‘बुद्धिजीवी’ पेशाब कर रहा है.. और सिर्फ़ वही नहीं कर रहा.. साथ-साथ अगले पोस्‍ट का मसाला भी सोच ले रहा है!.. जाने कहां-कहां से उड़-उड़ के विषय दिमाग में चले आते हैं, तड़-तड़ टिपटिपाने लगते हो.. जबकि हमको लड़-लड़ के टिपटिपाना पड़ता है, और विषय तो उड़-उड़ के रहने ही दो.. कांख-कांख के भी नहीं आते! विषयों का सोचते ही दिमाग को क़ब्ज हो जाता है.

तस्‍वीर का यह पहलू विमल लाल का पेंट किया है. तक़लीफ़ के बयान से ज्‍यादा ब्‍लॉग के झंझटों, टंटों से बचने, बचे रहने की यह विमलीय अदा है. क्‍योंकि विमल की बतायी ज्‍यादातर बातें बकवास हैं. न उड़-उड़ के मेरे दिमाग पर मौलिकता की चिरैया बीट छोड़ती जाती है, न तड़-तड़ टिपटिपाने का अपने पास कौशल है.. और जहां तक विषयों की बात है, उनकी विमल को कमी नहीं है.. किसी को नहीं है.. जितेंदर चौधरी अपनी खरीदी नई गाड़ी पे लिख सकते हैं तो आप भी खेत में बैठकर पी गई ताड़ी पे लिख सकते हैं.. हो सकता है ताड़ी का असर गाड़ी पाने के असर से ज्‍यादा ही हो!.. जो पीसी के सामने अनुपस्थि‍त विषयों के बारे में सोचते हुए लात खाये बुद्धिजीवियों-सा चेहरा लटकाये हों, उन सभी दिग्भ्रमितों को मेरी सुझाइश है कि भाई मेरे, विषयों का सचमुच ऐसा अकाल आ गया है? नहीं आया है. आंख खोलकर आजू-बाजू देखिए.. और आंखें कमज़ोर हों तो मूंद लीजिए और कल्‍पना की टोंटी खोलकर हरहरा के धार बहने दीजिए.. और फिर इतमिनान से अंजुरि-अंजुरि लोप कर ब्‍लॉग पर डालते रहिए!.. अब भी आप सोच ही रहे हैं? हद हैं, यार, सोचने तक के लेवल पर फेलियर हैं? डालिए, डालिए, ज़ोर डालिए, दिख रहा है विषय?..

वीकिपीडिया में थोड़ा खोज-खंगाल करके अंडमान-निकोबार की काल्‍पनिक यात्रा कर डालिए.. पोस्‍ट का मसाला तैयार है! या अरमान और ऊंचे हुए तो हिन्‍दी वाले चार पोस्‍टों का ज़रा महीनता से अंदाज़ लेकर एक ऐसा पोस्‍ट लिख मारिये जो आपसे न्‍यूऑर्क का आंखों देखा हाल बुलवा रहा हो.. न्‍यूऑर्क से होते हुए पेरिस व वेनिस की भी कुछ रसीली पोस्‍ट्स तैयार कर डालिए.. फिर देखिए, बिना कहीं गए कैसे लोग आपको भाव देने लगते हैं. कवियत्रियां आपके यहां कमेंट छोड़ने के लिए किस तरह सिर-फुटव्‍वल करने लगती हैं! काल्‍पनिक एडवेंचर तक से आपकी रूह फ़ना होती हो तो ठीक है, मत जाइए कहीं, वेनिस की तंग गलियों में टहलने की जगह यहीं के ओवरफ्लोइंग गटर की सड़ांध का आस्‍वादन लेने लगिए और कोई ऐसा मार्मिक पोस्‍ट लिख डालिए जो गटर की नाली व जाली पर नए सवाल खड़ी करे! आपके सिवा सबको कटघरे में खड़ा करके सवाल पूछती फिरे- क्‍या हमारे बच्‍चों का भविष्‍य गटर का पानी पी जाएगी? कल के शहर क्‍या सिर्फ़ दुकान के शटर और नाली व गटर होंगे? या फिर- शहर चलानेवालो, तुम सड़क बना रहे हो या खोअअअद रहे हो?..

या फिर सामाजिकता के गंद से हटकर अंतरंग लोक की कोमलता को सहलाना शुरू करें.. पत्‍नी, पत्‍नी की नई सहेली के बारे में कोई आयो कहां से घनश्‍याम टाइप पोस्‍ट चढ़ा दें! सोसायटी के उस स्‍वीमिंग पुल के बारे में लिखें जिसकी सहूलियत देखकर ही आपने सोसायटी में फ्लैट बुक किया था, लेकिन जिसके अंदर आपका एक बार भी उतरना अभी बाकी है! या फिर ज्ञानदत्‍त पांडे, आलोक पुराणिक पर ही पोस्‍ट लिख मारिए.. या मोहल्‍ला को ख़बरदार करता पोस्‍ट कि मुहल्‍लेवालो, बंद करो, साहित्‍य के नाम पर ये फ़रेबी बहस!

विषय इफ़रात हैं. विषयों के अभाव की बात बकवास है. फिर भी आपका असमंजस जा न रहा हो तो मैं आपको अपने ऊपर पोस्‍ट लिखने के लिए आमंत्रित करता हूं. हेडिंग डालिए- क्‍या अज़दकी कांटा इन दिनों कहीं फंसा हुआ है?.. आगे- हमारे ताज़ा सूत्रों से ताज़ा-ताज़ा पता चला है..

बुरा आइडिया नहीं है.. एक ट्राइ मारके देखिए..

7 comments:

  1. सही!!
    वैसे सूत्रों से यह भी पता चला है कि यह अज़दकी कांटा किसी एक जगह नही बल्कि कई जगह एक साथ फ़ंसा हुआ है, बाकी ब्रेक के बाद विस्तृत जानकारी मिलने पर!!

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  2. अब आप एतन मनुहार कर रहे हैं कि विचार बनाते हैं. ट्राई करने में क्या हर्ज है औउर आपका परमिशन तो हैइये है अब. :)

    -अच्छे लगे विषयाभाव पर आपके भाव.

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  3. बुद्ध ने कहा था कि शेवाल से भरे पानी में साफ छवि नहीं दिखती। शायद हमारे ब्लॉगर्स भी ऐसी ही किसी ग्रंथि के शिकार हो गए हैं। वैसे, मजाकिया पोस्ट का जवाब नहीं सूझा तो यूं ही झोंक में कुछ भी लिख मारा है। कभी कोई विषय नहीं हुआ तो पुराणिक जी का पुराण जरूर लिखूंगा। लेकिन ऐसा होने की गुंजाइश नहीं है। इसलिए किसी को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।

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  4. अरे भाई हमकॊ चैन से सांस लेने देंगे की नहीं हमेशा कामप्लेक्स दिये रहते हैं पर सीरियस्ता से एक बात कह दूं कि ये जो आपने लिखा है इसकों किसी भी नये लिखवईया को वाकई बहुत गम्भीरली लेना चाहिये ई ज़रुर गांठ बांध लेना चाहिये की "ब्लाग लिखने की कुंजी अगर कही है तो वो परमोदै जी के पास है" एतनी ज़रुरी पोस्ट एक बार मे निपटाना,कहां का इंसाफ़ है , अंट-शंट पोस्ट के आखिर में "ज़ारी"लिख कर छोड़ देते थे पर हम जैसे नये लिखवईया को जब सिखाने का मौका मिला तब आपके कलम का स्याही सूख गया, यही बात दिल पर कटारी की तरह चुभ रहा है. नये लिखवईया पर एक आध पोस्ट और हो जाता तो आपका कुछ बिगड़ जाता का.... ऐसे आपको हम ब्लाग का अढतिया थोड़े ना समझते है.अब हमारा डिमांड है एक पोस्ट और हो जाय तब जाकर लगेगा ्कि हमारा कोर्स कमप्लीट हो गया

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  5. अच्छे आइडिये दे डाले आपने.कुछ को आजमाना पड़ेगा जल्दी ही.

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  6. विषय की एक गठरी हमारे पास भी पड़ी है जी। अजदक्स एडवेंचर्स विद साहित्य और साहित्य्स एडवेंचर्स विद अजदक, मिसेज पाल इन वेटिंग, चरणजीत्स पासिबल पतन-न्यू डाइमेंशन्स, बेबीज न्यू फाऊंड लब बिहैवियर आफ्टर सीइंग सम साइट्स आन इंटरनेट,
    पर आलोक पुराणिक की ऐसी-तैसी। अनुभवों का जैसा वैविध्य और व्यापकता अजदकजी के पास है, उसका शतांश भी आलोक पुराणिक के पास नहीं है।

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  7. ये आईडिये तो अच्छे है पर कृपया साफ़ करे प्रयोग करने वाले से आप कुछ डालार फ़ालर,तो नही ना मांगने वाले,(भाइ आईडीये भी १००० डालर के लायक है ना)वैसे हमे पता है कि आप मांगने वाले नही हो पर फ़िर भी बताये..?काहे कि आजकल ये कुछ ज्यादा ही फ़ैशन चल पडा है.जिस्को देखो ५०१ रुप्याया १० डालर मांगने लगता है,बिना समझे की कोई ५० पैसे भी दे दे तो बहुत बडी बात है.

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