Friday, August 31, 2007

अच्‍छा प्‍यार और सच्‍चा दोस्‍त फिर उसके बाद?..

जो आंखें मूंदे सुखी हैं उनका मुझे नहीं पता.. लेकिन छाती में अकुलाहट लिए सुबहो-शाम सोचनेवालों के साथ एक बात है.. यह चोटखायी क़ौम अनवरत, सायास-अनायास एक खोज में जुटी रहती है.. उसकी खोज दैनन्दिन के झमेलों व रोज़ी-रोटी की फजीहतों से परे अपने खोजी कारखाने में कभी बिना जाने तो कभी पूरे जोशो-ख़रोश के साथ ईंधन फूंकती चलती है.. फ़र्नेस के अंदर लाल सुलगते कोयले जलते होते हैं.. क्‍या खोजती है?..

एक प्‍यार जो जीवन में नये अर्थ भर दे.. पोर-पोर में संजीवनी फूंक दे? एक किताब, भरोसे का एक दोस्‍त जो जीवन के अनसुलझे पहलुओं पर रोशनी डाल दे.. गहरे अंधेरों में दबे अव्यक्‍त सत्‍य की खिड़कियां खोल दे? एक गुरू? एक धारा? थोड़े सूत्र-वाक्‍य?..

अच्‍छा प्‍यार और सच्‍चा दोस्‍त पा लेना आज के ज़माने में हंसी-खेल नहीं (डाउट है कभी रहा होगा).. मरीचि‍काओं में भटकते होते हैं, लेकिन सारे सवालों का हल ढूंढ़ लाये, ऐसी चमकती किताब और सुलझा गुरू कहां हाथ आते हैं? जब आते भी हैं तो उनके हाथ आने का क्षणिक अहसास ज़रा आगे जाकर नये सवाल व नये भ्रमों का रास्‍ता नहीं खोलता?..

मेरा एक संवेदनशील मित्र है जो खोज के इस सारे कार्यक्रम को व्‍यर्थ घोषित करता रहता है. उसके अनुसार खोजी बेचैनियां और कुछ नहीं, अपने को महत्‍वपूर्ण मानने की बौद्धिक अदायें हैं.. निपट अंधेरे में आदमी की रचना होती है और कुछ वैसे ही गाढ़े अंधेरे में उसका अंत! जबकि एक दूसरा संवेदनशील मित्र है, आठ महीने से अमरीका के एक बड़े न्‍यूरोलॉजिस्‍ट हैं- अंतोनियो दमासियो, उनकी किताब ‘लुकिंग फ़ॉर स्पिनोज़ा’ घोंट रहा है.. कि अबकी मर्तबा सतह की सच्‍चाइयों से परे जीवन का वास्‍तविक अर्थ जाने बिना रहेगा नहीं! अपनी चिन्‍ताओं में सुलगता जब वह मुझसे सवाल करता है कि नहीं, तुम बताओ जीवन का अर्थ क्‍या है और सुखी होने की मेरी परिभाषा.. तो मैं लरबराया, अटकता सामाजिक स्‍वास्‍थ्‍य की कुछ पिटी-पिटाई धारणायें बड़बड़ाने लगता हूं.. मित्र चोटखायी नज़रों से मुझे तकता ताज्‍जुब करता है कि अपने को कलाकार, साहित्यिक बतलाता रहता हूं जबकि मेरे पास ऐसे सामान्‍य, एलिमेंटरी सवाल तक का कोई सफ़ाईभरा जवाब नहीं?

मैं शर्म से चेहरा गिरा उसकी सारे आरोप अपने सिर ले लेता हूं.. अब यह सच्‍चाई तो है कि जिन गूढ़ अर्थों में वह अपने प्रश्‍न की व्‍याख्‍या चाहता है, उसका समाधान मेरे पास नहीं.. हम क्‍यों हैं इस संसार में?.. निजी व समाज के स्‍वास्‍थ्‍य, भौतिक-पारिवारिक सुख की नेक़ कामनाओं के बाद जीवन की यात्रा का क्‍या मतलब बचता है मेरे लिए?.. आपके लिए?..

मेरे मित्र का सवाल मुझ निर्बुद्धि की बजाय आपकी गोद में होता, तो आप क्‍या जवाब देते? क्‍या मतलब है जीवन का? किस बात से अर्थपूर्ण व सुखी हो जाएगा आपका जीवन?..

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Thursday, August 30, 2007

रातभर बारिश..

अगस्‍त के मदमस्‍त मेघ झूमकर उतरते हैं नीचे हवायें लहराकर उड़ती हैं घास के मैदानों को घुमाती, कितना ऊपर उठाती. अपना फ्रॉक सम्‍हालती बच्‍ची के हल्‍के फाहों-से बाल उझराती हैं. एक कुत्‍ता चौंककर दौड़ता है, थोड़ी दूर जाकर दंभ में ऐंठता देह तोड़ता है. पड़ोस की मौसी भागकर तार से कपड़े हटाती है, मैं सीलनभरी महकते भागलपुरी में लिपटा उमड़ता हूं, पोर-पोर में उतरती है बरखा. खुश होता हूं ज़िंदा हूं ज़िंदगी है, नाक की नोक पर गुदगुदाती हवा है, फुहार का भीजापन है. भरभराते जल के साथ फिर भागती चलती हैं और कितनी ही तो बातें, उमड़-घुमड़कर सुन पड़ती है डायरियों के आड़े-तिरछे भूगोल में बन्‍द वही बनने-बिगड़ने की चोटखायी कहानी, पुरानी.

कितना अच्‍छा होता है रोज़ हथेली पर ज़रा-सा ज्ञान, कनपटी की थपकियों से उतरकर गाल पर बजता संगीत का जादू; थोड़ी अच्‍छी बातें, फ़ोन पर किसी दोस्‍त का हंसना, गिलास भर पानी गाल से सटाये दुनिया के दु:ख में दु:खी हो लेना, किसी ग़रीब की गरदन रेते बिना इंसानियत की समझदारी में एक और दिन जी लेना कितना अच्‍छा होता है. मगर अंधेरों में उतरती कभी एक महीन टिमटिमाहट का अंदेशा खोलती, खोह से निकलती बेचैनियों की इस रेल के सफ़र की आख़ि‍र कोई तो होती मंज़ि‍ल. कि हदबद बेकली में लिपटे, लटके चलते चले चलना ही अपना होना होगा. नहीं पहचानेंगे कहां हैं क्‍या हुआ हिसाब. अन्‍तहीन लगे रहना, पीसना जांत, सांस की थैली में हवा भरते रहना ही जीना होगा.

किस पल पड़ता है चैन, कब होता है सचमुच दिन का अन्‍त. शुरू होती है रात गायब होती है चिन्‍तायें, चुकती है सब बात. वही तो दिक़्क़त है नहीं होती कहां होती है. फटी छतरी पट-पटा-पट पीटती रहती है बूंदें, निर्गुन बजती रहती है बेतरतीब विचारों की ठठरी. कभी नंगी पसलियों से छूकर गुज़रती है ताज़ा बारूद-सी डंक, कभी काई लगी भारी काली दीवारोंवाले पुराने क़ि‍ले के बीहड़ गहरे सूनसान अंधेरों में गूंजता है सबको न सुन पड़नेवाला घड़ि‍याल. ठंडे निर्जन भय की सनसनी में बिंध जाती है देह, टप-टप बहने लगता है ख़ून. आत्‍मा अचक्‍के में टूटती निकलती है एक हूक. थकी पथरायी पपड़ि‍यों पर झीना गिरता हटता है कोई परदा. एक हंसी फीक़ी होंठों पर अचकचायी पसर आती है और आंखों में पानी निकल आता है. बजती रहती है रातभर बारिश, चैन नहीं आता.

ऊपर की तस्‍वीर: नेशनल ज्‍यॉग्राफ़ि‍क डॉट कॉम से साभार

Tuesday, August 28, 2007

ओय-होय, राखी बंधा ले, भइया!.. अच्‍छा?..

सुबह से कितनी मिठाई अंदर डाल चुके हैं? बोलिए, बोलिए! सवाल सामने आते ही अकबका गए? आं?.. अकबकानेवाली बात है ही.. क्‍योंकि मैंने नहीं डाला है.. हाथ पर तागा भी नहीं!..

मिठाई (और जाने क्‍या-क्‍या?) अंदर लेते हुए एक बार भी मेरा ख़्याल नहीं आया? कि इतनी मिठाई आप सर्कुलेशन से हटा रहे हैं, और मैं नहीं हटा पाने पर कैसा कड़वा-कसैला फ़ील कर रहा होऊंगा?.. एक बार भी? जस्‍ट वन सिंगल टाईम?.. और जब देखो दुनिया के बिगड़ते हालात, मानवता और ब्‍लॉग-बंधुत्‍व की ठुमक-ठुमककर ठुमरी ठेलते रहते हैं.. और मैं शरीफ़ आदमी की तरह झेलता रहता हूं?.. इस देश में मानवता नाम की कोई चीज़ बची है कि नहीं? ब्‍लॉगजगत में?

दुनिया में आदमी किसी चीज़ पर भरोसा करे या नहीं? मिठाई तक से उम्‍मीद छोड़ दे? बहनों का बाद में कहीं कुछ नुकसान हो तो फिर मुझे दोष मत दीजिएगा! किसी का कुछ भी नुकसान हो, मुझे मत लपेटियेगा.. बहुत लिपटा-लिपटी जी ली.. देख ली.. अब क्‍या दिखाइएगा? एक मिठाई तक तो दिखा नहीं सके!

हां, हां, मालूम हैं, कहेंगे- ‘अरे, आप तो चीन में हैं.. इतनी दूर जाकर भी मिठाई का रो रहे हैं?’.. क्‍या हैं आप, जोकर हैं क्‍या हैं? अरे, चीन जाने पर मिठाई की तलब छूट जाती है? परदेस में तो त्‍यौहार ज़्यादा उंगली करता है. मिनट-मिनट में यह अहसास उठा-उठाकर पटकता रहता है कि क्‍या आज समूचा दिन सूखे मुंह में जीभ घुमाते ऐसे ही निकल जाएगा? क्‍या हीं-हीं, ठीं-ठीं करतीं बहिनें घर में, और बाहर घेरेंगी नहीं? और मैं ‘अरे! ओहो!’ करता उचक-उचककर आशीर्वाद देने से रह जाऊंगा (रह गया ही!) ? समीर लाल से पूछिये, अनामदास से पता करिये! क्‍यों लड़ि‍या के बेटे के रैटल पर पोस्‍ट लिखा है? आपको लगता है ऐसे ही लिख दिया? इसलिए लिखा कि आज बहनों पर सोचने के नाम से रूह फ़ना हो रही थी इसलिए घबराकर बेटे का जाप करने लगे! बेटा पहले रैटल नहीं खेल रहा था? तब पहले क्‍यों नहीं रैटलटम-रैटलटाक् किये? सीधी बात है. तब वजह नहीं थी. आज है! मिठाई वाला मसला तो है ही. नहीं खाने की कड़वाहट बेटे पर की नाराज़गी में निकाल लिए. सब मेरी तरह साफ़ और सच्‍चे थोड़ी होते हैं.. स्‍पष्‍टवादिता के लिए कलेजा चाहिए.. मिठाई न खा सकने की जेनुइन कड़वाहट चाहिए.

मज़े में रहिए. रक्षाबंधन-रक्षाबंधन करते रहिए. लेकिन आज के बाद से बंधुत्‍व-टंधुत्‍व मत कीजिएगा! क्‍योंकि आप मुंह खोलेंगे और मेरे मुंह में कसैलापन फैलने लगेगा! बहनों के प्रति दायित्‍वभाव तो नहीं ही फैलेगा. अदबदाके पतनशील होने लगूंगा.. और ज़ि‍म्‍मेदार सिर्फ़ आप होंगे! हां!

Monday, August 27, 2007

दु:ख का अकेलापन

सत्‍यनारायण की कथा पर सब बुलाना चाहते हैं, सुख बड़ा सुखी रहता है. कब देखा है किसी ने सुख को सुना है कोई असुविधा की बात. हसंकर बात करते हैं लोग, मोबाइल हर वक़्त बिज़ी रहता है. भागती सवारी रोक एक शिकायत करता है- क्‍या महाराज, आजकल तो आपके दर्शन ही नहीं होते, ऐसा गजब मत कीजिए, सरकार! बच्‍ची तुनककर कहती है- मेरे साथ भी खेलो ना, अं‍कल, प्‍लीज़? मिलनेवालों की कमी नहीं रहती, मन कैसी तो अठखेलियों में डूबा गदबद भरा-भरा रहता है. मुसकराता नींद में बुदबुदाता है, सुख, ओह, कितना सुखी है तू!

जबकि दु:ख को देखते ही लोग परदा खींचने लगते हैं. बच्‍चों को मां छिपाती है, बाप खुद को छिपाता है मोबाइल बंद करके बरबराता है- साले, आये सामने तो सिर तोड़ दूंगा! ढेरों दरवाज़ों से टूटा सिर और बद्-दुआओं की गठरी लिए दु:ख भरी दुपहरी फिरता है सड़कों पर आवारा. नंगे पैर काली बियाबान रातों में कहीं भी रोने लगता है कभी भी. उसके सिर पुरखों का हाथ नहीं होता, उसके लिए नहीं गाती गीता दत्‍त दर्दभरे विरह के गीत.

मन्दिर की पुरानी, काली सीढ़ि‍यों पर अभाव में टूटकर कहता है एक दिन, ‘खुशी जीने की क्‍या, मरने का ग़म क्‍या’. प्रभु आंख मूंदे धीमे मुसकराते हैं- अच्‍छा भजन गाता है, बच्‍चा! उदासी के लम्‍बे पथरीले पुल पर जीवन दु:ख का खिंचा चला जाता है.

Sunday, August 26, 2007

हम इतने ठस क्‍यों हैं?

व्‍यक्ति के सीखने की सीमा क्‍या है, क्‍यों है? आदमी कितना और कबतक सीखता रहता है (कब तक लिखूं, या कबतक) ? क्‍या ज्ञानदत्‍तजी ने कभी मैंडारिन या मलयालम सीखने पर विचार किया? याकि अपने हिंदी सीख लेने से ही वे गदगद बने रहेंगे? कभी अपने ड्राइवर को अंग्रेज़ी सिखाने का विचार आया? या उसके सीखने की सीमा पर एक राय बना, अपने सिखा सकने के उद्यम को उन्‍होंने एक बन्‍द किताब मान लिया है? अनूप शुक्‍ला और अच्‍छा लिखने, और मुझसे लगातार सीखते रहने की दिशा में प्रयासरत हैं, या ‘बहुत आगा चल आये, गुरू, अब और आगे जाये का आइडिया गड़ही में गिरना होगा!’ सोचकर हाथ खड़े कर दिए (दिए कि दिये?) हैं?..

अभय के हर नए पोस्‍ट में मैं हिज्‍जे की ग‍लतियां निकालता रहता हूं.. बच्‍चा जिज्ञासु व ‘सीखनोन्‍मुख’ छात्र की तरह उत्‍साह से उन्‍हें सुधारता भी रहता है.. लेकिन पंक्‍चुएशन और स्‍पेस डिस्‍ट्रीब्‍यूशन पर मेरी ऐसी ही नेक़ सलाहतों का रवीश या प्रत्‍यक्षा पर अब भी वाजिब असर नहीं पड़ा है.. अविनाश के वामपंथी कमिसार वाले कोड़े-सी ज़बान पर तो नहीं ही पड़ा है! शायद ये लोग मेरे महीन व ज़हीन ज्ञान और भाषायी प्रकांड प्रवीणता के जिज्ञासु इच्‍छार्थी विद्यार्थी नहीं.. ऐसे लोगों से सीखने की कैसी भी उम्‍मीद करना व्‍यर्थ है? फिर कैसे लोगों से सीखने की कैसी उम्‍मीद करना सार्थक है? भारतीय पुरूष-बर्चस्‍ववादी मानसिकता विनम्रता, आदर व सहोदरता के पाठ सीखेगी? कविता के लिए कच्‍चा (और ज़्यादातर घटिया) माल इकट्ठा करते हिंदी ब्‍लॉगर्स क्‍या कभी सचमुच व सच्‍ची कविता लिखना सीख पाएंगे? अच्‍छा मनुष्‍य बनना? मैं? सम्‍भव होगा?

मालूम नहीं, असिखेबल जन-गण! क्‍योंकि मैंने देखा है डिक्‍शनरी खरीदना मैं सीख गया हूं, लेकिन उसका इस्‍तेमाल सीखने के सवाल पर अब भी कांखने लगता हूं. अविनाश ने क़ुर्रतुल आपा के जाने पर ‘भाग गया! दौड़ गया! देखा! लिखा!’ वाली लिखाई की अदायें सीख ली हैं, किंतु क़ुर्रतुल के लिखे को पढ़ने के नाम पर अब भी, पहले की ही तरह, उदासीन हैं.

पश्चिम में पुरानी परम्‍परा है, लोग अपनी नई रुचियों को पर्स्‍यू करने के लिए उम्र के किसी भी मोड़ पर एक नया करियर शुरू कर लेते हैं (विविध रुचियों के दबाव में इसीलिए मैं आजतक एक करियर खड़ा करने के झंझट से बचा रहा!). जबकि हमारे यहां पुरानी व नयी दोनों परम्‍पराओं में देखा गया है कि किसी एक लाइन से लग जाने के बाद लोग ताउम्र उसी लाइन को पीटते रहते हैं. मकान बदलने तक के ख़्याल से लोगों को दहशत होती है (रवीश ने दिल्‍ली में एक अच्‍छा मकान मेरे लिए खोज रखा ही है, लेकिन बंबई वाले को छोड़ने के विचार से मेरा वजन घट रहा है! शायद वजन घटाने के मोह में ही मैं राजधानी को अपनी प्रतिभा से उपकृत करने से बच रहा हूं?).

हम आख़ि‍र इतने ठस क्‍यों हैं? आप क्‍यों हैं?

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Saturday, August 25, 2007

एक पतनशील बिम्‍ब..



अरे, ओ कालजयी अजेय रवि!
बाहर निकल, सजीली सवि
(मेरे दोस्‍त की गर्लफ्रेंड
का नाम.. मेरी भी है)
देख, आया है तुझे जीतने
अनरीडेबल रेनेगेड कवि!
अंकवार भर, स्‍वागत कर!

नया-नया धंधा है मगर पैर
फैला रहा हूं प्रकाशक थोड़ा
भाव दे रहा है मैं ज़्यादा खा रहा हूं
करीने से फंदे सजा रहा हूं.

प्रकाशक की नई गाड़ी से शहर
देखने का मज़ा ही कुछ और है
वैशाली से चढ़ा हूं, बल्‍लीमारान
होता वसंत विहार जाऊंगा
एसएमएस और एमएमएस से
दोस्‍त की गर्लफ्रेंड पर ज़लवे बिखेरूंगा
बुढ़ऊ आलोचक को सेटियाऊंगा
लम्‍बी कविता के शिल्‍प में छोटी
ठेलूंगा और छोटी का बैलून फुलाऊंगा
ओह, आत्‍मरति का विज्ञापन सामाजिक
चिन्‍ताओं के पोस्‍टर-सी चिपकाऊंगा
सारे रास्‍ते गा-गा-बां-बां गाऊंगा?

लिखा होगा विष्‍णु खरे ने ‘शिविर में शिशु’
केदार ने ‘त्रिनिदाद’, मैं अंवागार्द लिखूंगा
आप हंसियेगा तो आपकी दो कौड़ी की हंसी
माफ़ कर दूंगा, हलके से मुस्‍करा लूंगा
आपकी साहित्यिक अदा के
फीतों से जूते बांध लूंगा
आप अचकचाकर ऐं-ऐं करेंगे मैं
बिना हें-हें करता आगे बढ़ जाऊंगा!

Friday, August 24, 2007

परेम का एहिये परसाद दे रहे हैं?..

रामजीत राय व्‍याहता बेबी राय का अपने स्‍वामी को पत्र..


सैंया जी, सामी जी, हमरे मन का नैया को बूड़ा-बूड़ाके डुबाये वाला कामी जी.. ई सब काहे ला दीवार-सियार गिरे का बात कै रहे हैं! मन का दीवार इंहां पहिलही टूटल है, अऊर घरो का देवाल को, देखिये, चैन नै पड़ रहा है? आग लगे ई बूंदी-बरखा में..

केतना तो जतन-जेहमत से ताकत लगाके नीन्‍न लगाते हैं, कि असबेस्‍टस का खपड़ा पे पड़-पड़ का गोली छोटाने लगता है, अऊर फुर्र देना आंखी का सब नीन्‍न गायब! आपका अपना किरिया खाके सच्‍ची बोल रहे हैं, परमेस्‍सर जी!.. ओकरा बाद सगरे रात ई करबट से ऊ करबट.. दिन का बखत होता त फुलमनिया को बुलाके लुडो-टुडो खेलते, रात का टैम में ओकरा संगे कौची खेलेंगे.. त केकरा संगे खेलेंगे?.. अब ईहे सब पहेली पूछके हमरा दरद बढ़ाइएगा? बहुत मजा मिलता है नै आपको? हुंआ दीवार टूटा है, हिंयवा दिल.. ओकर मरम्‍मत नै कीजिए.. बस अपना मरदाना मजा लूटके ताली पीटिये, हं!

पप्‍पाजी त बहुतै नराज होंगे, नै? हम्‍मो को गारी दे रहे थे? सच्‍ची-फैट बोलिए न?..

हम का करें, आपै रस्‍ता काहे नै देखाते? हमरा हिंया कवनो मन थोड़े लगता है जी! सगरे-सगरे रात का बरसाती हेहर-ओहर करबट काटके आपका यादी में नेकाल देते हैं. भुरुक-भुरुक रोते हैं अऊर हिम्‍मत बांधके ऊ वाला गाना गोनगोनाते हैं- हमने तुमसे पियार किया है जेतना, कवन करेगा ओतना.. बुझइबो नै करता है कि रो रहे हैं कि गा रहे हैं!

मन्‍नु मौसी का ताना-तरवाल का डर नै होता त हम कब्‍बे ले बस का टिकिस निकलवा के निकल गए होते! हुंआ हमरा जोदाई में घरे का दीवाल भसक जाय रहा है , मगर एगो आप हैं कि टस से मस नै हो रहे हैं!

मन्‍नु मौसी कवनो ललिता परवाल हैं (ललिता परवाल तो हइये हैं!) कि आप डेराके हमको लेबे बास्‍ते नै आय रहे हैं? बाल सफेद हो जायेगा और बेलाउज झुलनी, तब्‍ब हमको लेवे ला आइएगा? केतना निरमोही, निरदयी भतार हैं जी आप? एही दुख देबे बास्‍ते हमको जीवन-संगी बनाये थे? जीवन-संगी कौची का, हमको तो जीवन जोगिनी हो गये अइसन बुझाता है.. कांता अऊर तिरप्तिया दोनों को दो-दो गो छौंड़ा डेरिवली हो गया, अऊर हम अब्‍ब ले नॉन-पेरगेंटे हैं! बरसाती का राति में आंखी से लोर बहल-बहल बेलाउज भेजा देता है, लेकिन आपका लोहा माफिक करेजा में हमरा बरसाती का कवनो पहुंचै नै है! परेम का एहिये परसाद दे रहे हैं? हमको लेबे आय रहे हैं कि नै आय रहे हैं?

आपका जलम-जलम का चरनों का दासी,
बेबी कुमारी राय

Thursday, August 23, 2007

अजनबियों के बीच सालगिरह..

“एक अध्‍ययन बताता है कि 20 से 40 वर्ष की आयु के दरमियान सालाना 1.2 के हिसाब से लोग मित्र गंवाते हैं. काम की भागदौड़, पारिवारिक ढांचे का कमज़ोर पड़ना, गाड़ि‍यों व तकनालॉजी पर निर्भरता आदि वजहें हैं जिसने हमें और ज़्यादा अकेला किया है. संचार तकनालॉ‍जी के रोज़ नई खोजों के बावज़ूद असलियत यह है कि ऐसे लोगों की संख्‍या बहुत ही कम होती है जिनसे हमारी क़ायदे की व अर्थपूर्ण बातचीत होती हो. हम घंटों मोबाइल फ़ोन और कंप्‍यूटर से संपर्क में बने होने की ग़लतफ़हमी पाले रहते हैं जबकि हमारा अपने निकट तक से नाता टूटा होता है. हम लगातार ‘बुलबुले-सी ज़ि‍न्‍दगी’ की ओर बढ़ रहे हैं जहां परिचितों, मित्रों से कटे हम अपने एकांतिक खोह में मगन रहते हैं.”

ये विचार हैं बहुचर्चित ‘एन इंटिमेट हिस्‍टरी ऑफ़ ह्यूमैनिटी’ के लेखक, मशहूर इतिहासकार, दार्शनिक थियोडोर ज़ेल्डिन के जिन्‍होंने अपनी 74वीं वर्षगांठ पर एक दिलचस्‍प प्रयोग किया. लंदन में कल मनाये उनके जन्‍मदिन पर दुनिया के हर हिस्‍से से हर कोई आमंत्रित था. बस एक छोटी-सी शर्त थी कि बर्थडे पार्टी में पहुंचने वाले मेहमान को किसी ऐसे अजनबी से ‘प्रॉपर कन्‍वरसेशन’ करना होता जिससे पहले कभी उसकी मुलाक़ात न हुई हो! इस ख़ास पार्टी में मेन्‍यू में खाना नहीं, बातचीत के विषय थे. समाज में बातचीत के महत्‍व पर ज़ेल्डिन ने 'कन्‍वरसेशन' नामकी एक किताब भी लिख रखी है.

थियोडोर ज़ेल्डिन की इस ख़ास पार्टी की पूरी ख़बर के लिए यहां देखें.

Tuesday, August 21, 2007

हिंदी प्रदेशों में साहित्‍य की अतिशयता के फ़ायदे.. और काफ़ी सारा नुकसान

हिंदी ब्‍लॉगजगत में साहित्य के अतिशय बोझ पर संजय तिवारी की कल की चिंता पर हम ऑलरेडी चिंतित हो चुके हैं. मगर लगा अभी काम की कुछ और बातें जोड़ी जा सकती हैं, तो लौटकर चले आए. जिन्‍हें बुरा लगे वो मुंह बिचका लें.. ब्‍लॉगजगत में साहित्‍य का बोझ तो है, लेकिन उसे बोझ से ज़्यादा नागालैंड में भी क्रिकेट खेला जाता है जैसे रहस्‍य व रोमांचकारी तथ्‍य के बतौर देखा जाना चाहिए. क्‍योंकि आप और हम भले कयास लगा लें कि कोहिमा इसी देश में है, और हो न हो वहां के बच्‍चों में भी क्रिकेट का वही पागलपन होगा जो हमारी तरफ़ के बच्‍चों में देखा गया है, बीसीसीआई इसे मानने से मुकर जाएगी कि उसके गणित व चिन्हित बाज़ार से बाहर भी खेल-जीवन है. शायद जीवन हो, किंतु बीसीसीआई जो खेल खेलती है, वह न मिल पाये. हिंदी साहित्यिक संसार भी कुछ वैसा ही बहुआयामी है. एक खेल वह है जो कुछ प्रकाशकों की चतुर समझदारी से सरकारी खरीद व पुस्‍तकालयों, विश्‍वविद्यालयों में खेला जाता है, कुछ पुरस्‍कारों-सम्‍मानों में खेला जाता है, दूसरा वह है जो उत्‍साही कार्यकर्त्‍ता ब्‍लॉगजगत में खेल रहे हैं. दोनों की हम एक ही चीज़ के बतौर पहचान करें, यह स्‍वास्‍थ्‍यकर लक्षण नहीं. ज़रूरी तो एकदम ही नहीं.. श्रीलाल शुक्‍ल ने काफ़ी पहले (मार्च, 1993) लिखी एक टिप्‍पणी में विश्‍वविद्यालयी साहित्यिक योगदान को पहचानने की एक जहमत उठाई थी और मुंह की खाकर शर्मिन्‍दा हुए थे.. आईए, एक बार उनके लिखे से फिर गुज़रकर हम भी हों:
साहित्‍य-चर्चा

पिछले सप्‍ताह एक यात्रा के दौरान ट्रेन पर एक शिक्षित युवक से मुलाक़ात हुई. उन्‍होंने पढ़ने के लिए मेरी किताब उठा ली. किताब का नाम था: ‘अ अस्‍तु का’, लेखिका: ज्‍योत्‍सना मिलन. वे पन्‍ने पलटते रहे, अचानक बोले, ‘आप भी कुछ लेखक हैं क्‍या?’ मैंने पूछा, ‘क्‍यों?’ बोले, ‘लेखिका ने आपका नाम अपने हाथ से लिखकर आपको यह किताब भेंट की है.’ लेखक होने से इनकार करते हुए मैंने कहा, ‘वे मुझे जानती हैं, इसलिए किताब मुझे मुफ़्त मिल गई है.’ उन्‍होंने दो-चार पन्‍ने पढ़े, कहा, ‘बड़े विस्‍तार से लिखा है.’ मैंने पूछा, ‘ठस है?’ जवाब मिला, ‘ज़्यादा समझ में नहीं आयी.’

बातचीत में पता लगा कि पढ़ने के शौकीन हैं. ‘अ अस्‍तु का’ निर्मल वर्मा और कृष्‍ण बलदेव वैद को समर्पित है. ये दोनों नाम उनके लिए अजूबे थे. उन्‍होंने जिज्ञासा की, ‘आप कवि अंजनीकुमार को जानते हैं?’ मैंने खेद के साथ ‘नहीं’ कहा और मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और सर्वेश्‍वर के बारे में पूछना चाहा, पर हिम्‍मत नहीं पड़ी. उनकी जगह मैंने अश्‍क का ज़ि‍क्र किया जिसका सही-सही मतलब उन्‍होंने आंसू बताया.

मुझे ज़रा भी झटका नहीं लगा. जो मन्दिर के जितना ही पास रहकर जितनी ही भक्ति दिखाता है, वह प्राय: उतना ही नास्तिक होता है. हिन्‍दी क्षेत्र के उत्‍तर प्रदेश में हिन्‍दी में बीए, एमए पास अधिकांश पाठकों की यही हालत है. अनेक परीक्षाओं में परीक्षक की हैसियत से मैंने न जाने कितने निबन्‍ध पढ़े हैं. उनके निबन्‍ध का एक बड़ा लोकप्रिय विषय है, ‘मेरा सर्वप्रिय लेखक’. उसमें मुझे प्राय: प्रेमचंद का एक रटा-रटाया निबन्‍ध पढ़ने को मिला है जिसमें लगभग हर बार यह वाक्‍य मिलता है, ‘प्रेमचन्‍द की भाषा अत्‍यन्‍त प्रांजल है.’ एक बार प्रतिष्ठित कवि और आलोचक तथा इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर श्री विजयदेव नारायण साही ने इस विषय में थोड़ा बदलाव करके निबन्‍ध के प्रश्‍न में ‘मेरा सर्वप्रिय जीवित लेखक’ डाल दिया. वहां भी कुछ उम्‍मीदवारों ने तुलसीदास पर और अधिकांश ने प्रेमचंद पर निबन्‍ध लिखे. जीवित लेखकों पर दो-चार ही उत्‍तर आये. उनमें एक निबन्‍ध श्रीलाल शुक्‍ल पर था. पर वे श्रीलाल शुक्‍ल पूर्णिया के निवासी थे और ‘मैला आंचल’ उनकी सर्वश्रेष्‍ठ कृति थी.

साभार: आओ बैठ लें कुछ देर, राजकमल प्रकाशन, 1995.

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फ़ुर‍सतिया कहां से हो लें?..

हम अभी नौ महीनों में हांफ-कांप जा रहे हैं, अनूप ने छत्‍तीस निकाल लिए. ऐसे में इतराना, दूसरों पर उपदेश ठेलना स्‍वाभाविक है. दूसरों के संग आज प्रियंकर पर भी ठेला है. कि कलम और इंटरनेट कनेक्‍शन की समूची स्‍याही सिर्फ़ कविताओं पर क्‍यों बहाते रहते हैं. उनके गद्य-संचयन के नमूनों के लिए दूसरों के लिखे पर उनकी टिप्‍पणियों को बीनने जाना पड़ता है. गद्यबाला से कलम बचाते रहने की इस प्रियंकरीय संकोच पर अनूप ने एक अच्‍छी पंक्ति लिखी है: ‘यह कुछ ऐसी ही बात है जैसे कोई मारवाड़ी अपनी दुकान में मौजूद शानदार कलम का इस्तेमाल अपनी पीठ खुजाने के लिये करे.’ अच्‍छा है न? चलिए, इससे पता चलता है कि हम ही दुनिया देख-देखके सिरज नहीं रहे, अनूप भी हमसे कुछ सीख रहे हैं! हिंदी में कविताओं की बहुतायत पर पंडिजी की मीठी उदासी क़ाबिले-ग़ौर है: "ब्लागजगत में अभी भी कवियों की बहुतायत है. तमाम लोग अच्छी और बहुत अच्छी कवितायें लिखते हैं (यह पंक्ति विशेष मेरी कविताएं पढंकर सन्‍न रह जाने के असर में लिखी गई है). लेकिन मेरी कविता की समझ उत्ती अच्छी नहीं है (यह उन लोगों पर टिप्‍पणी है जो पता नहीं कविता के नाम पर जाने क्‍या-कैसी तुकबंदियां कर-करके आपका, ख़ास तौर पर मेरा समय खराब कर रहे हैं). यह भी लगता है कि जीवन जितना जटिल, बहुस्तरीय होता जा रहा है कवितायें उसके हिसाब से इकहरी और कम प्रभावी सी हैं (अगेन, अज़दक एक्‍सक्‍लुडेड). मुझे यह लगता है कि अपने ब्लाग जगत में लिखी जा रही कवितायें , कवितायें कम कविता के लिये कच्चा मसाला ज्यादा हैं (राईटली सेड.. ब्रावो, पंडिजी!)."

भाषा पर साहित्यिक बोझ की कुछ ऐसी मीठी तो नहीं, ज़रा कड़वी चिन्‍ताएं कल के लिखे एक पोस्‍ट में बाबू संजय तिवारीजी ने भी की हैं. ग़ौर फ़रमाईये: "इंटरनेट पर हिन्दी में जानकारी चाहिए रोजी रोटी की. विज्ञान की. तकनीकी की. इतिहास की. भूगोल की. पर्यावरण की. पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान की. लोकतंत्र की. गांव-गणराज्य की. और हमें साहित्य सृजन से फुर्सत नहीं हैं." सिरजने की ही फ़ुरसत कहां है, महाराज? अभी एक उपन्‍यास तक तो लिखा गया नहीं, और आप पहिलही लंगी मार रहे हैं! हिंदी का, और विश्‍व साहित्‍य का जो नुकसान होगा, उसकी आप जवाबदेही ले रहे हैं? फिर किसने कहा साहित्‍य सृजन रोज़ी-रोटी, विज्ञान, तकनीक, इतिहास, भूगोल से कोई अलग ज़ुदा चीज़ है? जिन्‍हें लगता है, है, वे पहले अपने साहित्‍य की समझ ही दुरुस्‍त कर लें.

दिक़्क़त यह नहीं है कि साहित्‍य या साहित्‍येतर क्‍या लिखें.. महाराज, समस्‍या तो यहां यह है कि कैसे लिखें, कब लिखें, फ़ुर‍सतिया कहां से हो लें?

क़ुर्रतुल आपा गईं!..

क़ुर्रतुल-ऐन हैदर गईं. बयासी वर्ष की ज़ि‍न्‍दगी कम नहीं होती, मगर ऐसी ज़्यादह भी नहीं होती. अपन इस गफलत में पड़े रहे कि कभी टहलते हुए नोयेडा पहुंचेंगे और आपा की पहुंची हुई ऊंची, उलझी शख्सियत की एक झलक लेकर इस चिरकुट जीवन को धन्‍य करेंगे, आपा ऐसी आसानी से निकलनेवाली पार्टी थोड़ी हैं, मगर देखिए, हम यहां हें-हें, ठी-ठी करते रहे और वह चुप्‍पे-चुप्‍पे निकल गईं!..

क़ुर्रतुल-ऐन हैदर उर्दू की थीं. मगर सबसे पहले इस मुल्‍क़ की थीं. हिन्‍दुस्‍तान में रहकर व उपन्‍यासों में दिलचस्‍पी रखनेवाले- किसी ने अगर ‘आग का दरिया’ नहीं पढ़ा, तो कोई बहुत ही अज़ीज़, तरंगोंवाली, बहुआयामी कथरस से वंचित बना रहा!

कथा-साहित्‍य रचने से अलग आपा ने अंग्रेज़ी में पत्रकारिता की, काफ़ी घूमना-फिरना किया, और आज भी- जबकि एक हिन्‍दुस्‍तानी औरत के लिए इस तरह का जीवन बेहद मुश्किल है- अपने वक़्त में अविवाहित, अकेली रहीं.

साहित्‍य अकादमी, सोवियत लैण्‍ड नेहरु सम्‍मान, ग़ालिब सम्‍मान, ज्ञानपीठ व पद्मश्री से सम्‍मानित मालूम नहीं क़ुर्रतुल अपने आख़ि‍री वक़्त में समय व समाज से कितना खुश थीं, अलबत्‍ता यह वे हमेशा जानती रही होंगी कि लगभग बारह उपन्‍यास, उपन्‍यासिकाएं रचकर इस देश के रसिक पढ़वैयों को उन्‍होंने कितना धन्‍य किया!

(ऊपर की तस्‍वीर आब्रो, फ्लि‍कर फ़ोटो से साभार)

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Saturday, August 18, 2007

डारलिन, आई लभ यू इन गुट टैम एंड बैट..

रामजीत राय का नैहर गई पत्‍नी बेबी को पत्र..

ऊ वाला ग़चल सुनी थी कि नहीं- चांद के देवार न तोरी, प्‍यार भरा दिल तोर दिया? अबहीं ले लाइफ में सच्‍चल-सच्‍चले चल रहा था, मगर ऊहो हाथ झारके बेगाना ठाड़ा हो गया है.. पेयार भरा दिल त पहिलही से टूटल था, ऊको तोर के तू अपना मम्‍मी का हिंया जाके बइठे गई हो, लेकिन हिंया, घर का पेछाड़ा वाला देवार, चांदी का नहीं मिलावटी सिमेंटे का था, तब्‍बो पक्‍का तो थइय्ये था न जी, चार दिन का बरसाती में जाने कल रात कब्‍ब भर्र-भर्र होके बइठ गया! सकाली पापाजी अंजुरि में डाबर मंजन डालके अंगना का ओर गये त उनका देमागे फेल हो गया.. सुबहे-सुबह पांड़े, दुबे, बिसेसर चाचा, पदमा मौसी सबको मां-बहिन गरियाने लगे.. एतना गंदा-गंदा गारी बोल रहे थे कि हम तीन दिन पुरनका नूजपेपर का पीछा मुंह लुका लिये.. देवार का दूसरका तरफ एगो गइया चुप्‍पे-चुप्‍पे घास चर रही थी.. हाई टेन्‍चरेचर सुनके ऊहो मुंह उठाके देखी कि कौन बात का हल्‍ला है त पापाजी एगो चइली खींचके गायो मइया को मारे! हम तड़ देना माथा छूके मने-मन माफियो मांग लिये लेकिन तबहंही मम्‍मीजी जाने कौन जनम का हमसे बैर नेकाले लगीं. मुंह पे अंचरा रक्‍खे, हमरा डरेक्‍सन में देखके बुलका चुआके बोले लगीं- जबले हम अप्‍पन लइका का बियाह किये हैं, हमरा जिनगी में संकट का पहारे टूट गइल है..

पापाजी का मूट तो फर्र-फर्र जरे रहा था, जाने कौन बात का सुलकाहट में आके हमको एगो कंटाप मार दिये! फिर बरबराने लगे कि साला, मूतने का लिये दस दफा देवारी पे जाते हो, देवार टूट रहा था, तुमको धियान नै गया? सुबही-सुबह गिरल देवार देखके, फिर ऊपरी से कंटाप खायके हम्‍मो अकबका गये, त मुंह से निकले गया- अरे, कोची ला मार रहे हैं? देवार पे देखे हैं कभी हमको ठाड़ा हुए? नीम का पेर का तरफ जाते हैं, देवार वाला साटकट त आपे यूज करते हैं!..

मुंह से निकले का बाद अंजाद हुआ कि पापाजी का आगे एतना नहीं बोले के चाहिये था.. मगर अब त बोल दिये थे! त ऊ बूढ़ ससुर एगो टूटही छाता से हमको ऊ मारीस है, ऊ मारीस है, कि का बोलें, सलम! अबहीं ले ऊपरी से नीचे ले अंग-अंग पिरा रहा है! अऊर ऊ मुरचा खाया टूटही छाता ससुर ई नै कि हमरा मरदाना देह का चोट खाके भंग हो जाय.. हम्‍में भंग हुए हैं, छतवा का डंडी अब्‍बले सलामत है!

सुबहे-सुबह मूट खराब हो गया. रात में त खराबे था. मम्‍मीजी पे बहुते मन लहक रहा था कि अपना डायलाक कवनो दूसरका डैरक्‍सन में देखके नहीं बोल सकती थीं? ऊहो पगलाय रही हैं, बात-बात में आजकल पहार, बांध अऊर जाने कौची-कौची टूटे का बात बोलती रहती है!

छतरी घोमा-घोमाके जब पप्‍पाजी का हाथ बेथा गया त चिंचिया के हमको बहरी चइली कलेक्‍सन का बास्‍ते भेजे (अरे, ऊहे जेकरा से खींचके गइया मइया का डैरक्‍सन में मारे थे).. सगरे सुबह का डेरामा से येहिये फयदा हुआ कि गाय माता बहरी गोबर का चार गो चोथा छोर गई थीं.. मम्‍मीजी का पूजारुम का अब आज ओही से लिपाई होगा.. मगर ई टूटही देवार का मरम्‍मत कंहवा से होगा? करीगर का खोज में वही बास्‍ते हम मर्किट तरफ आये हैं, तूको चारगो लाइन लिखके मन का दुख कमाय रहे हैं (सब ओर तबाहिये-तबाही है, शिवाला का सीढ़ी पर पानी फैला हुआ है. मोती बाबू का चक्‍की में पानी घूस गया है. करीगर ससुर आज खूबे बिची रहेगा, एगो टूटल देवार का मरम्‍मत बास्‍ते ऊ काहे ला आयेगा? केतना बरसाती हो रहा है, जी, ए साल? तोहरो तरफ हो रहा है?).

जल्‍दी ले चिट्ठी पठाओ, ई टूटल मूड का बेहाली को अपना परेम का लाइट से उजियार कै दो!

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

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Monday, August 13, 2007

प्‍यार में नदी पार करना..

सोनिया, बड़ी इच्‍छा होती है बस स्‍टॉप पर तुम्‍हारे साथ खड़े होकर लोगों को अपनी तरफ़ देखता देखें. तुम ऐसे ही हंसती रहो और लोगों की नज़रों से पार तुम्‍हारी नज़र से दिल्‍ली देखें. या प्‍लीज़, ज़रा चलो न फ़ुरसत निकालकर, देखें कैसे पहुंचती हो गांव, देखें गांव में कैसे चलते हैं तुम्‍हारे पांव, सब तुम्‍हें देखें और मैं देख लूं कैसे देखती हो गांव. सोनिया, बड़ी इच्‍छा होती है कि पास में एक सेकेंड हैंड लम्‍ब्रेटा हो चेतक और तुम बरसात के थमने के बाद दिल्‍ली की सड़कों पर तैरती होओ. तुम्‍हारे कंधे की नम गरमी पर हाथ टिकाये, सिहराये, ओह, मैं उड़ता होऊं, तुम हंसती बताओ, दिखाओ दिल्‍ली वैसी जैसे पहले कभी किसी ने सपने में भी न देखी हो, जिस दिल्‍ली के क़ि‍स्‍से सुनकर बादशाह के भी सीढ़ि‍यों पर पैर लड़खड़ा जायें.

सोनिया, तुम आती हो तो कितना अच्‍छा लगता है, कैसी तरल मानवीयता में नहाकर तुम्‍हारे साथ खुद से भी होती है रोज़ नयी मुलाक़ात. जब नहीं होतीं तब भी धीमे-धीमे चलकर हमारी ही तरफ़ तो आती रहती हो सपनों या ख़्यालों की किसी उजली पगडंडी पर, हंसती-चहकती, हर बार हमारी इंसानियत का पैमाना ज़रा ऊपर करती हुई.

हम जहां से आए हैं, सोनिया, कहां आदमी को मयस्‍सर होता है इंसा होना. बहुत संभल-संभलकर क़दम रखना पड़ता है, सोनिया. मौत का कुआं है समझ लो, राजनीति व समाजशास्‍त्र का कैसा तो उलझा तानाबाना है बेहोशी में हाथ-पैर फटकारते रहते हैं, होश नहीं रहता साबूत बचेंगे या नहीं. तुमने हमारी ज़ि‍न्‍दगी बचा ली है, सोनिया. मगर तुमने बचा लिया है तो हम फिर नये सिरे से डूब रहे हैं. लेकिन बहुत अच्‍छा लग रहा है, सोनिया. इस सपने को तोड़ना मत, सोनिया, और तोड़ना तो एक मीठा, ज़हरीला घाव दिये जाना कि हम जान जायें प्‍यार में नदी पार करना कितना सांघातिक होता है.

रवीश बाबू की दिल्‍ली की लड़कियों के असर में

प्‍लास्टिक के पीछे.. किम्‍बा संग्रहण सुख

बाबूजी की एक बुरी आदत है.. फावड़े का हत्‍था, हाथ भर की रस्‍सी, टीन का कबाड़ कुछ भी फेंकते नहीं.. सीमेंट से खराब तगारी, पुराने सोफे का नारियल और स्प्रिंग सब वर्षों से ऐसे सहेजकर रखे हैं मानो वही घर की पुरातनता के सबसे अन्‍तरंग जीवंत अलबम हों! इस अल्‍लम-बल्‍लम की रक्षा व विरोध में बोली किसी व्‍यंग्‍योक्ति के जवाब में बाबूजी का बड़ा सीधा-सा उत्‍तर रहा है- लड़ाई और तंगी देखे हो? हम देखे हैं! ढूंढ़ते रहो, कुच्‍छो नहीं मिलता, फिर? घर में रक्‍खल हुआ है तो काट रहा है? कल को कौनो ज़रूरत निकल आया तो कवनो से मांगे जाना न ना पड़ेगा?.. पता नहीं बाबूजी किस अमूर्त कल की किस अमूर्त ज़रूरत की बात करते.. क्‍योंकि इतने वर्षों में जितनी मर्तबा भी उनकी दुनिया में लौटा हूं, यही देखा है कि उनका इकट्ठा कंजास उनकी बुढ़ाती देह की बनिस्‍बत जंग खा-खाकर किसी काम की कभी रही भी होगी तो अब सिर्फ़ बच्‍चों के खेल के रास्‍ते में आकर उनके चोट लगने, और घर की औरतों के बाबूजी पर खिन्‍नता ज़ाहिर करने की ही वजह बनती रहती है.

हम भाई लोग जब छोटे थे, घर और बाहर की दुनिया के अलहदाबोध के ताज़ा असर में बाबूजी के इस कबाड़ी आदत का प्रतिकार करते.. बीच-बीच में सुबह के नाश्‍ते के बाद, जैसे अचानक कोई पुराना घाव याद आया हो, बाबूजी के कमरे के बाहर भाईयों के समवेत स्‍वर में युक्ति की जिरह की कुछ नाटकीय दृश्‍यावलियां दोहराई जातीं.. मगर नाटक का अन्‍त हमेशा बाबूजी की जीत में ही होता.

इस अनोखे आदत की संरक्षा में मेरे बाबूजी अकेले हों, ऐसी बात नहीं है.. बाबूजी का इसी तरह का या इससे थोड़ा अलहदा रूप हमें ढेरों घरों में मिल जाएंगे.. एक लघुरूप तो मुझी में बचा हुआ है.. मालूम नहीं संकोच है असमंजस है या विशुद्ध संग्रहण का संस्‍कार कि पुराने सैकड़ों ऑडियो टेप (सीडी प्‍लेयर को यूज़ में लाने के बाद जिन्‍हें वर्षों से सुना नहीं, और आगे भी कभी सुनूंगा, ऐसा लगता नहीं) स्‍थानाभाव के बावज़ूद घर में रखे हुए हूं.. निर्ममता से बहरिया के फेंकने में सकुचाता हूं! वही हाल कुछ मित्रों के घरों में कपड़ों का देखता हूं.. पंद्रह-पंद्रह, बीस-बीस वर्षों की निधि है.. शायद इस समूचे दरमियान पांच मर्तबा पहनी गई होगी, लेकिन फेंकी नहीं जाएगी, क्‍यों? क्‍या मालूम किसी दिन ज़रूरत निकल आये तो?

ग़रीबी या अभाव की ये कैसी प्राचीन, बरगदी ग्रंथियां हैं जो हमें अतीत के अगड़म-बगड़म पे बिठाये रखती हैं?.. उन्‍हें छोड़ने के ख़्याल से कलेजा थरथराने लगता है.. लगता है ऐसा करेंगे तो ग़लत कर देंगे, कुछ ग़लत हो जाएगा..

अन्‍य शहरों का मुझे ध्‍यान नहीं आ रहा मगर मुंबई में प्‍लास्टिक की थैलियों पर क़ानूनन मनाही है. बरसात में जगह-जगह पानी के जमाव में नालियों में अवरोध बनी जमी हुई इन प्‍लास्टिक थैलियों की कारस्‍तानी से हमसब परिचित हैं. मगर क़ानून के भय या पर्यावरण के संकट के बतौर चिन्हित होकर ऐसा नहीं हो गया है कि लोगों के मन व जीवन से प्‍लास्टिक निष्‍कासित हो गई है. लोगों के घरों में- रसोई, दराज़, यहां-वहां ज़रा नज़र घुमाइए, आपको प्‍लास्टिक दिख जाएगी, मय इज़्ज़त दिखेगी. लगेगा प्‍लास्टिक है ही इसलिए कि लम्‍बे समय तक उसका संरक्षण होता रहे. काल्विन क्‍लाइन से लेकर लेवाइस, मार्लबरो की कोई एक बड़ी थैली होगी जिसमें क़रीने से तह करके रखी छोटी थैलियां होंगी.. घर की औरत सुघड़ हुई तो ज़्यादा संभावना है उन छोटी थैलियों के अंदर उससे भी छोटों की एक और परत होगी! क्‍यों इकट्ठा कर रहे हैं हम प्‍लास्टिक?

क्‍या मालूम यहां मुंबई ही नहीं, इस्‍लामाबाद, बेरूत, बग़दाद सब कहीं घरों में प्‍लास्टिक सहेज-सहेजकर रखा जा रहा हो कि पता नहीं कल कौन-सी ज़रूरत आन पड़े.. या ज़रूरत से अलग, इन थैलियों पर बने अमरीकी कंपनियों के लोगो, रुपाकारों का एक अव्‍यक्‍त आकर्षण है जो लोगों को उनसे जोड़े रखता है.. मालूम नहीं.. आपके दिमाग़ में कोई जवाब उठे तो बताइएगा..

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Saturday, August 11, 2007

एक कविता विवादरहित पत्‍नी के समर्पण में..



उपन्‍यास में पहले एक कविता रहती थी

अनगिन से निकलकर एक तारा था.
एक तारा अनगिन से बाहर कैसे निकला था?
अनगिन से अलग होकर
अकेला एक
पहला था कुछ देर.
हवा का झोंका जो आया था
वह भी था अनगिन हवा के झोंकों का
पहला झोंका कुछ देर.
अनगिन से निकलकर एक लहर भी
पहली, बस कुछ पल.
अनगिन का अकेला
अनगिन अकेले अनगिन.
अनगिन से अकेली एक-
संगिनी जीवन भर.

- विनोदकुमार शुक्‍ल

दीवार में एक खिड़की रहती थी, विनोदकुमार शुक्‍ल, वाणी प्रकाशन, 1997 से साभार.

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विवाद के केंद्र में एक बार फिर पत्‍नी की वापसी..

मन्‍नू-राजेंद्र विवाद की धूल अभी थमी नहीं थी कि पत्‍नी एक बार फिर चर्चा में चली आयी है. हिंदी में यह एक स्‍वस्‍थ परम्‍परा है. चीज़ें, दिखता है जैसे जा रही हैं-जा रही हैं, फिर वे एकदम-से लौट भी आती हैं. जैसे नवगीत, गद्यगीत (लौटती न दिख रही हो तो कृपया मेरे मुक्‍त गद्य के गल्‍प देखें. ध्‍यान से देखें) पूरी तरह से कहां गई? प्रगतिशील, जनवादी साहित्यिकता अभी खुद को पूरी तरह से जीकर गई भी नहीं थी कि देख रहे हैं सुप्‍त सामंती आस्‍वादों की पतनशीलता खाद-पानी पाकर फिर से प्रस्‍फुटित हो चली है (यक़ीन न हो तो मेरा पतनशील समग्र देखें). भाई लोग हो-हो करके हंस देते हैं, जबकि ओ-हो करके रोनेवाली बात है! क्‍या समाज में, वह भी गाय-पट्टी जैसे पिछड़े हिंदी समाज में, पतनशीलता को प्रश्रय देना उचित है? क्‍या नेतृत्‍वकारी साहित्‍य के पैरोकारों के अनेतृत्‍कारी स्‍वर में स्‍वर मिलाकर इसकी भारी भर्त्‍सना की ज़रूरत नहीं? क्‍या पतनशील समग्र को उठाकर पटक देने और ढंग से थूर देने का वाजिब समय नहीं आ गया है? ओ-हो हिंदी साहित्‍य कहां जा रहा है? (क्‍या मैं साहित्‍य-सागर सम्‍मान व पतनशील बुकर की ओर जा रहा हूं? क्‍या उधर की तरफ आप ठीक-ठीक मुझे ठेल रहे हैं?).

हिंदी में यह एक अन्‍य समस्‍या है. माने स्‍वस्‍थ के साथ एक अस्‍वस्‍थ परम्‍परा भी है, कि बात पत्‍नी से शुरू होती है और आगे समाज व जीवन की निस्‍सारता की ओर मुड़ जाती है. बात पत्‍नी की हो रही है, तो केंद्र में पत्‍नी ही होनी चाहिए, आ-हा अनूप या हो-हो ज्ञान नहीं. हें-हें आलोक भी नहीं. ग़लत बात है. तो मैं कह रहा था मन्‍नू की किताबोपरांत पत्‍नी फिर से केंद्र में लौट आई है. अलबत्‍ता इस बार वह पति को जलाती नहीं, बचाती देखी गई; नतीजे में पड़ोस में कुछ लोग हंसते और गाल बजाते देखे गए (विमल लाल नहीं देख सके, और मैं भी दूसरे कामों में बझा हुआ आंखों पर परदा डाले रहा). मगर विवाद पति को बचाती देखी गई पत्‍नी का पति को बचाती दिखना मात्र नहीं रहा, उसका आधी ज़मीन के हाशिये से निकलकर बमबम, भड़भड़ के साथ केंद्र की तरफ फैल जाना हो गया है. पत्‍नी के इस अस्त्रियोचित आचरण से बुज़ुर्ग लोग सन्‍न हैं. मैं बुज़ुर्ग नहीं, लेकिन सन्‍न मैं भी हूं. पत्‍नी को घबराहट व शंका, और ‘मेन आर फ्रॉम मार्स एंड वीमेन आर फ्रॉम वीनस’ जैसे जनोपयोगी हितकारी साहित्‍य को भयानक आशा से देखने के लिए मजबूर हो रहा हूं.

क्‍या आधी ज़मीन या अदर हाफ़ का केंद्र की ओर सरकना उचित है? बुज़ुर्गों का सन्‍न होना? उचित? है? क्‍या स्‍त्री मात्र जीवन का नमक नहीं? क्‍या जीवन को हटाकर केंद्र में नमक की स्‍थापना हर तरह के सामाजिक मिठास का अन्‍त नहीं हो जाएगी? अफ़सर वाली केबिन में बैठे नौकर, भाई, पत्‍नी, ड्राईवर के कौतुकभरे चित्र खींचने के हमारे ललित सुखों में सेंघमारी नहीं हो जाएगी? कि हमारी जगह नौकर, भाई, पत्‍नी, ड्राईवर हमारा चित्र खींचने को अकुलाने लगेंगे? कौतुक व विद्रूप भरे? क्‍या नेतृत्‍वकारी साहित्‍य व समाज इसकी इजाज़त दे सकेगा? ढंग से खड़ा, या बैठ, कुछ भी रह सकेगा? क्‍या हिंदी सांस ले सकेगी? क्‍या गाय-पट्टी वाली हिंदी को इस तरह सांड़ बनाना उचित होगा?

मैं पेट खुजलाते हुए सोच रहा हूं, और ठीक से सोच पाने में असमर्थ होता हुआ फिर से पेट खुजला रहा हूं.

Friday, August 10, 2007

एक मामूली कविता की किताब..

एक कविता खुशी की हो, धुली लहरीली साइकिल पर चढ़कर आए, जंगले के लोहे में धंसे बच्‍चे का चेहरा मुस्‍कराहट में भर जाए.

खुरपी, मटकी, संड़सी, असबेस्‍टस, बेलचा, हेलमेट, बाजा, बंसखट पर हो एक कविता.

एक गोंइठा, देगची, परात, अदहन, राख में पकते आलू और भंटा की हो.

खपड़े पर पड़पड़ाती बारिश और सीली चदरी में मुंह लुकाये की हो गीली एक कविता.

एक कविता खाना ठेलकर दूर कर देने, उबले व उबलते रहने, मां से जिरह की लम्‍बी दोपहर में बार-बार टूटने और मुड़ने की हो.

सफ़र की हो तीन कविताएं, ग़ुमनाम शाम की फीक़ी पीली रोशनी में टकराते फतिंगों की बेमतलब बेचैनी और व्‍यर्थता में बीतते जीवन की अकुलाहट की एक कविता हो.

एक मुंहअंधेरे आसमान की हल्‍के, फाहे की-सी नीलाई में नहाये सड़क पर भागने की, थकने की हो.

एक असंभव सपने की हो, किसी गांव-सड़क के पेपरवाले की दुकान पर चौंककर ठहर जाने, ‘दिनमान’ उठा लेने, पढ़ने, जगने और जगे रहने की हो.

जंगल में उतरने, खोने के संगीत की, और जंगली रात से निकल आने की हो एक कविता.

एक सागर की गहराई की, एक पेड़ की ऊंचाई की हो.

एक कविता सुख की हो, भागकर गाड़ी पर चढ़ लेने, रतजगे, मुंह को किताब के हल्‍के आंचल से तोपे हंसने और हंस-हंसकर नशे में बहने की हो.

निर्दोष नवजात बच्‍चे की हो, करुणा की हो एक कविता.

हाथी से गिरकर चोट खाने और घर जलाने की, प्‍यार की हो एक कविता.

हिन्‍दी की हो, एक कविता दु:ख की हो.

Thursday, August 9, 2007

पुरबिया फुटानीबाज का विरह गीत



चोन्‍हाके देखs, सुनरी, तनि कोहनी लड़ाके देखs
आंखि से आंख सटाके अऊर गोड़ हिलाके देखs
कुंइया पे गगरी भेंड़ाके तनि करेजवा जराके देखs

गाड़ी रंगोवलें बानि तहरा खातिर
नेल पालिशो चढ़वलें बानि तोहरे खातिर
जुल्‍फी के नवका इस्‍टाइल
जाकिट-पाकिट-बेल्‍ट-बूट
रंग-रोगन सब इस्‍पेशल
बमबम फारन इस्‍माइल
चऊदह गांव कवनो तिलकहरु
न सजल होई, ससुर
जेतना डेंटिंग-पेंटिंग
करवलें बानि, बबुनी, तहरा खातिर
सेंट में बूड़-बूड़ रोज सम्‍पू से नहातानि
अकबकाइल अजिया के चाची बुलावतानि
अऊर जबरी चमईनी पे चिंचियावतानि

कपार कंटाइल बा, मुंड़ी के होश उड़ल
एतना सताव मत, लाल पान के बेगम
चल आव कोरा में, लजाके देखs
टोअs हेहर-ओहर, तनि लहराके देखs.

उपन्‍यास क्‍यों नहीं लिखे जा रहे: श्रीलाल शुक्‍ल

हिन्‍दी साहित्‍य, उसमें भी विशेषकर उपन्‍यास-लेखन की दुर्दशा पर यह टिप्‍पणी श्रीलाल जी ने आज से पंद्रह वर्ष पहले, सन् 1992 में लिखी थी. इससे अलग कि शुक्‍ल जी के तंज ने मेरा उपन्‍यास लिखने का इरादा और मजबूत कर दिया है, अपनी सजीली-भीगीली शैली में श्रीलाल जी हिन्‍दी साहित्यिकता का जो लेखा-जोखा रखते हैं, वह तब आंख खोलनेवाला रहा होगा तो अब भी आंखें ही खुलवाता है. कुछ लोग चाहें तो मुंह भी खोल सकते हैं. खुले बाज़ार ने समाज में पैसे की उपस्थिति भले पहले की बनिस्‍बत अब ज़्यादा बढ़ा दी हो, हिन्‍दी साहित्‍य का परिदृश्‍य विशेष नहीं बदला है. घटिया ही हुआ है. पढ़ लीजिए, अन्‍दाज़ा पा जाइएगा.


1992 में हिन्‍दी साहित्‍य का जो लेखा-जोखा अख़बारों में छपा है, उसे पढ़कर मुझे भी श्री राजेंद्र यादववाली चिन्‍ता सताने लगी है: कि लोग जमकर लिख क्‍यों नहीं रहे हैं. पर साधन, सक्रियता, अनर्गल उत्‍साह की कमी के कारण मैं उनकी तरह इस विषय पर सेमिनार नहीं करा रहा हूं, सिर्फ़ यह टिप्‍पणी लिख रहा हूं.

कुछ विधाओं के बारे में कोई झमेला नहीं है. जैसे कविता. वह जाती है, वापस आ जाती है. बारह साल पहले उसे अशोक वाजपेयी ने आते देखा था. फिर उसे जाते किसी ने नहीं देखा. दरअसल, कुछ ऋतुकालों को छोड़कर, वह गई नहीं है. वह लीलाधर जगूड़ी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्‍बुज, विनोदकुमार शुक्‍ल आदि के पास पहुंचती रही है. नागार्जुन, त्रिलोचन आदि अब वयोवृद्ध हो गए हैं. वे शायद उसे बुलाते ही नहीं; प्रौढ़ता को लांघ रहे केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण के पास खुलेआम जाते वह हिचकती है. अशोक वाजपेयी के साथ वह ज़रूर इतना टिकी रही है कि वे दो साल में एक संग्रह निकाल दें. बहरहाल, कविताजी मज़े में हैं.

दर्जनों लोग जो नई-नई ड्रेसें ला रहे हैं, उनसे कहानी की वार्डरोब पटी पड़ी है. लघु पत्रिकाओं की शक्‍ल में कई वार्डरोबें तो ऐसे-ऐसे क़स्‍बों में रखी हैं कि उनका नाम देखने को नक़्शे पर मैग्‍नीफाइंग ग्‍लास लगाना पड़ता है. एक से एक उकसानेवाला माल है: ये डिज़ाइन की साड़ि‍यां हैं, यह रहा ‘एथनिक’ माल. दो-चार थीमों की ऐसी रगड़ाई हुई है कि कहानीजी जवानी में ही बूढ़ी दिखती हैं. पर वे बहुत ख़ुश हैं; उनका चेहरा ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं है, वे इस बात पर भी ख़ुश हैं.

नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं. अच्‍छा है. ज़्यादा लिखे जाने लगे तो हम यह वेदवाक्‍य कैसे कह पाएंगे कि ‘हिन्‍दी में मौलिक नाटकों का नितान्‍त अभाव है.’

यात्रा-वृतान्‍त? वह हिन्‍दी में कैसे लिखा जा सकता है? नई-नई जगहों पर यात्रा करने के लिए जिनके पास पैसा है, उनमें यात्रा-वृतान्‍त लिखने की तमीज़ नहीं है. जिनके पास तमीज़ है, उनके पास पैसा नहीं.

जीवन, आत्‍मकथा, संस्‍मरण- ये सब कहानी की ही शाखा-प्रशाखा हैं. अगर कहानी समृद्ध है तो इन्‍हें भी समृद्ध मान लीजिए और कहानी में जीवनी-संस्‍मरण और जीवनी-संस्‍मरण में कहानी खोजने की बराबर कोशिश करते रहिए. मिल जाएगी.

रही आलोचना. उसकी फ़ि‍क्र छोड़ि‍ए. इसकी ज़रूरत सिर्फ़ विद्यार्थियों को इम्‍तहान पास कराने के लिए होती है. जितनी ज़रूरी होती है, उससे सौ गुना ज़्यादा आलोचना व्‍याख्‍याओं, कुंजियों आदि की राह से उनके पास पहुंचती रहती है. पर आप शायद ऐसी आलोचना के बारे में सोच रहे हैं जिसकी ज़रूरत कवियों, कथाकारों- यानी सर्जनात्‍मक रचनाकारों को है. पर हिन्‍दी में रचनाकार नहीं होते, साधक होते हैं, साहित्‍य-साधक. वे वाद-विवाद में नहीं फंसते.

अन्‍त में उपन्‍यास. ‘अन्‍त में’ इसलिए कि मैं उसी के लिए चिन्तित हूं.

1992 में उपन्‍यास दो-चार ही आए- रानू-शानू के करिश्‍मों को भूल जाइए. मेरा मतलब असली उपन्‍यासों से है. यहां सचमुच ही ‘उपन्‍यास-साहित्‍य में सन्‍नाटा’ पर एक ऐसे सेमिनार की ज़रूरत है जो पूरे साल-भर चले. उसका एजेंडा कुल इतना हो कि सहयोगी उपन्‍यासकार अपनी-अपनी कोठरियों में बन्‍द रहें, सिर्फ़ शाम को आधा घंटा कसरत करने के लिए आंगन में निकलें- कारागार में नेहरू-स्‍टाइल. सौ उपन्‍यासकारों का यह सेमिनार- जिसमें उपन्‍यासकार के दोनों वक़्त का खाना, एक कोठरी, कुछ सिगरेट, थोड़ी स्‍मगिल्‍ड शराब की गारंटी हो- साल-भर में कम-से-कम सौ उपन्‍यास आपके हाथ में पकड़ा देगा. यह दीगर बात है कि सब उपन्‍यासों का एक ही शीर्षक हो: ‘जेल में एक वर्ष’.

लोग ज़्यादा उपन्‍यास क्‍यों नहीं लिखते? इसके जवाब में पूरा-का-पूरा उपन्‍यास लिखा जा सकता है. सच पूछिए तो लिखा गया है. यक़ीन न हो तो अमृतलाल नागर का लगभग छ: सौ पृष्‍ठों का ‘अमृत और विष्‍’ पढ़ि‍ए. इसीलिए इस प्रश्‍न पर यहां मैं और कुछ नहीं, सिर्फ़ दो बातें कहूंगा.

एक तो यह कि कविता या कहानी आप सवेरे की सैर में बना सकते हैं और फिर उसे, अपनी तन्‍दुरुस्‍ती के हिसाब से, नाश्‍ते के पहले या बाद में लिख सकते हैं. दो-तीन नाश्‍तों के आगे-पीछे वह पूरी हो जाएगी. उसके छपने पर आपकी क़ि‍स्‍मत- यानी आलोचक मंडली- ठीक हुई तो आप उतनी ही ख्‍याति पा लेंगे जितनी कि एक उपन्‍यास लिखकर, बशर्ते कि वहां भी आपकी क़ि‍स्‍मत वैसी ही ठीक हो. याद करें ‘प्रेम पत्र’ या ‘ऐ लड़की’.

पर उपन्‍यास सवेरे की सैर में नहीं लिखा जा सकता. यह एक पूर्णकालिक धन्‍धा है. प्रेमचन्‍द, वृन्‍दावनलाल वर्मा (जो वस्‍तुत: वकालत का धन्‍धा छोड़ चुके थे), भगवतीचरण वर्मा (जिन्‍होंने वस्‍तुत: वकालत का धन्‍धा कभी शुरू ही नहीं किया), इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, यशपाल- सभी पूर्णकालिक उपन्‍यासकार थे. जयशंकर प्रसाद, सियारामशरण गुप्‍त, निराला- ये सब पूर्णकालिक कवि थे पर इनके पास इतना समय व बची-खुची कल्‍पना थी कि उपन्‍यास भी लिखें. इन सबके न रहने पर उपन्‍यास का बाज़ार ठंडा हो गया है. अब वह कारोबार दूसरे हाथों में चला गया है. वे, यानी कुछ सरकारी नौकर, अध्‍यापक, बूढ़े पेंशनर, पत्रकार, राजनीतिक धन्‍धेबाज़, व्‍यवसायी या व्‍यवसाय प्रबन्‍धक, जो उपन्‍यास-लेखन को स्विमिंग पूल में रविवासरीय गोताख़ोरी या क्‍लब में सायंकालीन बिलियर्ड जैसा मानकर चलते हैं, उस युग को वापस नहीं ला सकते जो प्रेमचन्‍द आदि ने सृजित किया था.

दूसरी बात यह कि उपन्‍यास-लेखन घाटे का धन्‍धा है. मेरे मित्र स्‍व. ज्ञानस्‍वरूप भटनागर कानपुर में- लगभग बाईस साल पहले ‘टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया’ के संवाददाता थे. साल में कुछ सामाजिक-आर्थिक अध्‍ययन छपा करके वह काफ़ी रुपया कमा लेते थे. बदक़ि‍स्‍मती से मेरी देखा-देखी उन्‍होंने टेस्‍ट क्रिकेट की अन्‍दरूनी दुनिया पर ‘और खेल अधूरा रह गया’ नामक उपन्‍यास लिखना शुरू किया. डेढ़ साल लगे. फिर बड़ी कोशिशों के बाद जवाहर चौधरी की कृपा से उसे ‘शब्‍दकार’ ने छापा. उन डेढ़ सालों की निरर्थकता ने भटनागर को तीन साल ग़रीबी में डुबोए रखा. बार-बार वे मुझसे यही पूछते रहे, ‘उपन्‍यास से कुल इतना मिलता है? तब भी आप नया उपन्‍यास लिख रहे हैं?’

मैंने भी तीन साल मेहनत करके, लगभग बाईस सौ पन्‍ने रंगकर लगभग तीन सौ पृष्‍ठ का एक उपन्‍यास तैयार किया. एक व्‍यवसाय-प्रबन्‍धक मित्र के भड़काने पर पांडुलिपि प्रकाशक को देते समय मैंने, पचास हज़ार की हिम्‍मत न होने के कारण सिर्फ़ बीस हज़ार रुपये का अग्रिम मांगा. वह मुझे‍ मिल भी गया. दो-तीन महीने बाद दूसरी पुस्‍तकों की रायल्‍टी का जो विवरण आया, उसमें यह रक़म काट ली गई थी. नए उपन्‍यास का अग्रिम, बस: ख़्वाब था जो कुछ था देखा, जो सुना अफ़साना था.

तभी अगर कोई समझदार आदमी नासमझी की झोंक में एक उपन्‍यास लिख भी डालता है तो वह उसका पहला और अन्तिम उपन्‍यास होता है. इस स्थिति का सर्वेक्षण कराके मित्र राजेंद्र यादव चाहें तो एक नया सेमिनार करा सकते हैं.

साभार: '1992 का साहित्‍य: कुछ आंसू, कुछ हिचकियां'; जहालत के पचास साल, श्रीलाल शुक्‍ल, राजकमल प्रकाशन, 2004.

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Wednesday, August 8, 2007

नींद में रात



एक
जाने कहां किस जंगल, पहाड़, अजाने गांव के बाहर अटकी है रेल की दमघोंट अंतहीन इंतज़ार की तरह नींद आती कहां है. झपकियां आती हैं उखड़ी-उखड़ी-सी, अचक्‍के में ठेले गए किसी लापरवाह हाथ के धक्‍के-सी बैठे-बैठे गिराती हुई. चैन का कोई छोटा सुकूनदेह आंगन नहीं खुलता, थकान व खीझ की खुरदुरी लक़ीरें खिंचती चलतीं हैं. माथे पर घूमते हाथों में गुस्‍सा दीवाना बना चौंकता रहता है. घड़ी की टिकटिक ध्‍यान बांधे सुनती है हवा का दबी आवाज़ बड़बड़ाना, नींद नहीं आती.

दो
नींद के गहरे खोह में उतरने के बाद रात जाती कहां है. खिड़की पर बाहर का गाढ़ा अंधेरा तकती सोचती है क्‍या. कपड़ों, किताबों के आड़े-तिरछे भूगोल पर अधलेटी अलसायी आंखें मूंदे किस बात पर मुसकराती है. अपनी नज़र बचाकर जला लेती है एक सिगरेट. धीमे डोलते परदों से क्‍या बोलती है फुसफुसाती कितनी देर, और आंख खुलती है तो कहीं नहीं होती है रात. कहां जाती है.

ऊपर चित्र: 'उक्ति की नींद', गोया की एक कृति

क्‍या आदमी स्‍वयं को कुत्‍ते से श्रेयस्‍कर बता सकता है?

यह सही है कि कुछ आदमियों का भूंकना कुत्‍तों से ख़ूंखार होता है, और भले आदमियों के पूंछ नहीं होती; मगर ज़रूरत पड़ने पर पैरों के बीच पूंछ दबा लेने की तरह, उठी हुई मूंछ गिरा लेने का कौशल वे कुत्‍तों से ज्‍यादा रखते हैं. लेकिन इतने के बिना पर हम आदमी को कुत्‍तों से ऊंचा दर्जा नहीं दे सकते. नहीं देना चाहिए. उचित नहीं होगा. न्‍यायसंगत भी नहीं होगा. कुत्‍ते में ऐसी और ढेरों अच्‍छाइयां हैं, जिसके आदमी दूर-दूर तक निकट नहीं पहुंच सकता. भूंकने में भले ही वह कुत्‍ते को कितना पीछे क्‍यों न छोड़ दे. कपड़ों पर? अनावश्‍यक आश्रितता (निर्भरता) में? छोड़ सकता है पीछे? सवाल नहीं उठता.

दस कदम पीछे हटकर एक कुत्‍ते को (किसी कुत्‍ते को) ज़रा निर्दोष आंखों से सिर से पैर तक घूरिये. क्‍या दीख रहा है? सब दिखेगा. क्‍योंकि वहां बेवजह की कोई, कैसी भी सामाजिक प्रवंचना है ही नहीं.. जो है नैसर्गिक है, प्रत्‍यक्ष है. प्रकृति प्रदत्‍त अपने सत्‍यमेव शरीरी सौष्‍ठव में. सरलता, सहजता व सच्‍चाई का जीवंत दस्‍तावेज़ बना कितने ऊंचे पैडस्‍टल पर कुत्‍ता खड़ा, पड़ा (या लेटा, जो भी) होता है. जबकि आदमी कितना भी गर्दन ऊंचा किये रहे, उसकी अंतरात्‍मा हमेशा गिरी हुई, गलीज़ हालत में होती है. क्‍यों? क्‍योंकि सभ्‍यता व शिक्षा के आवरण ने उसकी देह पर कपड़ों का विकासवादी, विनाशी ढकोसला साट रखा है! मनुष्‍य की स्‍वभावगत नंगई पर बेड़ि‍यां डाल रखी हैं!

किसी भी सार्वजनिक स्‍थान में कुत्‍ते व आदमी को एक-सी तुलनात्‍मक स्थिति में रखकर देखें, कुत्‍ते की ऊंचाई व आदमी की नीचता का वहीं प्रत्‍यक्ष प्रमाण मिल जाएगा. सार्वजनिक स्‍थान पर पेशाब करने का ही उदाहरण लें. एक कुत्‍ता (कोई भी कुत्‍ता) तन्‍मयता व तल्‍लीनता से जिस क्रिया में संलग्‍न है (पेशाब में) उसे संपन्‍न करता है. जबकि आदमी को किसी दीवार से लगकर खड़े देखिए? तन्‍मयता व तल्‍लीनता तो दूर, वह (आदमी) लगातार उद्वि‍ग्‍न बना रहता है (कि अचानक सामनेवाले मकान से कोई बाहर आकर गालियां न बकने लगे), और, सैकड़ा में से नब्‍बे दफे, जिसमें संलग्‍न रहता है (पेशाब में) उसे ठीक से संपन्‍न तक नहीं करता! (क्रिया की संपन्‍नता के तत्‍काल बाद ध्‍यान से उसकी पैंट के अगले हिस्‍से का मुआयना करें, नोट लें).. क्‍या यह सही है? स्‍वास्‍थ्‍यकर है?

एक अन्‍य सार्वजनिक स्‍थल- रेलवे प्‍लेटफ़ॉर्म- पर कुत्‍ते को खाता हुआ देखिए. वह खाने की क्रिया में केंद्रित दिखेगा. उसी क्रिया में संलग्‍न रेल के भीतर किसी आदमी को देखिए. केंद्रीयता गायब दिखेगी. एक अजब हड़बड़ी और घबराहट में फंसा आदमी खाना कम, खाना आदमी को खाता ज्‍यादा दिखती है! क्‍या यह भयानक रूप से सोचनीय व शर्म का विषय नहीं? है. एकदम है.

जन्‍मस्‍थान के प्रति प्रेम के स्‍तर पर भी आदमी और कुत्‍ते के बीच कोई मुक़ाबला नहीं. कुत्‍ते का अपनी ज़मीन से जो ममत्‍वपूर्ण लगाव है, आदमी क्‍या उसके घुटने तक भी पहुंचने की सोच सकता है? नहीं सोच सकता. बिलासपुर या पटना के किसी कुत्‍ते के बारे में आपने कभी सुना है कि वह अपनी धरती छोड़कर पैरिस या न्‍यूऑर्क जा बसा? नहीं सुना होगा. क्‍योंकि कुत्‍ते जिस ज़मीन की नमक खाते हैं, उसी का कर्ज़ अदा करते-करते इस नाशवान जीवन का होम कर देते हैं. जबकि आदमी इस नाशवान जीवन का होम करने उसे कितने सैकड़ा व हज़ार किलोमीटर दूर, कहां-कहां नहीं ले जाता? मुहावरे में भी आदमी को ही नमक हराम बताया गया है. कुत्‍ते को नमक हराम बताने की घटना प्रकाश में आई है? नहीं, अभी तक अंधेरे में है.

आदमी का किसी भी सूरत में कुत्‍ते से ऊंचा उठने का ख़्याल महज़ उसका दिवास्‍वप्‍न है, फ़रेबी खुशफ़हमी है. याद कीजिए, इतिहास ग़वाह है- किसी आदमी ने (एक आदमी ने) इराक पर चढ़ाई का फ़रमान ज़ारी किया, कुत्‍ते ने नहीं. दंगा आदमी करवाता है, कुत्‍ता नहीं. कुत्‍ता हड्डी पाकर संतुष्‍ट रहता है, जबकि आदमी मांस की फिराक में रहता है.

आदमी किसी भी तरह से नहीं है, श्रेयस्‍कर कुत्‍ता है.

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Tuesday, August 7, 2007

फ्रेंडशिप डे की लाइव पतनशील कवरेज़..

सुबह से सात लोगों की बधाई पाकर पहले तो तपासे को आशंका हुई, फिर सचमुच डर लगने लगा. कहीं पीठ पीछे उसे फंसाने की चाल तो नहीं चली जा रही? उसे ढाल बनाकर भाई लोग नया गंदा खेल तो नहीं खेल रहे? ऑफ़ि‍स पहुंचने पर उसे पता चला कि वह ख़ामख़्वाह डर रहा था, जबकि बाकी लोग मज़े का फ्रेंडशिप डे खेल रहे थे. शुक्‍ला सामने पड़नेवाले हर आदमी का हाथ अपने हाथों में लेकर ‘हैप्‍पी फ्रेंडशिप डे!’ विश कर रहे थे. सामने पड़नेवाली औरत हुई तो हाथों में हाथ के साथ कंधा भी ले ले रहे थे.

रोज़-रोज़वाली इसको कुहनी, उसको लंगी की जगह सहोदरता का अच्‍छा, सुहाना समां बंधा हुआ था. मिसेज़ पाटिल हाथ में फूल लिए डोल-डोल कर त्रिखा से बातें कर रही थीं. त्रिखा बिना डोले सीधे खड़े-खड़े कर रहा था. मिस मोइत्रा उन्‍हें रश्‍क की नज़रों देखतीं उदास हो रही थीं कि गोयल के उन्‍हें बिना बताये अचानक करनाल चले जाने से किसी के साथ खड़ी होकर मित्रता की मिसाल क़ायम करने के मौक़े से वह कैसे वंचित हो गई थीं. उन्‍हें गोयल पर गुस्‍सा आ रहा था जो उनके लंच बॉक्‍स की सब्‍जी चखना नहीं भूलता (और भूल जाता भी तो वह खुद उसे चखाना नहीं भूलतीं), मगर आज ऐसे ख़ास दिन उन्‍हें एसएमएस करने की बात भूल गया था! कमीना गोयल! दुश्‍टो! दुश्‍टो मालोबिकाओ!.. ‘हैप्‍पी फ्रेंडशिप डे’ के रोनू वाले एसएमएस को ही फॉरवर्ड कर दिया.. रोनू के नाम को तो डिलिट कर देती बेशरम? बोड़ो दुश्‍टो!

रोनू डिप्रैस हो रहा था. उसने चालीस एसएमएस किये जबकि उसे सिर्फ़ बारह एसएमएस आए! पिपल आर मीन, दे आर नॉट ट्रू टू इवन देयर फ्रेंडशिप! सुबह से बीयर पीता रोनू यही ऊटपटांग सोच रहा था जब सड़क पर उसकी वैगन आर एक स्‍कूटी को ले गिरी. स्‍कूटी पर पीछे बाप को बिठाये तान्‍या के हाथ में हालांकि फ्रेंडशिक बैंड्स थे मगर फ्रेंडलेस रोनू पर तरस खाने की जगह, शायद बाप की संगत के असर में दुस्‍साहसी होकर, लड़की उस पर चढ़ बैठी. पहले से ही उखड़ा रोनू भी बिफर गया और दोनों ही बिखरे हुए दल सदल-बल नज़दीक के चौकी पहुंचे. चौकी के सभी सिपाहियों को ‘हैप्‍पी फ्रेंडशिप डे!’ कह-कहकर हाथ मिलाते रहने के बावजूद रुंआसे रोनू का केस कमज़ोर नहीं हुआ. अलबत्‍ता चौकी में उल्‍टी कर देने और इस तरह यह ज़ाहिर कर देने पर कि वह नशे के असर में ड्राइविंग कर रहा था, रोनू को एक्‍स्‍ट्रा फ़ाइन से भी नवाजा गया. इस दौरान रोनू ने मालोबिका, चैताली, बोंटू, तापोस जैसे करीबी दोस्‍तों को लगातार फ़ोन करते हुए अपनी दुर्दशा की ख़बर पहुंचानी चाही, मगर लगातार ये करीबी दोस्‍त एंगेज़्ड फ़ोन के साथ अनअवेलेबल भी बने रहे.

तान्‍या अपने पिता से पकी हुई थी. पिता ने फ्रेंडशिप डे के लिए जेब से दो सौ बाहर करने के बाद हाथ खड़े कर दिये थे. जबकि विद्या और गीतिका दोनों कल से कार्ड लेकर शॉपिंग कर रही थीं. गीतिका ने तो सात सौ का सिर्फ़ बैंड्स खरीदा था. कार्ड्स की शॉपिंग सेपरेट. लेकिन गीतिका ने सुबह फ़ोन किया तो वह भी खुश साउंड नहीं कर रही थी. जुडिथ को फ्लर्ट बोल रही थी. इसलिए कि जुडिथ ने हाथ में, गले में, और कहां-कहां नहीं, सब जगह बैंड्स पहन रखा था! शी वॉज़ जस्‍ट ट्राइंग टू शो ऑफ़ टू द बॉयेज़! शी इज़ रीयली सम बिच! हां, अपने क्‍लोज़ेस्‍ट फ्रेंड के लिए यही कहा था गीतिका ने.

लेडीज़ रुम में मिसेज़ जांगले हेयर ठीक कर रही थीं जब पीछे से अचानक प्रकट होकर व अपने बालदार काले हाथों में दबोचते हुए- सोमसुंदरम ने उन्‍हें चूमने की कोशिश की. जवाब में भावुक होकर सहयोग प्रदान करने की जगह मिसेज़ जांगले नाराज़ हो गईं, और नाराज़गी के जोर में ही उन्‍होंने सोमसुंदरम को धक्‍का दिया. परिणामस्‍वरूप मुसकराते हुए थुलथुल देह के भले व काले आदमी सोमसुंदरम मुसकराते-मुसकराते ही कमोड से जा भिड़े, और भिड़ने के बाद वहीं गिरे व पड़े रहे.

तेज़ी से लेडीज़ रुम से बाहर निकलतीं मिसेज़ जांगले ने उनके बुदबुदाकर कहे ‘हैप्‍पी फ्रेंडशिप डे’ का अगर जवाब दिया भी हो तो सोमसुंदरम को वह सुनाई नहीं पड़ा.

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Monday, August 6, 2007

न्‍याय के लिए कौन आंसू बहायेगा?..

इसके पहले कि आईएसआई को मेमन परिवार के भारत भागने व आत्‍मसमपर्ण के अंदेशों की भनक लगती, (याकूब की काठमांडू में गिरफ़्तारी के बाद) सीबीआई ने तीन हफ़्ते चले एक होशियार ऑपरेशन में मेमन परिवार को दुबई में लोकेट किया, आईएसआई से उन्‍हें छिपाये रखने में कामयाब रही, और अंतत: दो किस्‍तों में उन्‍हें दिल्‍ली लाने में सफल हुई. पहली बार में याकूब के पिता, मां, तीन भाई, एक भाभी और दो बच्‍चे लौटे, और फिर उसकी बीवी और नवजात बेटी..

सिर्फ़ टाइगर व अयूब कराची में बने रहे..

इसके बाद सीबीआई ने मेमन परिवार की अविश्‍वसनीय कहानी सुनी. कैसे परिवार का दुबई आना-जाना लगा रहता था. उनमें से कुछ, जैसे रुबिना और अयूब वहां स्‍थायी निवासी हो गए थे. मार्च, 1993 में अयूब ने जोर दिया कि परिवार के सब लोग ईद मनाने के लिए दुबई में इकट्ठा हों, तो कुछ ऐसी ही पृष्‍ठभूमि में, बमकांड के ठीक पहले, परिवार मुंबई से दुबई के लिए निकला था.

बमकांड के बाद टाइगर जब भगौड़ा हो गया, तब धीरे-धीरे उनके भेजे में बात धंसनी शुरू हुईं कि कि मुंबई में उड़ रही ख़बरों में कितनी सच्‍चाई है- कि इस बलवे के पीछे मेमन परिवार का एक लड़का शामिल है. महज़ एक हफ़्ते के भीतर, जब टाइगर बिना विज़ा के उन्‍हें भगाकर कराची ले गया, तब उनके लिए यह बात भी खुली कि इस हादसे से पाकिस्‍तान के संबंध भी हैं. यह पता चलने पर पिता अब्‍दुल रज़्ज़ाक इस कदर गुस्‍सा हुए कि परिवार के कराची पहुंचते ही सबकी नज़रों के आगे उन्‍होंने टाइगर को पीटना शुरू कर दिया. मजबूत देह व नाक पे गुस्‍सा धरे रहनेवाले टाइगर ने चुपचाप बाप की मार सही, जैसे बाद में परिवार के भारत लौटने का फ़ैसला मंजूर किया था.

याकूब की ज़ि‍द पर (अयूब और टाइगर के सिवा) परिवार के सारे लोग भारत लौटे. क्‍योंकि परिवार अपने पर लगे ‘आतंकवादी’, ‘देशद्रोही’ के धब्‍बे को धोना चाहता था, और याकूब समेत बाकी के परिवार को भारतीय न्‍याय व्यवस्‍था में भरोसा था, उम्‍मीद थी. मगर अदालती नतीजों ने यही दिखाया है कि वे अपने भरोसे के हर बिंदु पर गलत साबित हुए..

Rubina got rigorous life imprisonment only because s Maruti van used by Tiger’s men was registered in her name. But she was not even living in Mumbai at the time of the bombings—she had shifted to Dubai six months earlier. Essa, who was hospitalised with a brain tumor and suffers from morbid obesity, and Yousuf, diagnosed as a schizophrenic, also got life only because the flats and garage where the bomb conspiracy was hatched by Tiger and his men were registered in their names. There is nothing otherwise to link them to the conspiracy. (And, off course) Yakub has been condemned to death.

Our leaders have often said that not a single Indian Muslim joined al-Qaeda in the past because India is a democracy. An open and fair society with a robust judicial system, they said, does not produce jihadis. So it’s all more ironic that India’s most notorious Muslim family which voluntarily returned to the country to face trial because of its faith in the system today feels that it made a big mistake.

कल के संडे एक्‍सप्रैस में छपी मसीह रहमान की पूरी रपट यहां पढ़ें.

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Sunday, August 5, 2007

रिपुदमन संवाद

- रिपुदमन?

- हूं!

- हमरी बात का तुमको दुख पहुंचा?

- नहीं..

- फिर मुंह फुलाये काहे ला लेटे हो?

- मुंह नहीं फुलाया हूं.. थकान है.. सिर बथ रहा है..

- इतवारै को तुम्‍हारा सिर बथने लगता है! बेनागा?

- कौनो जानबूझ के नहीं बथाते हैं.. बथ रहा है तो बथ रहा है..

- इतवार के इतवार सिरे बथवाना था तो हमको काहे ला लाये?

- ...

- बोलो? मुंह में जोरन घुस गया, अब बोलते काहे नहीं हो?

- एक बात जानती हो?.. सगरे संसार का दुख एगो आदमी में टोया जा सकता है, और जब ले हम ऊ आदमी का त्‍याग नहीं करते हैं, हम कौनो चीज़ का त्‍याग नहीं करते हैं, और जब ले ऊ सांस लेता है, सगरे संसार सांस लेती है.

- जैसे तुम्‍हारा सिर बथा रहा है वैसे ही हमरो मुंड़ि‍यो पिराने लगे, येही बास्‍ते बोले? बोलने को लाड़-दुलार वाला और कौनो कहानी नहीं सुझाया?

- अपना ऑरिजनल नहीं बोले हैं.. निर्मल बर्मा से उड़ाये हैं..

- ...

- निर्मल बर्मो का ऑरिजनल नहीं है.. ऊ इलियास कनेत्‍ती से टीपे हैं!

- चुप्‍प करो. अब सच्‍चो में मेरा मुंड़ी पिरा रहा है!

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मैं क्‍या हूं?..

मैं क्‍या हूं? नायिका होता तो शायद ऐसी दुविधा न होती. टीला-पर्वत चढ़के चीख-पुकार करता- तेरे चरणों की धूल हूं, धरा हूं, श्‍यामला हूं, गगन हूं, पवन हूं, और सबसे ऊपर- सुलगता बदन हूं.. नायकदेव फ्रेम के दूसरे छोर से भागे हुए आते, देह से देह सटा के बल्‍ल-बल्‍ल बोलते- हिये की प्रिये, रक्‍त है, प्राण है, तू मेरे जीवन का संचित अरमान है!

एक तरह से अच्‍छा ही है कि नायिका नहीं हूं, कि टीला-पर्वत वाली बेमतलब की नौटंकी से बरी हूं. नायकदेव के नारकीय ऊबाऊ डिक्‍लरेशंस से भी. लेकिन अपने होने का सवाल तो तब भी बचा ही रहता है. मैं क्‍या हूं?

पत्रकार हूं न चित्रकार हूं. पत्रकार तो नहीं ही हूं. संजय दत्‍त के ऑर्थर रोड से यरवदा शिफ्ट करने पर लोग फ़ोन करके मेरा जीना दुलम नहीं किये हैं कि भई, मगर बात हुई क्‍या? संजू को तो प्रवीण महाजन वाले सेटअप में टोटल सेक्‍यूर्ड जगह रखा गया था? फिर क्‍यों हटा रहे हैं? अंदर वाली बात बताओ, गुरु? छै साल का टर्म तो वो नहीं ही काटेगा, प्रिया भी सोनिया से मिलके आयेली है! आप भीतर का असल सीक्रेट बोलो, सर? नहीं, ये सब कुछ भी मुझसे नहीं पूछा जा रहा. तो मेरे पत्रकार होने का प्रश्‍न नहीं. चित्रकार होने का भी नहीं. क्‍योंकि न अपने पास बोरीवली या लोनावला में कोई तीस इनटू तीस की स्‍टूडियो है, न कोई लड़की अपनी न्‍यूड बनवाने की ज़ि‍द कर रही है. न ही मैं हाथ में ईज़ल और ब्रुश लेकर फ़ोटो खिंचवाने की ही कर रहा हूं. न, चित्रकार नहीं हूं. सदाबहार भी नहीं हूं, क्‍योंकि अक्‍सर फ़ोन पर लोगों को जवाब देते हुए मुंह से निकल जाता है- अबे, कौन हो? क्‍या चाहिए क्‍या?

लोग समझदार नहीं, होते तो समझ जाते, कि उन पर बरस नहीं रहा, स्‍वयं से सवाल करता अपनी आवाज़ में उन तक अपनी उलझन पहुंचा रहा होता हूं कि कौन हूं, क्‍या हूं.. सवाल का तंज बना रहता है. लोग चिढ़े रहते हैं. जवाब रास्‍ते में कहीं ग़ुम बना रहता है- कौन हूं, क्‍या हूं? फ़ि‍ल्‍ममेकर हूं?

कोरेल में विज़ि‍टिंग कार्ड डिज़ाईन करने का खेल खेलते हुए, अभी भी, नाम के नीचे छोटे अक्षरों में ‘फ़ि‍ल्‍ममेकर’ टांक देने पर अभूतपूर्व प्रसन्‍नता होती है. मगर फिर चली भी जाती है, जब याद आता है कि फ़ि‍ल्‍म बनी नहीं, और रोल के लिए सिफ़ारिश लेकर आनेवालों ने अब याद करना बंद कर दिया है. पति भी नहीं हूं. क्‍योंकि कोई पत्‍नी गोद में पैर लेकर दबाते हुए अपने जीवन को धन्‍य व सार्थक होता नहीं बता रही है. पिता होने का भी सवाल नहीं उठता. क्‍योंकि फिर कुछ तेजी से बढ़ चुके बच्‍चे होते जिन्‍हें मेरी इस और उस आदत से इस या उस तरह की शिकायत होती, और उनके अपने प्रति संचित नफ़रत के आधार अब तक मैं कोई कालजयी रचना रच चुका होता. चूंकि ऐसी कोई रचना रची नहीं जा सकी है, इससे साफ़ होता है कि मैं पिता नहीं हो सका हूं. कालजयी रचना रच देनेवाला कालजयी साहित्‍यकार भी नहीं हुआ हूं.

फिर मैं क्‍या हूं? एक औसत ब्‍लॉगर भर हूं? वह भी जिसे चिट्ठाजगत प्‍लस अट्ठारह के टैग के साथ अपरिवारोपयुक्‍त खांचे में ठेल रही है? लेकिन हमारी पोस्‍ट के साथ इस प्‍लस अट्ठारह वाले टैग का एक्‍चुअली मतलब क्‍या है? कि इसे अट्ठारह वर्ष से ऊपर के लोग ही पढ़ें? बाकी क्‍या नौ और तेरह वर्ष के बच्‍चे पढ़ रहे हैं? माने ज्‍यादातर बालोपयोगी एंट्रीज़ हैं? इसीलिए अनूप शुक्‍ला के यहां इतनी ज्‍यादा स्‍माइली का प्रकोप है?

मगर मैं हूं क्‍या? सवाल अभी भी रह ही गया है.

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गंज के गुलज़ारीबाग़ का दिल्‍ली कनेक्‍शन..

गुलज़ार जीवन वाली प्राकृतिक सीनरी थी. माने एक तरफ नाला था जिसकी बदबू पार करके बमभोले प्‍लस हनुमानजी के मंदिर पहुंचा जा सकता था. बदबू बिना पार किये, पहले ही, फूल, बताशा, नारियल की चार-छह दुकानें थीं. वहीं बाजू में चलित्‍तर की चाय की गुमटी थी जहां ये चारों लौंडे एक-दूसरे पर पैर फेंकते हुए हंस-हंसके दोहरे हो रहे थे. किसी की नौकरी नहीं लगी थी, न किसी को ‘क्‍या खूब लगती हो, बड़ी सुंदर दिखती हो!’ के जवाब में करीना का उत्‍तर आया था, ‘थैंक्‍स फॉर केयरिंग एंड वॉचिंग माई फ़ि‍ल्‍म्‍स. लोड्स एंड लोड्स ऑव लव- करीना’. जयकांत महीने भर अपनी बहन के यहां कुलटी रहकर, और अंत में अपने जीजाजी से जिरह-झगड़ा करके लौट आया था कि आप पाहुन नहीं होते तब्‍ब हम आपको जबाब देते! हम एतना नीचा गिर गए हैं, जी, कि आपके हियां से हज़ार रुपल्‍ली का चोरी करेंगे? यही ब्‍लेमिंग सुनने बास्‍ते हम एतना दूर आए थे, दीदिया? जबकि सच्‍चाई थी कि जयकांत जीजा की दुकान पैसे उड़ाने की नीयत से ही अपनी बहन के पास गया था. बहनों के घर चोरी से रंजन को भी गुरेज न होता, मगर उसके लिए ज़रूरी था कि बहनों का घर हो, जो नहीं था. दोनों अभी भी बाप के ही घर थीं, और पिछले चार वर्षों से हर साल उनकी शादी तय होती, और हर साल इस या उस कारण से टल भी जाती. प्रदीप और अंबिका अपने मां-बाप के अकेले थे. सपनों के वृहत्‍तर आकाश की संभावना उनके जीवन में भी नहीं थी. फिर भी चारों चहक रहे थे.

नाले की तरफ जाते हुए साइकिल को चलित्‍तर की गुमटी की ओर घुमाकर, ताज़ा-ताज़ा आसाम से लौटे रिपुदमन इसी बात का ताजुब्‍ब कर रहे थे (जबकि गांव में सबको ताजुब्‍ब था कि इतने श्रम से एक बार आसाम चले जाने के बाद रिपुदमन वापस गांव चले क्‍यों आए. ऐसी जिज्ञासाओं का साक्षात्‍कार होने पर रिपुदमन का चेहरा उतर जाता, चुप हो जाते, मगर इधर उन्‍होंने एक टैक्टिस ईज़ाद कर ली है, फट देना जवाब लिये तैयार रहते हैं, ‘उधर का तरफ बहुतै टेररिझम है!’

बिना स्‍टैंड वाली साइकिल को गुमटी की दीवाल से टेक, रिपुदमन दांत चियारे लौंडों की ओर बढ़े आए. जयकांत बेंच पर बैठे-बैठे उनके पैरों की ओर झुका, बोला- परनाम, भइया! बाकी के तीनों भी कोरस में टेक दिए.

रिपुदमन बड़प्‍पन वाले भाव से बेंच पर जगह छेंककर बैठते हुए बोले- कौची का तू लोक खुसी कर रहा है, रे? तिवरिया का एस्‍पेलंडर चोरी चल गया, कि कवनो का अपाइलमेंट लेटर आया है?

अपाइलमेंट लेटरो आया है, और चूतरो पे लातो लगा है!- प्रदीप हें-हें करके दोहरा होने लगा. रिपुदमन को अभी भी इन चूतियों के चूतियापे की थाह नहीं लग रही थी.

- बहुत दबंग लगाते थे, ससुर!

- एक्‍के हाली में सब दिबंगियाहट झर गया!

उसके बाद फिर वही समवेत का कोरस. रिपुदमन ऊपर-ऊपर मुस्‍करा रहे थे, भीतर झल्‍ला रहे थे. लौंडों का रहस्‍यवाद टूट नहीं रहा था.

- परनव जी चूतर पे लात मार के चोट्टा को बाहर कै दिये हैं! बाकी जौन-जौन का परमोसन हुआ है, सब्‍बे बिहार का छौंरामन है! समझ जाइए, आगे ले एनडीटी में बिहारै राज करेगा!

दास भइया को मिसकालिन मारके हम देहली से अभिये-अभिये बात किये हैं, भइया!- जयकांत चहकता बताने लगा.

अब रिपुदमन नाराज़ हो गए. चिढ़के बोले- अरे, साला, तू लोक कौची का बात कर रहा है? केकरा चूतर पे लात लगा? कौन बिहारी छौंरामन का बात कर रहा है तू लोक?

थोड़ा ध्‍यान लगाने और उसी मात्रा में सिरदर्द पाने के बाद रिपुदमन चौधरी के लिए साफ़ हुआ कि ये चिरकुट दिल्‍ली के एक राष्‍ट्रीय हिंदीभाषी चैनल में हुए ताज़ा फेरबदल का जश्‍न मना रहे थे. इच्‍छा तो हुई वहीं लौंडों को एक लात लगायें, मगर मुसकरा कर रह गए. साइकिल उठाई और नाले की तरफ वाली बदबू की ओर बढ़ गए.

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Friday, August 3, 2007

दिन बीतते हैं..

शब्‍दों की पगडंडी हौले-हौले रस्‍ता उकेरती है दीखते-दीखते छिप जाती है. सोया रहता है फ़ोन जगता है, फिर सोता है लम्‍बी ताने. दिन बीतते हैं.

पुलिंदे, चिट, चिट्ठि‍यां, कागज़ रहते-रहते फड़फड़ाते हैं, नयी ऊर्जा की चमक फैल जाती है कमरे में मगर फिर कितना तो धूल खाते हैं. दिन बीतते हैं.

हर समय बजता रहता है एक ख़ामोश सांगीतक. उठती हैं सांसें उतरती हैं, पुकारती रहती है कोई पुकार. दबे रंगों में सपनों का दीया टिमटिमाता है, बुझी-बुझी-सी लौ लपकती है एकदम उठी चली जाती है. दिन बीतते हैं.

त्‍वचा का स्‍पर्श बदलता है, हड्डि‍यां कहती हैं देखो, हमारा क्षरण हो रहा है. हंसी-हंसी में देह कांपती है. पैर निरखती आंखें कहतीं अभी तो कहीं निकले भी नहीं, अभी तो भूगोल समूचा अनछुआ पड़ा, अभी तो बीती है बस एक रात एक लाख एक हज़ार रातों में.

किसी उजबक़ बैल की-सी हारी पनीली आंखें हड़बड़ाकर हटती हैं सड़क से, देखती पलटकर धीमे यह कैसा समय बन्‍दूक की गोली की तरह धायं-धायं दगता चला जाता है. दिन बीतते हैं.

कोई नक़ाबपोश दबे पैरों आता है चुपचाप, गठरी खोल दिखाता है खेल, मंत्र बुदबुदाता है जाने किन भाषाओं में और वैसे ही गायब हो जाता है. चुपचाप.

कहीं जलती है आग कहीं बहती है शराब. दिन बीतते हैं.

बीतती है रात एक दिन खुलता है..

Wednesday, August 1, 2007

सच कहां हो पाता है..

इकट्ठा होते चलते हैं आड़े-तिरछे सपने सब हो कहां पाता है. सच कहां हो पाता है. हम अमरीका क्‍या चीन भी कहां जा पाते हैं. बहुत बार दिल्‍ली तक दूर बनी तनी रहती है. और तो और घर जाना तक दुश्‍वार रहता है. सोचते हैं अबे, हटाओ, निकल जायेंगे इस महीने या उसके अगले. रेल का शेड्यूल पता करते हैं. सोने से पहले कसमसाये दोस्‍त को कहते हैं यार, थोड़ा घर जा रहा हूं. फिर कैसी पगलायी तो नींद आती है, बहुत बार सपने में भी घर कहां हो पाता है.

धोती पहनने का सपना नहीं है मगर अभी पहनी जानी बाकी है, जैसे सिगरेट के छुटने का सपना जिया जाना है. आगे-पीछे घूमते और भी हैं तो कई कितने. भल्‍ल-भल्‍ल बरसती बरसात के कादो में बीच खेत खड़े होना. घोड़े पर चढ़, इसके पहले कि घोड़ा बिदके या हम उखड़ जायें, बलल-बलल शहज़ादा सलीम के डायलाग बक देना. भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर एक समूची किताब पढ़ ही नहीं उसको समझ भी लेना. फ़कीरी में आवारा निकल पड़ना दस दिन किधर दस रात कहीं और, पनियायी आंखों तकते कि लोग बात क्‍या करते हैं कैसी मुलाक़ात करते हैं. इकट्ठा होते चलते हैं सपने..

सच कहां हो पाता है.