Wednesday, August 1, 2007

सच कहां हो पाता है..

इकट्ठा होते चलते हैं आड़े-तिरछे सपने सब हो कहां पाता है. सच कहां हो पाता है. हम अमरीका क्‍या चीन भी कहां जा पाते हैं. बहुत बार दिल्‍ली तक दूर बनी तनी रहती है. और तो और घर जाना तक दुश्‍वार रहता है. सोचते हैं अबे, हटाओ, निकल जायेंगे इस महीने या उसके अगले. रेल का शेड्यूल पता करते हैं. सोने से पहले कसमसाये दोस्‍त को कहते हैं यार, थोड़ा घर जा रहा हूं. फिर कैसी पगलायी तो नींद आती है, बहुत बार सपने में भी घर कहां हो पाता है.

धोती पहनने का सपना नहीं है मगर अभी पहनी जानी बाकी है, जैसे सिगरेट के छुटने का सपना जिया जाना है. आगे-पीछे घूमते और भी हैं तो कई कितने. भल्‍ल-भल्‍ल बरसती बरसात के कादो में बीच खेत खड़े होना. घोड़े पर चढ़, इसके पहले कि घोड़ा बिदके या हम उखड़ जायें, बलल-बलल शहज़ादा सलीम के डायलाग बक देना. भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर एक समूची किताब पढ़ ही नहीं उसको समझ भी लेना. फ़कीरी में आवारा निकल पड़ना दस दिन किधर दस रात कहीं और, पनियायी आंखों तकते कि लोग बात क्‍या करते हैं कैसी मुलाक़ात करते हैं. इकट्ठा होते चलते हैं सपने..

सच कहां हो पाता है.

4 comments:

  1. कितने ही सपने हैं!!!!

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  2. वाकई जी कभी हम भी चिट्ठी आई है गाना सुनकर नौकरी से बिना छुट्टी लिये घर भाग लिये थे..

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  3. जैसे अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी को बनाए रखने के लिए सट्टेबाजी जरूरी होती है, शेयर बाजार जरूरी होता है, वैसे जिंदगी जीते चले जाने के लिए भ्रम जरूरी होते हैं, सपने ज़रूरी होते हैं। नहीं तो सब कुछ सूखी रोटी जैसा होता है जिसके साथ प्याज भी मयस्सर नहीं होती।

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  4. kyaa baat hai!!! sachmuch saat rang ke sapne hain... sapne IkaTTha hote chalte hain.. bahut sahi kaha hai...

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