Friday, August 3, 2007

दिन बीतते हैं..

शब्‍दों की पगडंडी हौले-हौले रस्‍ता उकेरती है दीखते-दीखते छिप जाती है. सोया रहता है फ़ोन जगता है, फिर सोता है लम्‍बी ताने. दिन बीतते हैं.

पुलिंदे, चिट, चिट्ठि‍यां, कागज़ रहते-रहते फड़फड़ाते हैं, नयी ऊर्जा की चमक फैल जाती है कमरे में मगर फिर कितना तो धूल खाते हैं. दिन बीतते हैं.

हर समय बजता रहता है एक ख़ामोश सांगीतक. उठती हैं सांसें उतरती हैं, पुकारती रहती है कोई पुकार. दबे रंगों में सपनों का दीया टिमटिमाता है, बुझी-बुझी-सी लौ लपकती है एकदम उठी चली जाती है. दिन बीतते हैं.

त्‍वचा का स्‍पर्श बदलता है, हड्डि‍यां कहती हैं देखो, हमारा क्षरण हो रहा है. हंसी-हंसी में देह कांपती है. पैर निरखती आंखें कहतीं अभी तो कहीं निकले भी नहीं, अभी तो भूगोल समूचा अनछुआ पड़ा, अभी तो बीती है बस एक रात एक लाख एक हज़ार रातों में.

किसी उजबक़ बैल की-सी हारी पनीली आंखें हड़बड़ाकर हटती हैं सड़क से, देखती पलटकर धीमे यह कैसा समय बन्‍दूक की गोली की तरह धायं-धायं दगता चला जाता है. दिन बीतते हैं.

कोई नक़ाबपोश दबे पैरों आता है चुपचाप, गठरी खोल दिखाता है खेल, मंत्र बुदबुदाता है जाने किन भाषाओं में और वैसे ही गायब हो जाता है. चुपचाप.

कहीं जलती है आग कहीं बहती है शराब. दिन बीतते हैं.

बीतती है रात एक दिन खुलता है..

7 comments:

  1. बहुत गहरा डूबे भाई. कहीं बहती है शराब-यह वाला एड्रेस जरा ध्यान से देखकर बताईयेगा. :)

    -अच्छा लगा विचारों के साथ साथ बहना.

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  2. इस मुक्त गद्य को मुक्त पद्य कहा जाय अब.. बड़ी तरल कविता है.. रात में गहरी नदी की तरह होती जा रही है आप की शैली.. डूबने का खतरा है पढ़ने वाले को..

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  3. ये लाइनें मुझे मुक्तिबोध की कविता, मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...लेकिन दिन बीतने की, समय के गुजर जाने की ऐसी शानदार भावानुभूति मैंने अभी तक कहीं नहीं पढ़ी या सुनी थी।

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  4. गद्य में है पद्य या पद्य में है गद्य.सारी में है नारी या कि नारी में है सारी .बहुत खूब भाई जान.

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  5. बीतते दिनों और खुलते दिनों का कैसा उदास मार्मिक गीत गा रहे हैं आप ?

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  6. great!! very deep n natural flow...

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  7. क्या बात है!
    ओ मेरे हिंदी ब्लॉग जगत के खलील जिब्रान . यह काव्य की आभा वाला दुर्लभ जादूई गद्य है मेरे भाई .
    सबको बांध लेने वाला इन्द्रजाल जानते हो क्या ?

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