Sunday, August 5, 2007

गंज के गुलज़ारीबाग़ का दिल्‍ली कनेक्‍शन..

गुलज़ार जीवन वाली प्राकृतिक सीनरी थी. माने एक तरफ नाला था जिसकी बदबू पार करके बमभोले प्‍लस हनुमानजी के मंदिर पहुंचा जा सकता था. बदबू बिना पार किये, पहले ही, फूल, बताशा, नारियल की चार-छह दुकानें थीं. वहीं बाजू में चलित्‍तर की चाय की गुमटी थी जहां ये चारों लौंडे एक-दूसरे पर पैर फेंकते हुए हंस-हंसके दोहरे हो रहे थे. किसी की नौकरी नहीं लगी थी, न किसी को ‘क्‍या खूब लगती हो, बड़ी सुंदर दिखती हो!’ के जवाब में करीना का उत्‍तर आया था, ‘थैंक्‍स फॉर केयरिंग एंड वॉचिंग माई फ़ि‍ल्‍म्‍स. लोड्स एंड लोड्स ऑव लव- करीना’. जयकांत महीने भर अपनी बहन के यहां कुलटी रहकर, और अंत में अपने जीजाजी से जिरह-झगड़ा करके लौट आया था कि आप पाहुन नहीं होते तब्‍ब हम आपको जबाब देते! हम एतना नीचा गिर गए हैं, जी, कि आपके हियां से हज़ार रुपल्‍ली का चोरी करेंगे? यही ब्‍लेमिंग सुनने बास्‍ते हम एतना दूर आए थे, दीदिया? जबकि सच्‍चाई थी कि जयकांत जीजा की दुकान पैसे उड़ाने की नीयत से ही अपनी बहन के पास गया था. बहनों के घर चोरी से रंजन को भी गुरेज न होता, मगर उसके लिए ज़रूरी था कि बहनों का घर हो, जो नहीं था. दोनों अभी भी बाप के ही घर थीं, और पिछले चार वर्षों से हर साल उनकी शादी तय होती, और हर साल इस या उस कारण से टल भी जाती. प्रदीप और अंबिका अपने मां-बाप के अकेले थे. सपनों के वृहत्‍तर आकाश की संभावना उनके जीवन में भी नहीं थी. फिर भी चारों चहक रहे थे.

नाले की तरफ जाते हुए साइकिल को चलित्‍तर की गुमटी की ओर घुमाकर, ताज़ा-ताज़ा आसाम से लौटे रिपुदमन इसी बात का ताजुब्‍ब कर रहे थे (जबकि गांव में सबको ताजुब्‍ब था कि इतने श्रम से एक बार आसाम चले जाने के बाद रिपुदमन वापस गांव चले क्‍यों आए. ऐसी जिज्ञासाओं का साक्षात्‍कार होने पर रिपुदमन का चेहरा उतर जाता, चुप हो जाते, मगर इधर उन्‍होंने एक टैक्टिस ईज़ाद कर ली है, फट देना जवाब लिये तैयार रहते हैं, ‘उधर का तरफ बहुतै टेररिझम है!’

बिना स्‍टैंड वाली साइकिल को गुमटी की दीवाल से टेक, रिपुदमन दांत चियारे लौंडों की ओर बढ़े आए. जयकांत बेंच पर बैठे-बैठे उनके पैरों की ओर झुका, बोला- परनाम, भइया! बाकी के तीनों भी कोरस में टेक दिए.

रिपुदमन बड़प्‍पन वाले भाव से बेंच पर जगह छेंककर बैठते हुए बोले- कौची का तू लोक खुसी कर रहा है, रे? तिवरिया का एस्‍पेलंडर चोरी चल गया, कि कवनो का अपाइलमेंट लेटर आया है?

अपाइलमेंट लेटरो आया है, और चूतरो पे लातो लगा है!- प्रदीप हें-हें करके दोहरा होने लगा. रिपुदमन को अभी भी इन चूतियों के चूतियापे की थाह नहीं लग रही थी.

- बहुत दबंग लगाते थे, ससुर!

- एक्‍के हाली में सब दिबंगियाहट झर गया!

उसके बाद फिर वही समवेत का कोरस. रिपुदमन ऊपर-ऊपर मुस्‍करा रहे थे, भीतर झल्‍ला रहे थे. लौंडों का रहस्‍यवाद टूट नहीं रहा था.

- परनव जी चूतर पे लात मार के चोट्टा को बाहर कै दिये हैं! बाकी जौन-जौन का परमोसन हुआ है, सब्‍बे बिहार का छौंरामन है! समझ जाइए, आगे ले एनडीटी में बिहारै राज करेगा!

दास भइया को मिसकालिन मारके हम देहली से अभिये-अभिये बात किये हैं, भइया!- जयकांत चहकता बताने लगा.

अब रिपुदमन नाराज़ हो गए. चिढ़के बोले- अरे, साला, तू लोक कौची का बात कर रहा है? केकरा चूतर पे लात लगा? कौन बिहारी छौंरामन का बात कर रहा है तू लोक?

थोड़ा ध्‍यान लगाने और उसी मात्रा में सिरदर्द पाने के बाद रिपुदमन चौधरी के लिए साफ़ हुआ कि ये चिरकुट दिल्‍ली के एक राष्‍ट्रीय हिंदीभाषी चैनल में हुए ताज़ा फेरबदल का जश्‍न मना रहे थे. इच्‍छा तो हुई वहीं लौंडों को एक लात लगायें, मगर मुसकरा कर रह गए. साइकिल उठाई और नाले की तरफ वाली बदबू की ओर बढ़ गए.

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7 comments:

  1. भैया , परनाम , कौन कौन है परमोशन वाला लिस्त मे ?

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  2. पढ़ना शुरू किया तो सोचा यूं ही कोई शब्द चित्र या छोटी कहानी है। दूसरे हिस्से में पहुंचा तो असली संदर्भ मालूम हुआ। नौकरी की ख्वाहिश में कैसे भ्रम और कैसी हकीकत से पाला पड़ता है। अच्छा लिखा है।

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  3. चिट्ठाजगत ने आपके इस लेख पर "अपरिवारोपयुक्त लेख" का लेबल लगा रखा है.

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  4. बंधुवर संजय,
    क्‍या परिवारोपयुक्‍त है, और क्‍या नहीं, चिट्ठाजगत की अपनी कुछ समझ होगी.. उनको अपनी समझ बनाने का पूरा हक़ है..

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  5. ह्म्म्म । तो निकाल ही दिया दिबिगीयाहट। भाई जब सोटा बजता है तो अच्छा अच्छा बाबु सब सुधर जावे हैं । परनाब्वा के पास तो ये लोग बित्ता भर का ही है

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  6. NDTV के हलिया फेरबदल में कई जगह ऐसे दृश्य बने होंगे. बढ़िया लगा पढ़कर.

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  7. रिपुदमन को अभी भी इन चूतियों के चूतियापे की थाह नहीं लग रही थी.

    हमने कुछ आपत्तिजनक शब्दों को अपरिवारोपयुक्‍त मान कर यह किया है। ध्यान दें यह स्वचालित है।

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