Sunday, August 5, 2007

रिपुदमन संवाद

- रिपुदमन?

- हूं!

- हमरी बात का तुमको दुख पहुंचा?

- नहीं..

- फिर मुंह फुलाये काहे ला लेटे हो?

- मुंह नहीं फुलाया हूं.. थकान है.. सिर बथ रहा है..

- इतवारै को तुम्‍हारा सिर बथने लगता है! बेनागा?

- कौनो जानबूझ के नहीं बथाते हैं.. बथ रहा है तो बथ रहा है..

- इतवार के इतवार सिरे बथवाना था तो हमको काहे ला लाये?

- ...

- बोलो? मुंह में जोरन घुस गया, अब बोलते काहे नहीं हो?

- एक बात जानती हो?.. सगरे संसार का दुख एगो आदमी में टोया जा सकता है, और जब ले हम ऊ आदमी का त्‍याग नहीं करते हैं, हम कौनो चीज़ का त्‍याग नहीं करते हैं, और जब ले ऊ सांस लेता है, सगरे संसार सांस लेती है.

- जैसे तुम्‍हारा सिर बथा रहा है वैसे ही हमरो मुंड़ि‍यो पिराने लगे, येही बास्‍ते बोले? बोलने को लाड़-दुलार वाला और कौनो कहानी नहीं सुझाया?

- अपना ऑरिजनल नहीं बोले हैं.. निर्मल बर्मा से उड़ाये हैं..

- ...

- निर्मल बर्मो का ऑरिजनल नहीं है.. ऊ इलियास कनेत्‍ती से टीपे हैं!

- चुप्‍प करो. अब सच्‍चो में मेरा मुंड़ी पिरा रहा है!

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5 comments:

  1. लिजीए..अब निरमल बर्मा का लम्बर लगा दिए.. उंको त छोर दिजीए..ऊ बिचाड़े तो दूनीया छोर दिए..

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  2. ई सिरबथाई इतवारे को क्यो होता है, ई रिपुदमनवां को ठीक से समझाते काहे नही हैं? सबका दरद खुदे तो नही ले लिया है?

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  3. अब सच्‍चो में मेरा मुंड़ी पिरा रहा है!

    :)

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  4. जैसन करनी करेंगे वैसन फ़ल भी मिल जाता है। हफ़्ता का हफ़्ता!

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  5. ई राइटर का किताब मिलेगा का । हमहूं टीपना चाहते हैं। टीपन कला मजाक नहीं है। केतना आदमी पढ़ के बौरा गए लेकिन टीपने ही नहीं आया। साहित्य का पतन हो रहा है। अच्छा लग रहा है।

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