Wednesday, August 8, 2007

क्‍या आदमी स्‍वयं को कुत्‍ते से श्रेयस्‍कर बता सकता है?

यह सही है कि कुछ आदमियों का भूंकना कुत्‍तों से ख़ूंखार होता है, और भले आदमियों के पूंछ नहीं होती; मगर ज़रूरत पड़ने पर पैरों के बीच पूंछ दबा लेने की तरह, उठी हुई मूंछ गिरा लेने का कौशल वे कुत्‍तों से ज्‍यादा रखते हैं. लेकिन इतने के बिना पर हम आदमी को कुत्‍तों से ऊंचा दर्जा नहीं दे सकते. नहीं देना चाहिए. उचित नहीं होगा. न्‍यायसंगत भी नहीं होगा. कुत्‍ते में ऐसी और ढेरों अच्‍छाइयां हैं, जिसके आदमी दूर-दूर तक निकट नहीं पहुंच सकता. भूंकने में भले ही वह कुत्‍ते को कितना पीछे क्‍यों न छोड़ दे. कपड़ों पर? अनावश्‍यक आश्रितता (निर्भरता) में? छोड़ सकता है पीछे? सवाल नहीं उठता.

दस कदम पीछे हटकर एक कुत्‍ते को (किसी कुत्‍ते को) ज़रा निर्दोष आंखों से सिर से पैर तक घूरिये. क्‍या दीख रहा है? सब दिखेगा. क्‍योंकि वहां बेवजह की कोई, कैसी भी सामाजिक प्रवंचना है ही नहीं.. जो है नैसर्गिक है, प्रत्‍यक्ष है. प्रकृति प्रदत्‍त अपने सत्‍यमेव शरीरी सौष्‍ठव में. सरलता, सहजता व सच्‍चाई का जीवंत दस्‍तावेज़ बना कितने ऊंचे पैडस्‍टल पर कुत्‍ता खड़ा, पड़ा (या लेटा, जो भी) होता है. जबकि आदमी कितना भी गर्दन ऊंचा किये रहे, उसकी अंतरात्‍मा हमेशा गिरी हुई, गलीज़ हालत में होती है. क्‍यों? क्‍योंकि सभ्‍यता व शिक्षा के आवरण ने उसकी देह पर कपड़ों का विकासवादी, विनाशी ढकोसला साट रखा है! मनुष्‍य की स्‍वभावगत नंगई पर बेड़ि‍यां डाल रखी हैं!

किसी भी सार्वजनिक स्‍थान में कुत्‍ते व आदमी को एक-सी तुलनात्‍मक स्थिति में रखकर देखें, कुत्‍ते की ऊंचाई व आदमी की नीचता का वहीं प्रत्‍यक्ष प्रमाण मिल जाएगा. सार्वजनिक स्‍थान पर पेशाब करने का ही उदाहरण लें. एक कुत्‍ता (कोई भी कुत्‍ता) तन्‍मयता व तल्‍लीनता से जिस क्रिया में संलग्‍न है (पेशाब में) उसे संपन्‍न करता है. जबकि आदमी को किसी दीवार से लगकर खड़े देखिए? तन्‍मयता व तल्‍लीनता तो दूर, वह (आदमी) लगातार उद्वि‍ग्‍न बना रहता है (कि अचानक सामनेवाले मकान से कोई बाहर आकर गालियां न बकने लगे), और, सैकड़ा में से नब्‍बे दफे, जिसमें संलग्‍न रहता है (पेशाब में) उसे ठीक से संपन्‍न तक नहीं करता! (क्रिया की संपन्‍नता के तत्‍काल बाद ध्‍यान से उसकी पैंट के अगले हिस्‍से का मुआयना करें, नोट लें).. क्‍या यह सही है? स्‍वास्‍थ्‍यकर है?

एक अन्‍य सार्वजनिक स्‍थल- रेलवे प्‍लेटफ़ॉर्म- पर कुत्‍ते को खाता हुआ देखिए. वह खाने की क्रिया में केंद्रित दिखेगा. उसी क्रिया में संलग्‍न रेल के भीतर किसी आदमी को देखिए. केंद्रीयता गायब दिखेगी. एक अजब हड़बड़ी और घबराहट में फंसा आदमी खाना कम, खाना आदमी को खाता ज्‍यादा दिखती है! क्‍या यह भयानक रूप से सोचनीय व शर्म का विषय नहीं? है. एकदम है.

जन्‍मस्‍थान के प्रति प्रेम के स्‍तर पर भी आदमी और कुत्‍ते के बीच कोई मुक़ाबला नहीं. कुत्‍ते का अपनी ज़मीन से जो ममत्‍वपूर्ण लगाव है, आदमी क्‍या उसके घुटने तक भी पहुंचने की सोच सकता है? नहीं सोच सकता. बिलासपुर या पटना के किसी कुत्‍ते के बारे में आपने कभी सुना है कि वह अपनी धरती छोड़कर पैरिस या न्‍यूऑर्क जा बसा? नहीं सुना होगा. क्‍योंकि कुत्‍ते जिस ज़मीन की नमक खाते हैं, उसी का कर्ज़ अदा करते-करते इस नाशवान जीवन का होम कर देते हैं. जबकि आदमी इस नाशवान जीवन का होम करने उसे कितने सैकड़ा व हज़ार किलोमीटर दूर, कहां-कहां नहीं ले जाता? मुहावरे में भी आदमी को ही नमक हराम बताया गया है. कुत्‍ते को नमक हराम बताने की घटना प्रकाश में आई है? नहीं, अभी तक अंधेरे में है.

आदमी का किसी भी सूरत में कुत्‍ते से ऊंचा उठने का ख़्याल महज़ उसका दिवास्‍वप्‍न है, फ़रेबी खुशफ़हमी है. याद कीजिए, इतिहास ग़वाह है- किसी आदमी ने (एक आदमी ने) इराक पर चढ़ाई का फ़रमान ज़ारी किया, कुत्‍ते ने नहीं. दंगा आदमी करवाता है, कुत्‍ता नहीं. कुत्‍ता हड्डी पाकर संतुष्‍ट रहता है, जबकि आदमी मांस की फिराक में रहता है.

आदमी किसी भी तरह से नहीं है, श्रेयस्‍कर कुत्‍ता है.

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7 comments:

  1. जब आप ही नहीं बता रहे हैं तो कोई आदमी कैसे बतायेगा। अच्छा लिखा है। जानदार!

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  2. जी नही हम यहा आप से इत्तीफ़ाक नही रखते ,कुत्ता दिल से दुम हिलाता है और आदमी दिमाग से ,कुता दिल से काटता है,आदमी दिमाग से .कुत्ता कभी दिमाग से काम नही लेता आदमी जोड गुणा घटा भाग करने के बाद ही कुछ करता है. इसलिये आदमी कुत्ते से उपरले दरजे का जीव है

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  3. आप चाहे जो तर्क दे लें, मगर ये बात तो तय है कि आदमी कुत्तई में कुत्ते से कहीं ज्यादा आगे होता है. और, कुत्तई आदमी में अंतर्निहित होता है.

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  4. Kutta NAMAK-HARAAM nahi hota hai tabhi to woh Kutte ki maut marataa hai !

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  5. आपने सही फ़रमाया कुत्ते आदमी से ज़्यादा वफ़ादार होते हैं, पर जब कुत्तों का झुन्ड किसी अजनबी कुत्ते को लखेद कर काबू में करता है वो कुत्ता अपनी दुम पीछे दबाकर और दांत चियार दे और थोडी दयनीय दशा बनाकर याचना करे तो कुत्ते दयावश उस अजनबी कुते को बक्श भी देते है,पर यही "आदमी" किसी दंगे फ़साद में अकेले पर तब तक हमला करता है जब तक आदमी मर नहीं जाता. फिर चाहे जितनी याचना करे कोई सुनने वाला नही होता.

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  6. आदमी कुत्तई में कुत्तों से आगे होता तब तो कोई झंझट ही नहीं होती रवि जी. मैं तो देख रहा हूँ कि आजकल कुत्ते भी आदमीपने पर उतरने लगे हैं.

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  7. भौं भौं भाउँ भाऊँ...भौं भों भौं भौं...पूछ भी हिल रही है, आपको चाटा जाए कि काटा जाए?

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