Thursday, August 9, 2007

उपन्‍यास क्‍यों नहीं लिखे जा रहे: श्रीलाल शुक्‍ल

हिन्‍दी साहित्‍य, उसमें भी विशेषकर उपन्‍यास-लेखन की दुर्दशा पर यह टिप्‍पणी श्रीलाल जी ने आज से पंद्रह वर्ष पहले, सन् 1992 में लिखी थी. इससे अलग कि शुक्‍ल जी के तंज ने मेरा उपन्‍यास लिखने का इरादा और मजबूत कर दिया है, अपनी सजीली-भीगीली शैली में श्रीलाल जी हिन्‍दी साहित्यिकता का जो लेखा-जोखा रखते हैं, वह तब आंख खोलनेवाला रहा होगा तो अब भी आंखें ही खुलवाता है. कुछ लोग चाहें तो मुंह भी खोल सकते हैं. खुले बाज़ार ने समाज में पैसे की उपस्थिति भले पहले की बनिस्‍बत अब ज़्यादा बढ़ा दी हो, हिन्‍दी साहित्‍य का परिदृश्‍य विशेष नहीं बदला है. घटिया ही हुआ है. पढ़ लीजिए, अन्‍दाज़ा पा जाइएगा.


1992 में हिन्‍दी साहित्‍य का जो लेखा-जोखा अख़बारों में छपा है, उसे पढ़कर मुझे भी श्री राजेंद्र यादववाली चिन्‍ता सताने लगी है: कि लोग जमकर लिख क्‍यों नहीं रहे हैं. पर साधन, सक्रियता, अनर्गल उत्‍साह की कमी के कारण मैं उनकी तरह इस विषय पर सेमिनार नहीं करा रहा हूं, सिर्फ़ यह टिप्‍पणी लिख रहा हूं.

कुछ विधाओं के बारे में कोई झमेला नहीं है. जैसे कविता. वह जाती है, वापस आ जाती है. बारह साल पहले उसे अशोक वाजपेयी ने आते देखा था. फिर उसे जाते किसी ने नहीं देखा. दरअसल, कुछ ऋतुकालों को छोड़कर, वह गई नहीं है. वह लीलाधर जगूड़ी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्‍बुज, विनोदकुमार शुक्‍ल आदि के पास पहुंचती रही है. नागार्जुन, त्रिलोचन आदि अब वयोवृद्ध हो गए हैं. वे शायद उसे बुलाते ही नहीं; प्रौढ़ता को लांघ रहे केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण के पास खुलेआम जाते वह हिचकती है. अशोक वाजपेयी के साथ वह ज़रूर इतना टिकी रही है कि वे दो साल में एक संग्रह निकाल दें. बहरहाल, कविताजी मज़े में हैं.

दर्जनों लोग जो नई-नई ड्रेसें ला रहे हैं, उनसे कहानी की वार्डरोब पटी पड़ी है. लघु पत्रिकाओं की शक्‍ल में कई वार्डरोबें तो ऐसे-ऐसे क़स्‍बों में रखी हैं कि उनका नाम देखने को नक़्शे पर मैग्‍नीफाइंग ग्‍लास लगाना पड़ता है. एक से एक उकसानेवाला माल है: ये डिज़ाइन की साड़ि‍यां हैं, यह रहा ‘एथनिक’ माल. दो-चार थीमों की ऐसी रगड़ाई हुई है कि कहानीजी जवानी में ही बूढ़ी दिखती हैं. पर वे बहुत ख़ुश हैं; उनका चेहरा ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं है, वे इस बात पर भी ख़ुश हैं.

नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं. अच्‍छा है. ज़्यादा लिखे जाने लगे तो हम यह वेदवाक्‍य कैसे कह पाएंगे कि ‘हिन्‍दी में मौलिक नाटकों का नितान्‍त अभाव है.’

यात्रा-वृतान्‍त? वह हिन्‍दी में कैसे लिखा जा सकता है? नई-नई जगहों पर यात्रा करने के लिए जिनके पास पैसा है, उनमें यात्रा-वृतान्‍त लिखने की तमीज़ नहीं है. जिनके पास तमीज़ है, उनके पास पैसा नहीं.

जीवन, आत्‍मकथा, संस्‍मरण- ये सब कहानी की ही शाखा-प्रशाखा हैं. अगर कहानी समृद्ध है तो इन्‍हें भी समृद्ध मान लीजिए और कहानी में जीवनी-संस्‍मरण और जीवनी-संस्‍मरण में कहानी खोजने की बराबर कोशिश करते रहिए. मिल जाएगी.

रही आलोचना. उसकी फ़ि‍क्र छोड़ि‍ए. इसकी ज़रूरत सिर्फ़ विद्यार्थियों को इम्‍तहान पास कराने के लिए होती है. जितनी ज़रूरी होती है, उससे सौ गुना ज़्यादा आलोचना व्‍याख्‍याओं, कुंजियों आदि की राह से उनके पास पहुंचती रहती है. पर आप शायद ऐसी आलोचना के बारे में सोच रहे हैं जिसकी ज़रूरत कवियों, कथाकारों- यानी सर्जनात्‍मक रचनाकारों को है. पर हिन्‍दी में रचनाकार नहीं होते, साधक होते हैं, साहित्‍य-साधक. वे वाद-विवाद में नहीं फंसते.

अन्‍त में उपन्‍यास. ‘अन्‍त में’ इसलिए कि मैं उसी के लिए चिन्तित हूं.

1992 में उपन्‍यास दो-चार ही आए- रानू-शानू के करिश्‍मों को भूल जाइए. मेरा मतलब असली उपन्‍यासों से है. यहां सचमुच ही ‘उपन्‍यास-साहित्‍य में सन्‍नाटा’ पर एक ऐसे सेमिनार की ज़रूरत है जो पूरे साल-भर चले. उसका एजेंडा कुल इतना हो कि सहयोगी उपन्‍यासकार अपनी-अपनी कोठरियों में बन्‍द रहें, सिर्फ़ शाम को आधा घंटा कसरत करने के लिए आंगन में निकलें- कारागार में नेहरू-स्‍टाइल. सौ उपन्‍यासकारों का यह सेमिनार- जिसमें उपन्‍यासकार के दोनों वक़्त का खाना, एक कोठरी, कुछ सिगरेट, थोड़ी स्‍मगिल्‍ड शराब की गारंटी हो- साल-भर में कम-से-कम सौ उपन्‍यास आपके हाथ में पकड़ा देगा. यह दीगर बात है कि सब उपन्‍यासों का एक ही शीर्षक हो: ‘जेल में एक वर्ष’.

लोग ज़्यादा उपन्‍यास क्‍यों नहीं लिखते? इसके जवाब में पूरा-का-पूरा उपन्‍यास लिखा जा सकता है. सच पूछिए तो लिखा गया है. यक़ीन न हो तो अमृतलाल नागर का लगभग छ: सौ पृष्‍ठों का ‘अमृत और विष्‍’ पढ़ि‍ए. इसीलिए इस प्रश्‍न पर यहां मैं और कुछ नहीं, सिर्फ़ दो बातें कहूंगा.

एक तो यह कि कविता या कहानी आप सवेरे की सैर में बना सकते हैं और फिर उसे, अपनी तन्‍दुरुस्‍ती के हिसाब से, नाश्‍ते के पहले या बाद में लिख सकते हैं. दो-तीन नाश्‍तों के आगे-पीछे वह पूरी हो जाएगी. उसके छपने पर आपकी क़ि‍स्‍मत- यानी आलोचक मंडली- ठीक हुई तो आप उतनी ही ख्‍याति पा लेंगे जितनी कि एक उपन्‍यास लिखकर, बशर्ते कि वहां भी आपकी क़ि‍स्‍मत वैसी ही ठीक हो. याद करें ‘प्रेम पत्र’ या ‘ऐ लड़की’.

पर उपन्‍यास सवेरे की सैर में नहीं लिखा जा सकता. यह एक पूर्णकालिक धन्‍धा है. प्रेमचन्‍द, वृन्‍दावनलाल वर्मा (जो वस्‍तुत: वकालत का धन्‍धा छोड़ चुके थे), भगवतीचरण वर्मा (जिन्‍होंने वस्‍तुत: वकालत का धन्‍धा कभी शुरू ही नहीं किया), इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, यशपाल- सभी पूर्णकालिक उपन्‍यासकार थे. जयशंकर प्रसाद, सियारामशरण गुप्‍त, निराला- ये सब पूर्णकालिक कवि थे पर इनके पास इतना समय व बची-खुची कल्‍पना थी कि उपन्‍यास भी लिखें. इन सबके न रहने पर उपन्‍यास का बाज़ार ठंडा हो गया है. अब वह कारोबार दूसरे हाथों में चला गया है. वे, यानी कुछ सरकारी नौकर, अध्‍यापक, बूढ़े पेंशनर, पत्रकार, राजनीतिक धन्‍धेबाज़, व्‍यवसायी या व्‍यवसाय प्रबन्‍धक, जो उपन्‍यास-लेखन को स्विमिंग पूल में रविवासरीय गोताख़ोरी या क्‍लब में सायंकालीन बिलियर्ड जैसा मानकर चलते हैं, उस युग को वापस नहीं ला सकते जो प्रेमचन्‍द आदि ने सृजित किया था.

दूसरी बात यह कि उपन्‍यास-लेखन घाटे का धन्‍धा है. मेरे मित्र स्‍व. ज्ञानस्‍वरूप भटनागर कानपुर में- लगभग बाईस साल पहले ‘टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया’ के संवाददाता थे. साल में कुछ सामाजिक-आर्थिक अध्‍ययन छपा करके वह काफ़ी रुपया कमा लेते थे. बदक़ि‍स्‍मती से मेरी देखा-देखी उन्‍होंने टेस्‍ट क्रिकेट की अन्‍दरूनी दुनिया पर ‘और खेल अधूरा रह गया’ नामक उपन्‍यास लिखना शुरू किया. डेढ़ साल लगे. फिर बड़ी कोशिशों के बाद जवाहर चौधरी की कृपा से उसे ‘शब्‍दकार’ ने छापा. उन डेढ़ सालों की निरर्थकता ने भटनागर को तीन साल ग़रीबी में डुबोए रखा. बार-बार वे मुझसे यही पूछते रहे, ‘उपन्‍यास से कुल इतना मिलता है? तब भी आप नया उपन्‍यास लिख रहे हैं?’

मैंने भी तीन साल मेहनत करके, लगभग बाईस सौ पन्‍ने रंगकर लगभग तीन सौ पृष्‍ठ का एक उपन्‍यास तैयार किया. एक व्‍यवसाय-प्रबन्‍धक मित्र के भड़काने पर पांडुलिपि प्रकाशक को देते समय मैंने, पचास हज़ार की हिम्‍मत न होने के कारण सिर्फ़ बीस हज़ार रुपये का अग्रिम मांगा. वह मुझे‍ मिल भी गया. दो-तीन महीने बाद दूसरी पुस्‍तकों की रायल्‍टी का जो विवरण आया, उसमें यह रक़म काट ली गई थी. नए उपन्‍यास का अग्रिम, बस: ख़्वाब था जो कुछ था देखा, जो सुना अफ़साना था.

तभी अगर कोई समझदार आदमी नासमझी की झोंक में एक उपन्‍यास लिख भी डालता है तो वह उसका पहला और अन्तिम उपन्‍यास होता है. इस स्थिति का सर्वेक्षण कराके मित्र राजेंद्र यादव चाहें तो एक नया सेमिनार करा सकते हैं.

साभार: '1992 का साहित्‍य: कुछ आंसू, कुछ हिचकियां'; जहालत के पचास साल, श्रीलाल शुक्‍ल, राजकमल प्रकाशन, 2004.

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15 comments:

  1. मै समझदार होने का दावा तो नहीं कर सकता लेकिन नासमझी के झोंक में एक उपन्यास ज़रूर लिखना चाहता हूँ. आप झोंक में हैं कि नहीं?

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  2. सरजी
    आपका उपन्यास कहां है, कहां पर उपलब्ध है।
    वैसे थोड़े दिन पहले मुझे एक प्रकाशक ही बता रहा था कि उपन्यास सबसे ज्यादा कमा कर देते हैं। उसने बताया कि वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यास अब भी धकाधक कमाई करवा रहे हैं, ये अलग बात है कि कमाई प्रकाशकों से आगे पहुंच नहीं पाती।
    आलोक पुराणिक

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  3. श्रीलाल शुक्ल जी का यह लेख कई बार पढ़ चुका हूं। आज आपके बहाने फ़िर पढ़ लिया। बहुत अच्छा लगा।

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  4. हम पहले क्या कम डरे थे जो आप और डरा रहे हैं?

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  5. अब आपने इतनी गंभीरता से हमारे चिंतन(वैसे ये घटिया काम हम कभी करते नही है चिंतन फ़िंतन का) को नई दिशा दी है तो हम इधर भी पंगा लेने का मन बनाय लिये है,ताकी समय के आप जैसे महान हस्ताक्षरो का मन रह जाये,दिल दुखि ना हो.पर छ्पवाने की कम से कम गारंटी तो दे या दिला दीजिये..:)

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  6. "मैंने भी तीन साल मेहनत करके, लगभग बाईस सौ पन्‍ने रंगकर लगभग तीन सौ पृष्‍ठ का एक उपन्‍यास तैयार किया. एक व्‍यवसाय-प्रबन्‍धक मित्र के भड़काने पर पांडुलिपि प्रकाशक को देते समय मैंने, पचास हज़ार की हिम्‍मत न होने के कारण सिर्फ़ बीस हज़ार रुपये का अग्रिम मांगा. वह मुझे‍ मिल भी गया. दो-तीन महीने बाद दूसरी पुस्‍तकों की रायल्‍टी का जो विवरण आया, उसमें यह रक़म काट ली गई थी. नए उपन्‍यास का अग्रिम, बस: ख़्वाब था जो कुछ था देखा, जो सुना अफ़साना था."

    धत्तेरे की! यह तो पींनट्स निकला लिखने का धन्धा!

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  7. श्रीलाल शुक्ल का लेख पढ़कर मन खुश हो गया। उनकी एक बात एकदम सही है कि हिन्‍दी में रचनाकार नहीं होते, साधक होते हैं, साहित्‍य-साधक। वे वाद-विवाद में नहीं फंसते। इसी साधना की जरूरत है और मैं मानता हूं कि जिस संक्रमण काल से हम और हमारा समाज गुजर रहा है उसमें युद्ध और शांति जैसा उपन्यास लिखा जा सकता है। अतीतजीवी होने से कोई फायदा नहीं। प्रेमचंद की स्तुति करने से कोई फायदा नहीं।

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  8. बहुत अच्छा रहा शुक्ल जी यह आलेख पढ़ना. आज पहली बार पढ़ा. बहुत से विचार जन्मने लगे हैं.

    -एक वाद विवाद में न पड़ने वाला साधक आपको इस आलेख की प्रस्तुति के लिये साधुवाद कह रहा है. :)

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  9. Hindi mein upnyas isliye nahi likhe jaate kyonki bikte nahi. Aur bikte isliye nahi ki Hindi ke upnyason mein vibhinn prakar ke pathkon ke liye kuchh nahi hota.Aaj Hindi wale Harry Potter ko chahe jitni gaaliyaan de lein lekin Hindi mein Chandrakanta ke baad aisa koi upnyas aaya hai? Ya hamare paas itne myth hai lekin kisi ne "Da Vinchi Code" jaisa kuchh likha hai? Ya Agatha Christie jaise upnyas? Hum log Angreji ko koste rahte hain lekin hamare paas bhi pathkon ko dene ke liye kya hai? Sahityakaar A vampanthi hai isliye bura hai , B BJP wala hai isliye padha nahi ja sakta.Aaj koi poochta hai ki Hindi mein kya padhein to kuchh gine chune naam hi hote hain. Darshan aur Adhyatm ke naam par le dekar Gita hai jise ghise chale rahe hai. Kamu wagairah ko to chodiye Ayn Rand jaisi bhi koi nahi hai.
    Kuchh salon baad Hindi bhi Sanskrit ki tarah ho jayegi , jab log kahenge ki India mein 1 gaanv hai jahan log abhi bhi Hindi mein baat karte hain.

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  10. इस लेख को पढवाने के लिये शुक्रिया..
    भीतर बैठा एक लेखक ऐसे आलेखो को पहलीबार पढकर जैसे जाग जाता है फ़िर दुबारा पढकर चुप्प सा बैठ जाता है..

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  11. लिखा जा रहा है, कंगाल हो जाने की आशंका के साथ भी. पर अगर बड़ा प्रकाशक नहीं है तो उसकी बड़े अखबारो पत्रिकाओं में, यूनिवर्सिटी या साहित्य चौपालों में चर्चा नहीं होगी और उसे पढ़ने वालों की तवज्जो भी नहीं मिलेगी. ये सब बुक रिव्यू का गोरखधंधा बंद हो. कोई हमें क्यों पहले से बताए कि इस लेखक, इस किताब को पढ़ो, सारे विद्वान, आलोचक यही पढ़ रहे हैं. सच यह होता है जो कि लोकार्पण मंच से विद्वान लोग खुले आम करते हैं कि कल ही हमें किताब मिली और पढ़ी नहीं है. पर लेखक को मैं जेएनयू के समय से जानता हू, भला सा छात्र था, मेरे पास आता था. पाठक लेखक सीधा रास्ता बनाना बहुत कठिन है. पर रानू मानू की बात और है.

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  12. मुझे कोई उपन्यास लिखने मे मदद करे - 09571247052

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  13. क्या कोई भाई या बहन उपन्यास लिखने में मेरी मदद कर सकता हैं ?
    09571247052 इस नम्बर पर सम्पर्क करें क्योकि मैं नेट नहीं चला पाऊँगा ।

    धन्यवाद

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  14. आज फ़िर पढ़ा इसे। बहुत अच्छा लगा। :)

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