मन्नू-राजेंद्र विवाद की धूल अभी थमी नहीं थी कि पत्नी एक बार फिर चर्चा में चली आयी है. हिंदी में यह एक स्वस्थ परम्परा है. चीज़ें, दिखता है जैसे जा रही हैं-जा रही हैं, फिर वे एकदम-से लौट भी आती हैं. जैसे नवगीत, गद्यगीत (लौटती न दिख रही हो तो कृपया मेरे मुक्त गद्य के गल्प देखें. ध्यान से देखें) पूरी तरह से कहां गई? प्रगतिशील, जनवादी साहित्यिकता अभी खुद को पूरी तरह से जीकर गई भी नहीं थी कि देख रहे हैं सुप्त सामंती आस्वादों की पतनशीलता खाद-पानी पाकर फिर से प्रस्फुटित हो चली है (यक़ीन न हो तो मेरा पतनशील समग्र देखें). भाई लोग हो-हो करके हंस देते हैं, जबकि ओ-हो करके रोनेवाली बात है! क्या समाज में, वह भी गाय-पट्टी जैसे पिछड़े हिंदी समाज में, पतनशीलता को प्रश्रय देना उचित है? क्या नेतृत्वकारी साहित्य के पैरोकारों के अनेतृत्कारी स्वर में स्वर मिलाकर इसकी भारी भर्त्सना की ज़रूरत नहीं? क्या पतनशील समग्र को उठाकर पटक देने और ढंग से थूर देने का वाजिब समय नहीं आ गया है? ओ-हो हिंदी साहित्य कहां जा रहा है? (क्या मैं साहित्य-सागर सम्मान व पतनशील बुकर की ओर जा रहा हूं? क्या उधर की तरफ आप ठीक-ठीक मुझे ठेल रहे हैं?).हिंदी में यह एक अन्य समस्या है. माने स्वस्थ के साथ एक अस्वस्थ परम्परा भी है, कि बात पत्नी से शुरू होती है और आगे समाज व जीवन की निस्सारता की ओर मुड़ जाती है. बात पत्नी की हो रही है, तो केंद्र में पत्नी ही होनी चाहिए, आ-हा अनूप या हो-हो ज्ञान नहीं. हें-हें आलोक भी नहीं. ग़लत बात है. तो मैं कह रहा था मन्नू की किताबोपरांत पत्नी फिर से केंद्र में लौट आई है. अलबत्ता इस बार वह पति को जलाती नहीं, बचाती देखी गई; नतीजे में पड़ोस में कुछ लोग हंसते और गाल बजाते देखे गए (विमल लाल नहीं देख सके, और मैं भी दूसरे कामों में बझा हुआ आंखों पर परदा डाले रहा). मगर विवाद पति को बचाती देखी गई पत्नी का पति को बचाती दिखना मात्र नहीं रहा, उसका आधी ज़मीन के हाशिये से निकलकर बमबम, भड़भड़ के साथ केंद्र की तरफ फैल जाना हो गया है. पत्नी के इस अस्त्रियोचित आचरण से बुज़ुर्ग लोग सन्न हैं. मैं बुज़ुर्ग नहीं, लेकिन सन्न मैं भी हूं. पत्नी को घबराहट व शंका, और ‘मेन आर फ्रॉम मार्स एंड वीमेन आर फ्रॉम वीनस’ जैसे जनोपयोगी हितकारी साहित्य को भयानक आशा से देखने के लिए मजबूर हो रहा हूं.
क्या आधी ज़मीन या अदर हाफ़ का केंद्र की ओर सरकना उचित है? बुज़ुर्गों का सन्न होना? उचित? है? क्या स्त्री मात्र जीवन का नमक नहीं? क्या जीवन को हटाकर केंद्र में नमक की स्थापना हर तरह के सामाजिक मिठास का अन्त नहीं हो जाएगी? अफ़सर वाली केबिन में बैठे नौकर, भाई, पत्नी, ड्राईवर के कौतुकभरे चित्र खींचने के हमारे ललित सुखों में सेंघमारी नहीं हो जाएगी? कि हमारी जगह नौकर, भाई, पत्नी, ड्राईवर हमारा चित्र खींचने को अकुलाने लगेंगे? कौतुक व विद्रूप भरे? क्या नेतृत्वकारी साहित्य व समाज इसकी इजाज़त दे सकेगा? ढंग से खड़ा, या बैठ, कुछ भी रह सकेगा? क्या हिंदी सांस ले सकेगी? क्या गाय-पट्टी वाली हिंदी को इस तरह सांड़ बनाना उचित होगा?
मैं पेट खुजलाते हुए सोच रहा हूं, और ठीक से सोच पाने में असमर्थ होता हुआ फिर से पेट खुजला रहा हूं.
3 comments:
खुजाएं...
पतनी और आप के पतनशील के हिज्जे एक होना क्या महज एक संयोग है..?
हद है, अभय, अब जाके कहीं चैन पड़ा था.. मगर तुम्हारे ऑर्ब्ज़वेशन ने वापस सोच में पटक दिया.. फिर खुजा रहा हूं!
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