Monday, August 13, 2007

प्‍लास्टिक के पीछे.. किम्‍बा संग्रहण सुख

बाबूजी की एक बुरी आदत है.. फावड़े का हत्‍था, हाथ भर की रस्‍सी, टीन का कबाड़ कुछ भी फेंकते नहीं.. सीमेंट से खराब तगारी, पुराने सोफे का नारियल और स्प्रिंग सब वर्षों से ऐसे सहेजकर रखे हैं मानो वही घर की पुरातनता के सबसे अन्‍तरंग जीवंत अलबम हों! इस अल्‍लम-बल्‍लम की रक्षा व विरोध में बोली किसी व्‍यंग्‍योक्ति के जवाब में बाबूजी का बड़ा सीधा-सा उत्‍तर रहा है- लड़ाई और तंगी देखे हो? हम देखे हैं! ढूंढ़ते रहो, कुच्‍छो नहीं मिलता, फिर? घर में रक्‍खल हुआ है तो काट रहा है? कल को कौनो ज़रूरत निकल आया तो कवनो से मांगे जाना न ना पड़ेगा?.. पता नहीं बाबूजी किस अमूर्त कल की किस अमूर्त ज़रूरत की बात करते.. क्‍योंकि इतने वर्षों में जितनी मर्तबा भी उनकी दुनिया में लौटा हूं, यही देखा है कि उनका इकट्ठा कंजास उनकी बुढ़ाती देह की बनिस्‍बत जंग खा-खाकर किसी काम की कभी रही भी होगी तो अब सिर्फ़ बच्‍चों के खेल के रास्‍ते में आकर उनके चोट लगने, और घर की औरतों के बाबूजी पर खिन्‍नता ज़ाहिर करने की ही वजह बनती रहती है.

हम भाई लोग जब छोटे थे, घर और बाहर की दुनिया के अलहदाबोध के ताज़ा असर में बाबूजी के इस कबाड़ी आदत का प्रतिकार करते.. बीच-बीच में सुबह के नाश्‍ते के बाद, जैसे अचानक कोई पुराना घाव याद आया हो, बाबूजी के कमरे के बाहर भाईयों के समवेत स्‍वर में युक्ति की जिरह की कुछ नाटकीय दृश्‍यावलियां दोहराई जातीं.. मगर नाटक का अन्‍त हमेशा बाबूजी की जीत में ही होता.

इस अनोखे आदत की संरक्षा में मेरे बाबूजी अकेले हों, ऐसी बात नहीं है.. बाबूजी का इसी तरह का या इससे थोड़ा अलहदा रूप हमें ढेरों घरों में मिल जाएंगे.. एक लघुरूप तो मुझी में बचा हुआ है.. मालूम नहीं संकोच है असमंजस है या विशुद्ध संग्रहण का संस्‍कार कि पुराने सैकड़ों ऑडियो टेप (सीडी प्‍लेयर को यूज़ में लाने के बाद जिन्‍हें वर्षों से सुना नहीं, और आगे भी कभी सुनूंगा, ऐसा लगता नहीं) स्‍थानाभाव के बावज़ूद घर में रखे हुए हूं.. निर्ममता से बहरिया के फेंकने में सकुचाता हूं! वही हाल कुछ मित्रों के घरों में कपड़ों का देखता हूं.. पंद्रह-पंद्रह, बीस-बीस वर्षों की निधि है.. शायद इस समूचे दरमियान पांच मर्तबा पहनी गई होगी, लेकिन फेंकी नहीं जाएगी, क्‍यों? क्‍या मालूम किसी दिन ज़रूरत निकल आये तो?

ग़रीबी या अभाव की ये कैसी प्राचीन, बरगदी ग्रंथियां हैं जो हमें अतीत के अगड़म-बगड़म पे बिठाये रखती हैं?.. उन्‍हें छोड़ने के ख़्याल से कलेजा थरथराने लगता है.. लगता है ऐसा करेंगे तो ग़लत कर देंगे, कुछ ग़लत हो जाएगा..

अन्‍य शहरों का मुझे ध्‍यान नहीं आ रहा मगर मुंबई में प्‍लास्टिक की थैलियों पर क़ानूनन मनाही है. बरसात में जगह-जगह पानी के जमाव में नालियों में अवरोध बनी जमी हुई इन प्‍लास्टिक थैलियों की कारस्‍तानी से हमसब परिचित हैं. मगर क़ानून के भय या पर्यावरण के संकट के बतौर चिन्हित होकर ऐसा नहीं हो गया है कि लोगों के मन व जीवन से प्‍लास्टिक निष्‍कासित हो गई है. लोगों के घरों में- रसोई, दराज़, यहां-वहां ज़रा नज़र घुमाइए, आपको प्‍लास्टिक दिख जाएगी, मय इज़्ज़त दिखेगी. लगेगा प्‍लास्टिक है ही इसलिए कि लम्‍बे समय तक उसका संरक्षण होता रहे. काल्विन क्‍लाइन से लेकर लेवाइस, मार्लबरो की कोई एक बड़ी थैली होगी जिसमें क़रीने से तह करके रखी छोटी थैलियां होंगी.. घर की औरत सुघड़ हुई तो ज़्यादा संभावना है उन छोटी थैलियों के अंदर उससे भी छोटों की एक और परत होगी! क्‍यों इकट्ठा कर रहे हैं हम प्‍लास्टिक?

क्‍या मालूम यहां मुंबई ही नहीं, इस्‍लामाबाद, बेरूत, बग़दाद सब कहीं घरों में प्‍लास्टिक सहेज-सहेजकर रखा जा रहा हो कि पता नहीं कल कौन-सी ज़रूरत आन पड़े.. या ज़रूरत से अलग, इन थैलियों पर बने अमरीकी कंपनियों के लोगो, रुपाकारों का एक अव्‍यक्‍त आकर्षण है जो लोगों को उनसे जोड़े रखता है.. मालूम नहीं.. आपके दिमाग़ में कोई जवाब उठे तो बताइएगा..

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3 comments:

  1. सही कहा प्रमोद जी, हम स‌ब किसी न किसी रुप में इस संग्रह की आदत के शिकार होते हैं। पुरानी पुस्तकें, ऑडियो टेप, बेकार हो चुके इलैक्ट्रॉनिक सामान जो पता है अब किसी काम नहीं आएँगे आदि-आदि संभाले रहते हैं।

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  2. आज कल तो फिर भी कम है.. पहले के दिनों में हर माँ बाप अपने बच्चों को कलक्टर बनाना चाहते थे..!!.. फिर अनूप शुक्ला भी तो बताते हैं.. झाड़े रहो कलक्टरगंज.. कलक्टर तो आप जान ही रहे हैं.. गंज माने और कुछ नहीं.. खज़ाना..!!

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  3. Have you noticed relatives and neighbors who keep their car seats wrapped in plastic? Remotes and cell-phones kept in plastic? Always telling you that that way it gets them longer life, saves them from water!
    Who knows if these people had a way they would wrap even their children in plastic!
    - Tanmay

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